लार्ड मैकॉले का जिन्न बनाम नया भारत: गुलामी की ज़बान या सपनों का ग्लोबल पासपोर्ट?
मैकॉले की ‘गुलामी की ज़बान’ पर उठा विवाद अब 21वीं सदी के भारत में एक नए मोड़ पर है, जहां अंग्रेज़ी रोज़गार, तकनीक और ग्लोबल अवसरों की सबसे बड़ी कुंजी बन चुकी है। टियर-2 शहरों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक, इंग्लिश नई पीढ़ी के सपनों की अनिवार्य भाषा बन गई है। हिंग्लिश ने इसे देसी पहचान दी है, जबकि भाषा को लेकर राजनीतिक और सांस्कृतिक बहसें पहले से अधिक तेज़ हो गई हैं। आज सच यही है कि भारत अंग्रेज़ी के बिना चलेगा नहीं, और केवल अंग्रेज़ी के सहारे थमेगा भी नहीं।
-बृज खंडेलवाल-
नवंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में, चुनावी कोलाहल शांत होने के बावजूद, भाषाओं के मैदान में ऐसी गर्माहट पैदा हुई जिसने सर्दी में भी सियासी तापमान बढ़ा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक 1835 की उस मैकॉले शिक्षा नीति को निशाना बनाया, जिसने अंग्रेजी को भारतीय नियति में स्थायी रूप से जड़ दिया था। मोदी ने इसे सीधे "गुलामी की मानसिकता" कहकर खारिज किया और आह्वान किया कि 2035 तक, जब मैकॉले की नीति के 200 साल पूरे होंगे, भारत को इस मानसिक बोझ से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहिए।
उनकी यह बात, बिजली की गति से टीवी स्क्रीन्स और सोशल मीडिया तक पहुँची, और बहस तुरंत 1835 की धूल फाँकती फ़ाइलों से निकलकर, 2025 के इंग्लिश-मीडियम एडमिशन फ़ॉर्म, कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स और ओला-उबर की कैब-चैट्स तक आ गई। तर्क यह था: जिस भाषा को कभी औपनिवेशिक हथौड़ा कहा गया था, क्या वही आज लाखों नौकरियों और अरबों के सपनों का विश्वव्यापी दरवाज़ा नहीं है? क्या अंग्रेजी वाकई अब भी गुलामी की भाषा है, या वह 21वीं सदी के ग्लोबल पासपोर्ट में तब्दील हो चुकी है?
रामनाथ गोयनका व्याख्यान और अयोध्या के ध्वजारोहण मंच से मोदी ने जिस "मैकॉले मानसिकता" पर गहरी चोट की, समर्थकों ने उसे 'औपनिवेशिक विरासत से अंतिम मानसिक मुक्ति' बताया। वहीं, कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर ने 'इंडियन एक्सप्रेस' में तीखा लेख लिखकर आग में घी डाल दिया: “मैकॉले की मानसिकता को छोड़िए, अंग्रेज़ी भाषा को नहीं। यह हमारी वैश्विक ताक़त है, बोझ नहीं।”
लेकिन इस राजनीतिक जुबानी जंग से परे, ज़मीन पर भारत की कहानी कहीं अधिक जीवंत और दिलचस्प है। मुंबई की लोकल से बेंगलुरु के कैफे तक: इंग्लिश एक 'लाइफ़लाइन' बन चुकी है।
यह भाषा अब सिर्फ़ 'किताब' या 'क्लास' की वस्तु नहीं रही। मुंबई की लोकल ट्रेन में दो मज़दूर जब किराया बाँटते हुए अनायास "कंटैक्टलेस कार्ड" या "अपडेटेड वर्ज़न" कहते हैं, या बेंगलुरु के कैफ़े में ऑटो-चालक आत्मविश्वास से कहता है, “सर, लिंक भेज दीजिए”, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इंग्लिश शहरी धमनियों का हिस्सा बन चुकी है।
भारत का 1.4 अरब आबादी वाला यह बहुभाषी देश, जहाँ संविधान 22 भाषाओं को मान्यता देता है, वहाँ इंग्लिश एक ऐसी अदृश्य, सर्वव्यापी डोर बन गई है जो अलग-अलग भाषाई दुनियाओं को सहजता से जोड़ती है। यह सिर्फ़ नौकरी की नहीं, बल्कि एयरपोर्ट, बैंक, अस्पताल, मोबाइल ऐप्स और इंटरनेट की 'सामान्य ज़बान' (Lingua Franca) भी बन चुकी है।
