घुसपैठ, वोटबैंक और मौन देशद्रोहः जब देश की चुप्पी बन जाए सबसे बड़ा खतरा
वोट बैंक के लालच में कुछ राजनीतिक दलों ने देश के अंदर घुसपैठियों को पहचान पत्र, सरकारी योजनाएं और स्थायी ठिकाने उपलब्ध कराए। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र दोनों के लिए गंभीर खतरा है। जिन लोगों ने जाली दस्तावेज़ बनाए या इन्हें बसाया, क्या उन पर देशद्रोह जैसी कठोर कार्यवाही नहीं होनी चाहिए?
-ड़ॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
हमने उन्हें (पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, रोहिंग्याओं को) भारत के अंदर आने दिया। छुप-छुप कर, बापू के तीन बंदर बनकर या हथेली और जेब गर्म करवाकर। हमें कोई चिंता न हुई, और न ही हमारी देशभक्ति तब जागी।
आज जब वे इतनी तादाद में हो गए हैं कि वे किसी की सरकार बनवा सकते हैं, कहीं भी रायता फैला सकते हैं, तब चिंता शुरू हुई। वे गुंडागर्दी सरेआम कर सकते हैं, और मोदी, योगी, शाह, रेखा गुप्ता को भद्दी-भद्दी गालियां और बददुआएं खुलकर दे सकते हैं। वे रेलवे लाइन पर अपने घर बसा सकते हैं और वहीं पर मल-मूत्र त्याग सकते हैं। वे सब जगह गंद फैलाने को स्वतंत्र हैं और कई राजनीतिक पार्टियां इनको गुपचुप या फिर सरेआम अपना पूरा समर्थन दे रही हैं।
फायदा दोनों का हो रहा है। घुसपैठियों को यह कनाडा से कम नहीं लग रहा होगा। और उन राजनीतिक पार्टियों की जेब से क्या जाता है कि उन्हें चिंता हो? बसा दिए खाली जगहों पर। बाकायदा पहचान पत्र, गरीबी रेखा के नीचे होने के प्रमाण बनवा दिए, राशन कार्ड बनवा दिए, अपना घर और शौचालय बनाने के पैसे दिलवा दिए। और जब-जब जैसा मन करता गया, तो उनका भी साथ ‘सबका साथ और सबका विकास’ के नाम पर होता गया।
आज परेशानी हमें कुछ विशेष जगहों पर ही होनी शुरू हुई है, जहां सत्ता फिसलने का सवाल उठ खड़ा हुआ हो। देश के लिए अब सोचना पड़ रहा है जब चुनाव बिल्कुल निकट आ गए। आज देशभक्ति की भावना जाग रही है जब बिहार, बंगाल, ओडिशा, सातों पुरबिया बहनों पर, उत्तराखंड, हिन्दुओं की सबसे बड़ी तीर्थनगरियों- द्वारका, सोमनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ और न जाने कहां-कहां ये पहुंच चुके हैं। उन्हें भविष्य का भी ज्ञान है, और यह भी कि कल्कि भगवान कहां प्रकट होंगे- सम्भल में। तो वहां पहले से ही सारी जगह घेर कर कब्जा कर ली गई।
और लगभग सारी राजनीतिक पार्टियों ने देखा, समझा, अपने मतलब का गणित, गुणा-भाग किया। और कुछ वोट, टोंटियों, शीशमहलों इत्यादि के फेर में मौन समर्थन और भरपूर सहायता देते चले गए। सबका साथ और सबका विकास भी तो बराबर होता ही रहा ना। अपनी आरक्षण नीति बचानी और बरकरार भी तो रखनी थी ना। यदि खुल्लमखुल्ला वोट ऐसे घुसपैठियों द्वारा मिलते रहते, तो आरक्षण खत्म न कर दिया होता कभी का।
मजबूरी, अथवा देखा-देखी, हिंदुत्व आधारित मिली-जुली सरकार को भी खुलेआम यह बार-बार दावा करना पड़ा कि जब तक वे सत्ता में रहेंगे, आरक्षण चालू रहेगा। मिलते रहेंगे फिर वोट। देश भलीभांति जानता है कि वोट देने कौन-कौन सा समुदाय जाता है, और कौन नहीं। जो नहीं जाते हैं, उन्हें या तो यह पता है या लगता है कि उनके वोट का कोई असर नहीं होगा, इसीलिए वे शायद कोशिश भी नहीं करते वोट डालने की। मज़ाक तो यह है कि उनके वोट उनके द्वारा वोट डाले बिना भी पड़ जाते हैं। और जो मन बनाकर वोट डालने खुद पहुंचते हैं, उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि उनके वोट तो पहले ही पड़ चुके हैं।
वोट देने का अधिकार सभी को है। यह हम जैसे कई लोगों को इसलिए चुभता है कि जो हकदार नहीं हैं वोट डालने के, उनको हकदार बना दिया जाता है। और जो वास्तव में हकदार हैं, शायद कुछ हद तक सभ्रांत भी, उनके लिए ऐसा माहौल बना दिया जाता है जिससे वे बचना चाहेंगे।
अपनी कहें, तो एक समय वह भी था कि उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी से भाजपा और कांग्रेस दोनों, हमें संसदीय चुनाव में उतारना चाहते थे। हमारे रिश्तेदारों और परिचितों ने हमें समझाया कि हम ऐसी भूल न करें, क्योंकि उन्हें भारी बेइज्जती निश्चित सी लग रही थी, जब हमारा भी वोट न पड़ने दिया जाए। जीत की बात फिर बेमानी हो जाती है न?
