भारत में गतिशीलता का फासला: रफ्तार के युग में पैदल और साइकिल यात्री हाशिए पर
भारत में सड़क विकास की प्राथमिकताएं असंतुलित हो गई हैं। जहां अरबों रुपये हाईवे, फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे पर खर्च हो रहे हैं, वहीं देश की बहुसंख्यक आबादी, जो पैदल या साइकिल से चलती है, उसके लिए बुनियादी सुविधाएं तक नदारद हैं। सिर्फ 5% से भी कम परिवहन बजट पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों पर खर्च होता है। भारत को अब विकास की रफ्तार को इंसानी ज़िंदगियों की कीमत पर नहीं चलने देना चाहिए।
-बृज खंडेलवाल-
140 करोड़ भारतीयों में से कितने लोग बड़ी कारें या फैंसी मोबाईक खरीद सकते हैं? खरीद भी लें किश्तों पर, तो भी पेट्रोल कौन सा मुफ्त मिल रहा है! हकीकत ये है कि मेजॉरिटी पॉपुलेशन आज भी सड़कों पर, शहर हो या देहात, पैदल ही चल रहे हैं या साइकिलों पर ही निर्भर हैं। लेकिन इस बड़े समूह के हितों की रक्षा के लिए कभी कोई आवाज नहीं उठती।
अखिलेश यादव की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन उसने हिम्मत करके इटावा से आगरा तक 140 करोड़ का एक साइकिल ट्रैक बनाने की बड़ी रिस्क ली। बाद की सरकारों ने इस बोल्ड पहल को नक्शे से ही मिटा दिया।
श्री नितिन गडकरी को सिर्फ एक्सप्रेसवेज, टोल प्लाजा, फ्लाईओवर्स ही विकास के पैमाने लगते हैं, पैदलिया कीड़े मकोड़े हिट एंड रन का शिकार होते रहें, उनकी बला से।
अधिकांश शहरों में, पैदल चलने वालों और साइकिल चालकों के लिए न फुटपाथ बचे हैं, न सुरक्षित रास्ते—हर कोना मोटर गाड़ियों के लिए समर्पित कर दिया गया है।
जबकि अरबों का बजट फ्लाईओवरों, एक्सप्रेसवे और चौड़ी सड़कों पर बहाया जा रहा है, वहीं आम आदमी—जो पैदल चलता है या साइकिल से सफर करता है—हर मोड़ पर ज़िंदगी की बाज़ी लगाता है।
हिट एंड रन की घटनाएं बेकाबू हैं, और प्रशासन मौन साधे बैठा है। ऐसा लगता है मानो इस ‘गति युग’ में इंसानी ज़िंदगियों की कोई कीमत नहीं बची है। कभी बच्चे स्कूल जाते हुए कुचले जाते हैं, तो कभी बुज़ुर्ग अस्पताल के रास्ते में चढ़ा दिए जाते हैं किसी बेकाबू वाहन की चपेट में, कहती हैं सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर। "क्या हमारे शहर सिर्फ गाड़ियों के लिए बनाए जा रहे हैं? क्या पैदल चलने वाला अब सिर्फ दुर्घटनाओं का आंकड़ा बनकर रह जाएगा?"
प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "लगभग 1.4 अरब की आबादी वाले भारत में, गैर-मोटरयुक्त परिवहन ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में हावी है। अध्ययनों का अनुमान है कि ग्रामीण भारत में 50-80% यात्राएँ पैदल होती हैं, खासकर उन कम आय वाले क्षेत्रों में जहाँ वाहन स्वामित्व कम है। साइकिल से 10-15% यात्राएँ होती हैं, और ग्रामीण घरों में साइकिल स्वामित्व लगभग 40-50% है। इसके विपरीत, कार स्वामित्व न्यूनतम है—केवल 5-10% ग्रामीण घरों के पास कार है, और मोटरयुक्त दोपहिया वाहन, जो बढ़ रहे हैं, लगभग 20-30% ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी के लिए सुलभ हैं। शहरी क्षेत्रों में, स्थिति थोड़ी अलग है, लेकिन कई शहरों में 30-35% यात्राएँ पैदल या साइकिल से होती हैं। ये आँकड़े रेखांकित करते हैं कि पैदल चलना और साइकिल चलाना भारतवासियों के लिए, खासकर शहरी केंद्रों के बाहर, गतिशीलता की रीढ़ हैं।"
हालाँकि, बुनियादी ढांचे का विकास एक अलग कहानी कहता है। भारत ने मोटरयुक्त परिवहन पर भारी निवेश किया है, जिसमें पिछले दशक में 65,000 किमी से अधिक राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे बनाए या अपग्रेड किए गए हैं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने 2024-25 में सड़क बुनियादी ढांचे के लिए ₹2.78 लाख करोड़ (लगभग $33 बिलियन) आवंटित किए, जिसमें बड़ा हिस्सा एक्सप्रेसवे और शहरी फ्लाईओवर के लिए है।
आईआईटी दिल्ली के ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन सेंटर (TRIPC) की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि केवल 10-15% शहरी सड़कों पर कार्यात्मक फुटपाथ हैं, और दिल्ली और पुणे जैसे कुछ पायलट प्रोजेक्ट्स के बाहर समर्पित साइकिल लेन लगभग नहीं हैं।
इस उपेक्षा के गंभीर परिणाम हैं। पैदल यात्री और साइकिल चालक भारत के सबसे कमजोर सड़क उपयोगकर्ताओं में हैं, जो सड़क हादसों में मरने वालों का बड़ा हिस्सा हैं। 2019 से 2023 के बीच, लगभग 1.5 लाख पैदल यात्रियों की सड़क हादसों में मृत्यु हुई, जो कुल सड़क मृत्यु का 20% है, और साइकिल चालकों को भी कम रिस्क नहीं है। हिट-एंड-रन मामले बढ़ रहे हैं, 2022 में अकेले 30% से अधिक पैदल यात्री मृत्यु इसके कारण हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में, सुरक्षित बुनियादी ढांचे की कमी खतरों की भयानकता बढ़ाती है, क्योंकि संकरी सड़कें और तेज़ रफ्तार ट्रैफिक गैर-मोटरयुक्त उपयोगकर्ताओं के लिए जगह नहीं छोड़ते। रात के समय होने वाली दुर्घटनाएँ और ग्रामीण सड़क हादसे विशेष रूप से घातक हैं, जिनमें अपर्याप्त रोशनी और खराब सड़क डिज़ाइन भी प्रमुख कारक हैं।
एडवोकेट राज वीर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स ने इस संकट को हल करने के लिए बार-बार हस्तक्षेप किया है। मई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित पैदल आवाजाही को मौलिक अधिकार घोषित किया, राज्यों को स्टेड़ी फुटपाथ सुनिश्चित करने का आदेश दिया। यह एक जनहित याचिका के बाद था, जिसमें 2022 में 32,825 पैदल यात्री मृत्यु का उल्लेख था। कोर्ट ने निर्बाध फुटपाथ की कमी की आलोचना की, जिसके कारण पैदल यात्री सड़कों पर मजबूर होते हैं, जिससे हादसों का जोखिम बढ़ता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचे के लिए फैसले सुनाए हैं, लेकिन कार्यान्वयन धीमा है। पैदल और साइकिल बुनियादी ढांचे के लिए बजट कुल परिवहन खर्च का 5% से भी कम है।
इसका समाधान करने के लिए, भारत को ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित, आरामदायक फुटपाथ और साइकिल लेन बनाने के लिए संसाधनों को मुहैया करना चाहिए।