उत्तराखंड का पड़ोसी है नेपाल, वहां ऐसी त्रासदियां क्यों नहीं आतीं? सोचेंगे तो गलतियां पता चल जाएंगी

हिमालय क्षेत्र में बार-बार आने वाली आपदाएं भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं, जबकि समान भौगोलिक स्थितियों वाले नेपाल और भूटान में ऐसी घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं। इसका कारण भारत में अनियंत्रित विकास, पर्यावरण की अनदेखी और नीतिगत चूक है। यदि हमने प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बैठाया, तो त्रासदियां हमारी नियति बन जाएंगी। नेपाल-भूटान की पारिस्थितिकी-समझ से हमें सीखने की जरूरत है।

Aug 6, 2025 - 13:36
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उत्तराखंड का पड़ोसी है नेपाल, वहां ऐसी त्रासदियां क्यों नहीं आतीं? सोचेंगे तो गलतियां पता चल जाएंगी

- डा. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

ईश्वर न करे, फिर कोई उत्तराखंड के धराली जैसी आपदा हो 

इस भावना के साथ बात की शुरुआत करना जरूरी है कि ऐसी त्रासदियां फिर कहीं भी न घटें। न हमारे देश में, न हमारे पड़ोसी नेपाल और भूटान में। हम सब सुरक्षित रहें, प्रगति करें। पर एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक सवाल बार-बार परेशान करता है कि हिमालय की समान भौगोलिक संरचना के बावजूद, हमारे पड़ोसी देशों में ऐसी आपदाएं बार-बार क्यों नहीं आतीं, जैसी हमारे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, तवांग और कामेंग जैसे क्षेत्रों में आती हैं?

सवाल बड़ा है, जवाब और भी गहरे हैं

भारत, नेपाल, भूटान तीनों हिमालय के आंचल में बसे देश हैं। फिर ऐसा क्या है कि भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन, अचानक बाढ़, सड़कों-पुलों और गांवों के बह जाने जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं, जबकि नेपाल और भूटान में ऐसे हादसों की खबरें या तो बेहद कम आती हैं, या लगभग नहीं आतीं?

क्या वास्तव में वहां की नीतियां अधिक संतुलित और पर्यावरण के अनुकूल हैं? यह प्रश्न मात्र संदेह नहीं, बल्कि हमें आत्ममंथन की ओर ले जाने वाला यथार्थ है।

सिक्किम: विकास के बाद क्या बदला?

सिक्किम का भारत में विलय अपेक्षाकृत हालिया है। क्या वहां पहले भी आपदाएं इसी प्रकार आती थीं? या फिर यह नवीन विकास के अनियंत्रित स्वरूप का ही परिणाम है कि अब वहां भी बाढ़, भू-स्खलन और अन्य प्राकृतिक घटनाएं अधिक गंभीर रूप ले रही हैं? हमें यह जांचना होगा कि क्या विकास की दौड़ में हमने कहीं अपनी प्राथमिकताएं तो नहीं खो दीं?

क्या वास्तव में नेपाल-भूटान हमसे बेहतर कर रहे हैं?

कई रिपोर्टें बताती हैं कि नेपाल और भूटान ने अपनी पारिस्थितिकीय नीतियों को बेहद गंभीरता से लागू किया है। भूटान तो विश्व का पहला देश है जो ग्रॊस नेशनल हैप्पीनेस को जीडीपी से ज्यादा महत्व देता है। नेपाल में विकास की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी लेकिन प्राकृतिक सामंजस्य वाली रही है।

दोनों देशों में निर्माण, पर्यटन और शहरीकरण तो हुआ है, पर पर्वतीय पर्यावरण की सीमाओं का आदर करते हुए। जबकि भारत के कई पहाड़ी क्षेत्रों, खासकर उत्तराखंड और हिमाचल में निर्माण कार्यों की बाढ़ आ गई है। भले ही पहाड़ झेलने की स्थिति में न हों।

क्या हम सीखने को तैयार हैं?

भारत के पर्वतीय राज्य हर साल बादल फटने, लैंडस्लाइड, नदी उफान और बाढ़ जैसी आपदाओं का शिकार होते हैं। हर घटना के बाद कुछ हफ्ते शोर होता है, समितियां बनती हैं, जांचें होती हैं और फिर सब सामान्य। लेकिन क्या हमने यह सवाल खुद से कभी पूछा कि हमारी गलतियां क्या हैं?

हमने सड़कों को पहाड़ों को काट-काट कर बनाया, नदियों के किनारे होटल और रिज़ॉर्ट खड़े कर दिए, धार्मिक पर्यटन को बिना योजना के विस्तार दिया, और फिर जब प्रकृति अपने नियम याद दिलाती है, तो उसे 'आपदा' कह देते हैं।

विकास की दौड़ में संतुलन की आवश्यकता

विकास अनिवार्य है पर क्या हम विकास की सही परिभाषा और दृष्टिकोण पर चल रहे हैं? हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर किया गया विकास ही टिकाऊ होता है।

जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि हिमालय के पास अपनी एक सहनशीलता सीमा है, और उसे पार कर हम केवल विनाश की ओर बढ़ रहे हैं, तब तक उत्तरकाशी जैसी घटनाएं रुकेंगी नहीं।

अंत में: एक चेतावनी, एक याचना

मैं, जिसने वर्षों तक हिमालय को नजदीक से देखा है, उसका क्रोध और करुणा भी, यह कहना चाहता हूं कि समय अभी भी है। हमें अपने पड़ोसी देशों से सीखने की जरूरत है,  नेपाल और भूटान से। केवल इमारतें, पुल, और हाईवे बनाकर हम प्रगति नहीं कर सकते। हमें प्रकृति का सम्मान करना होगा, उसकी मर्यादा में रहकर जीना सीखना होगा। वरना, त्रासदियां हमारी पहचान बन जाएंगी, और हम केवल अफसोस करते रह जाएंगे।

 (लेखक सेना से सेवानिवृत्त हैं। आपने 12-13 वर्षों तक हिमालय की पहाड़ियों में कार्यरत रहकर हर हलचल को नजदीक से देखा है।)

SP_Singh AURGURU Editor