देश और संविधान के लिए अडिग खड़े होने वाले कम ही हैं। चंद्रशेखर जी जरूर थे। बाकी तो संविधान को अपने अनुसार जब चाहें और जैसा चाहें, बनवाते ही रहते हैं।
बात मूलतः अनचाहे घुसपैठियों की हो रही थी और उनसे मिले बहुमूल्य वोट की। सत्ता सुख आज लगता है कि किसे प्यारा नहीं। और दूसरी ओर सत्ता चले जाने का भय भी लोगों को सताता है। यह एक अपने माफिक एनवायरनमेंट बनाकर रखने की कयावद है। तभी तो बीन-बीन कर पशमांदा (अल्पसंख्यक) पहचाने जा रहे हैं कि उन्हें आरक्षण देकर अपनी ओर मिलाया जाए वोट की खातिर। ऐसा संविधान के तहत अभी वर्जित है, यह सब जानते हैं। परंतु यदि एकमुश्त पशमांदा वोट मिल गए, तो पूरी हो न जाएगी सभी के मन की मुराद?
ऐसे में फिर किसे चिंता है देश की? या उस समाज की, जो इन हरकतों से दबता, पिसता, और किनारे खिसकाया जा रहा है, जहां या तो वह पलायन कर जाए, या फिर कुछ और सोचने पर मजबूर हो जाए।
अब बिहार में चुनाव निकट है, और अंतिम समय किसी को ख्याल आया कि वोटर आईडी को चेक किया जाए। यह क्या केवल बिहार में ही हो, पहले से क्यों न हो? देशव्यापी चेकिंग क्यों न हो?
देश तो आज सामाजिक जातिगत गणना के लिए तैयार, प्रतिबद्ध और बेचैन है। क्या यही बेचैनी घुसपैठियों को तलाशने और उन्हें यहां से वहां तितर-बितर न करते हुए देश से निकाल देने के सकारात्मक प्रयत्न, प्रयास, कयावद और प्रबंध बन सके?
अमेरिका ने भारतीयों को जंजीरों में बांधकर भारत वापस भेजा था। अमेरिका तो इन्हें नहीं लेगा, पर क्या ऐसा बंदोबस्त नहीं हो सकता कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, तुर्किए, मिस्र, सीरिया, लीबिया, फिलिस्तीन, इराक, ईरान, अज़रबैजान इत्यादि मुस्लिम देशों में इन्हें पनाह दिलवाने और नई शुरुआत की सरकारी कोशिश हो सके?
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चीन, या रूस से बात करके देखा? या पहले से ही मान लिया कि वे मानेंगे नहीं? क्योंकि यदि ये दिल्ली से निकाले जाते हैं, तो गाजियाबाद, सहारनपुर, बरेली, उत्तराखंड, गुजरात, कश्मीर इत्यादि "महफूज़" जगहों में चले जाते हैं, पर रहते भारत में ही हैं और वोट बैंक बनकर।
क्या आज तक कोई ठोस कार्यवाही उन लोगों पर हुई जिन्होंने इन्हें भारत में घुसने दिया? चीन या रूस की तरह सज़ा मिली किसी को? जिन्होंने जाली आधार कार्ड और वोटर आईडी बनाई, क्या उन्हें आजीवन कारावास हुआ? उनकी चल-अचल संपत्ति कुर्क हुई?
क्या ऐसे "मेहनती लोगों" पर, जिन्होंने नियमों और देश विरोधी कार्यों को अंजाम दिया, उन्हें ढूंढ़-ढूंढ़कर बेहद कड़ी सज़ा नहीं मिलनी चाहिए?
“आप” पार्टी के नेताओं पर क्या एक्शन हुआ जिन्होंने इन्हें खुलेआम एनसीआर में बसाया? क्या उन नेताओं पर कोई देशद्रोह की कार्यवाही नहीं बनती? सरेआम यह एक अनोखे प्रकार का देशद्रोह नहीं तो और क्या है?
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