2025 में, भारत में लगभग 26.5 करोड़ लोग अंग्रेज़ी बोलते हैं, यह संख्या दुनिया में दूसरे नंबर पर है। यह एक अजीबोगरीब ऐतिहासिक विडंबना है: गुलामी की भाषा ने ही आज़ादी के बाद की अर्थव्यवस्था को सबसे ज़्यादा गति दी है।
'गुड मॉर्निंग टीचर': टियर-2 शहरों का नया सपना
आगरा, जयपुर, भोपाल, नासिक, किसी भी टियर-2 शहर के हर दूसरे मोड़ पर "इंग्लिश-मीडियम स्कूल" का चमचमाता बोर्ड दिखता है। आगरा के आसपास गोवर्धन या टूंडला जैसे दूरदराज के गाँव तक स्कूल बसें पहुँच रही हैं, जहाँ से टाई लगाए, पीठ पर बैगपैक लादे, मैकॉले के नए 'दत्तक पुत्र' ज्ञान की तलाश में निकल रहे हैं।
आज ग्रामीण माता-पिता भी जानते हैं कि अंग्रेज़ी सीखना उनके बच्चे को केवल 'शहर' से नहीं, बल्कि 'नई दुनिया' से जोड़ेगा। यही कारण है कि आज भारत में 7 करोड़ से अधिक बच्चे इंग्लिश-मीडियम स्कूलों में पढ़ रहे हैं। उच्च शिक्षा में तो तस्वीर और भी साफ़ है: IIT हो, AIIMS हो, या कोई रिसर्च लैब, ज्ञान और भविष्य की सारी 'करेंसी' अंग्रेज़ी में छपी है।
एक अध्ययन बताता है कि अंग्रेज़ी में दक्ष ग्रैजुएट्स को औसतन 30–35% अधिक वेतन मिलता है। यह सिद्ध करता है कि भाषा अब सिर्फ़ 'स्किल' नहीं, सचमुच 'बाज़ार की करंसी' बन चुकी है।
हिंग्लिश और 'लिंग्विस्टिक एलीट' का उदय
शहरों में, अंग्रेज़ी सिर्फ़ सुविधा की भाषा नहीं, बल्कि स्टेटस सिंबल है। हाई-प्रोफाइल कॉफ़ी शॉप्स में लोग मातृभाषा भूलकर ऑक्सफ़र्ड-टोन में बातचीत करने की कोशिश करते हैं। 'हिंग्लिश' अब एक नई नफ़ासत, एक नई पहचान बन चुकी है। समाजशास्त्री कहते हैं कि भारत में एक नई "लिंग्विस्टिक एलीट" पैदा हुई है, एक अल्पसंख्यक वर्ग जो अंग्रेज़ी में सोचता है, नीतियाँ बनाता है, और देश के कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित करता है।
2025 में, भारत का अंग्रेज़ी-ट्रेनिंग बाज़ार अरबों डॉलर का हो चुका है। AI-आधारित ऐप्स से लेकर ऑनलाइन क्लासेज़ तक, सब मिलकर अंग्रेज़ी को और अधिक सुलभ बना रहे हैं।
दिलचस्प यह है कि अंग्रेज़ी का यह धागा पूरी तरह विदेशी नहीं बचा। देश की चाय की दुकानों, यूट्यूब, बॉलीवुड और रीलों ने इसे देसी बनाकर 'हिंग्लिश' के रूप में अपना लिया है। यह भारत की अपनी अंग्रेज़ी है, थोड़ी देसी, थोड़ी तेज़, और पूरी तरह भारतीय।
मैकॉले की आत्मा को यह देखकर ज़रूर हैरानी होगी कि जिस भाषा को उन्होंने 'क्लर्क पैदा करने' के लिए थोपा था, वही आज भारत की वैश्विक पहचान की रीढ़ बन गई है। आलोचक इसे भारतीय भाषाओं पर मानसिक गुलामी और पश्चिमी श्रेष्ठता का दबाव मानते हैं, जबकि समर्थक तर्क देते हैं कि इसी भाषा ने दलित, आदिवासी और गरीब युवाओं को कॉल-सेंटर से लेकर सिलिकॉन वैली तक पहुंचाने में सबसे बड़ा रोल निभाया है।
भारत आज एक ऐसे निर्णायक चौराहे पर खड़ा है जहाँ अंग्रेज़ी वह जिन्न है, जिसे बोतल में लौटाना संभव नहीं। ब्लैकबोर्ड से बोर्डरूम तक, एक सच्चाई साफ़ है: इस बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी सिर्फ़ इस्तेमाल नहीं की जाती, नई पीढ़ी (Gen Z) सपने भी अब इसी में देखने लगी है।