खामेनेई शासन के खिलाफ सबसे बड़ा विद्रोह, तेहरान से उठी आग की लपटों की तपिश दिल्ली तक, चाबहार–तेल–महंगाई पर संकट के बादल
तेहरान। ईरान में दिसंबर 2025 से शुरू हुआ जनआक्रोश अब एक राष्ट्रीय विद्रोह का रूप ले चुका है। 100 से अधिक शहरों में फैल चुके ये विरोध-प्रदर्शन आयतुल्लाह अली खामेनेई के शासन के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह पहला मौका है जब ईरान की सड़कों पर इतनी व्यापक और आक्रामक आवाज़ सुनाई दे रही है। गुरुवार सुबह से ही ईरान के 80 से अधिक शहरों पर जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। राजधानी तेहरान की सड़कों पर आज 10 से 12 लाख लोग निकले हुए हैं और खामनेई शासन के खात्मे की मांग कर रहे हैं। ईरान में जारी यह अस्थिरता भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि तेल, व्यापार, महंगाई और रणनीतिक परियोजनाओं से जुड़ा सीधा खतरा बन चुकी है।
क्यों भड़का ईरान? आर्थिक संकट से राजनीतिक विद्रोह तक
ईरान में विरोध की चिंगारी आर्थिक बदहाली से सुलगी है। ईरानी मुद्रा रियाल की ऐतिहासिक गिरावट के बाद बेलगाम महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में भारी उछाल ने लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।
आंदोलन की शुरुआत तेहरान के ग्रैंड बाजार से हुई, जहां व्यापारियों ने हड़ताल कर दी थी। जल्द ही ये प्रदर्शन राजनीतिक हो गए और सीधे खामेनेई सरकार के खिलाफ नारे लगने लगे। महिलाएं और युवा इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हजारों लोगों की मौत, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां और इंटरनेट ब्लैकआउट ने हालात और विस्फोटक बना दिए हैं।
भारत के लिए ईरान क्यों है रणनीतिक रीढ़?
ईरान भारत की विदेश नीति का एक बेहद अहम स्तंभ रहा है। भारत ने चाबहार बंदरगाह में करीब 500 मिलियन डॉलर (लगभग 4,000 करोड़ रुपये) का निवेश किया है। यह बंदरगाह पाकिस्तान को बायपास करता है। भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ता है। भारत की ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति की रीढ़ है। चाबहार–जाहेदान रेल लाइन का काम 2026 के मध्य तक पूरा होना था।
इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत से रूस और यूरोप तक माल पहुंचाने का सबसे छोटा रास्ता है। इससे समय में 40% और लागत में 30% तक की बचत होती है।
प्रतिबंधों के बावजूद ईरान भारत का अहम तेल स्रोत रहा है। भारत से ईरान को बासमती चावल, चाय और अन्य कृषि उत्पादों का निर्यात होते हैं। ईरान, BRICS और एससीओ जैसे मंचों पर भारत का रणनीतिक सहयोगी है।
भारत को फायदा या सीधा नुकसान?
ईरान की उथल-पुथल भारत के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है। अगर नई सरकार भारत समर्थक हुई तो चाबहार और INSTC परियोजनाओं में तेजी आएगी और व्यापार और कूटनीतिक पकड़ मजबूत होगी। लेकिन खतरे कहीं ज्यादा नजर आते हैं। चाबहार और रेल परियोजना में देरी या ठहराव आ सकता है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में उछाल, भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा है। अमेरिकी प्रतिबंध (CAATSA) दोबारा सख्त हो सकते हैं। चीन को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है क्योंकि ग्वादर बंदरगाह चाबहार से सिर्फ 170 किमी दूर है। ईरान को बासमती चावल निर्यात ठप होने से किसानों और निर्यातकों का पैसा फंसने का खतरा है।
ईरान में फंसे भारतीय, सरकार अलर्ट मोड में
भारत सरकार ने हालात की गंभीरता को देखते हुए ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। भारतीयों को प्रदर्शन वाले इलाकों से दूर रहने की सलाह दी गई है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास से लगातार संपर्क में रहने का निर्देश दिए गये हैं।
भारत सरकार की नीति: वेट एंड वॉच की है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत हालात पर करीबी नजर रखे हुए है। ईरान के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है। भारत किसी भी जल्दबाज़ी से बचते हुए अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है।
ईरान में जारी यह आंदोलन सिर्फ एक देश का आंतरिक संकट नहीं, बल्कि पूरे एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम है।
अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो तेल महंगा होगा, चाबहार अटकेगा और भारत की रणनीतिक योजनाओं को बड़ा झटका लग सकता है।