खूनी पिता के खिलाफ अदालत में खड़ी हुईं मासूम बेटियां: मां की हत्या का सच बताया और न्याय की कीमत रिश्तों से चुकाई, अदालत ने सुनाई उम्र कैद की सजा

मां की नृशंस हत्या के मामले में बेटियों की आंखों देखी गवाही ने न्याय की वह मिसाल कायम की है, जहां रिश्तों से ऊपर कानून खड़ा दिखा। बरेली के भुता थाना क्षेत्र के अंगदपुर खमरिया गांव में पत्नी की हत्या के दोषी पिता को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। विशेष न्यायाधीश तबरेज अहमद ने चश्मदीद नाबालिग बेटियों की गवाही और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया।

Feb 13, 2026 - 12:58
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खूनी पिता के खिलाफ अदालत में खड़ी हुईं मासूम बेटियां: मां की हत्या का सच बताया और न्याय की कीमत रिश्तों से चुकाई, अदालत ने सुनाई उम्र कैद की सजा

-रमेश कुमार सिंह-

बरेली। बरेली के एक छोटे से गांव अंगदपुर खमरिया में उस शाम चूल्हे की आग के साथ-साथ एक परिवार भी जल रहा था। 35 साल की राजेश्वरी देवी रोज़ की तरह खाना बना रही थीं। पास ही उनकी पांच साल की बेटी स्वाति मां की गोद में बैठी थी और 14 साल की अपराजिता स्कूल से लौटकर घर आई ही थी। किसी ने नहीं सोचा था कि यह शाम दो मासूम बेटियों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगी।

19 नवंबर 2024 की वह शाम अंगदपुर खमरिया गांव की दो नन्ही बेटियों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। भुता थाना क्षेत्र के इस गांव में 35 वर्षीय राजेश्वरी देवी रोज़ की तरह चूल्हे पर खाना बना रही थीं। उनकी गोद में पांच साल की बेटी स्वाति बैठी थी और 14 साल की बेटी अपराजिता स्कूल से लौटकर घर आई ही थी। तभी पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हुआ। वजह थी रमेश चंद्र का यह शक कि उसकी पत्नी के उसके भाई के साढ़ू से अवैध संबंध हैं।

विवाद इतना बढ़ गया कि रमेश चंद्र ने आपा खो दिया। उसने बांका उठाकर पत्नी के सिर और गर्दन पर ताबड़तोड़ वार किए। राजेश्वरी देवी की मौके पर ही मौत हो गई। मां की गोद में बैठी स्वाति को भी इस हमले में चोट आई। दोनों बेटियों ने अपनी आंखों के सामने मां को मरते देखा और उसी पल उनका बचपन भी छिन गया।

घटना की सूचना पुलिस को 19 नवंबर 2024 को मिली। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि घटना के बाद भी परिवार या गांव का कोई व्यक्ति आगे आकर शिकायत दर्ज कराने को तैयार नहीं हुआ। रिश्तों का डर और सामाजिक दबाव इंसाफ पर भारी पड़ता दिखा।

ऐसे में भुता थाने के दारोगा सुभाष चंद्र ने स्वयं वादी बनकर बीएनएस की धारा 103(1) और 117(2) के तहत आरोपी रमेश चंद्र के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। पुलिस जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई।

मामला एडीजे कोर्ट संख्या-05 में चला, जहां एडीजीसी दिगम्बर पटेल ने अभियोजन की ओर से कुल 10 गवाह पेश किए। इनमें सबसे अहम गवाह थीं आरोपी की अपनी बेटियां- 14 वर्षीय अपराजिता और पांच वर्षीय स्वाति।

कोर्ट में अपराजिता ने बताया कि वह कक्षा 9 की छात्रा है। स्कूल से लौटने पर उसने मां को चूल्हे पर खाना बनाते देखा और छोटी बहन स्वाति मां की गोद में बैठी थी। तभी पिता ने एक रिश्तेदार सुखवीर के घर अधिक आने को लेकर झगड़ा शुरू किया और अचानक बांका उठाकर मां पर हमला कर दिया।

पांच साल की स्वाति ने अपने मासूम शब्दों में अदालत से कहा- ‘झूठ बोलना गलत है। पापा ने ही मम्मी को मारा था।

इन शब्दों में न कोई कानूनी चालाकी थी, न सिखाया हुआ बयान, बस एक बच्चे का कड़वा सच था।

विशेष न्यायाधीश तबरेज अहमद ने बेटियों की चश्मदीद गवाही और मेडिकल रिपोर्ट को विश्वसनीय मानते हुए गुरुवार को आरोपी रमेश चंद्र को दोषी ठहराया। कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई और 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

कानून ने अपना काम कर दिया। आरोपी को सजा मिल गई। लेकिन सवाल अब भी खड़े हैं- इन बेटियों का सहारा कौन बनेगा? उस घर में मां की कमी कौन भरेगा?

यह मामला सिर्फ एक हत्या की फाइल नहीं है। यह उस सच की कहानी है, जहां दो नन्ही बेटियों ने इंसाफ के लिए अपने ही पिता के खिलाफ खड़े होने का साहस दिखाया और जहां न्याय की कीमत रिश्तों से चुकाई गई और सच, आंसुओं के रास्ते अदालत तक पहुंचा। यह फैसला कानून की जीत है, लेकिन यह भी याद दिलाता है कि कुछ सज़ाएं उम्रकैद से भी लंबी होती हैं, खासतौर पर उन बच्चों के लिए, जो सच के साथ जीने को मजबूर रह जाते हैं।

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SP_Singh AURGURU Editor