अब दिखानी होगी समझदारी: जीवाश्म ईंधन से वैकल्पिक ऊर्जा की ओर निर्णायक कदम बढ़ाइए
समझदार हम हैं, परन्तु समझदारी अब दिखनी भी चाहिये। सभी जानते हैं कि पेट्रोल, डीजल, गैस के लगातार होते इस्तेमाल से पर्यावरण पर कितना बुरा असर हो चुका है और होता जा रहा है। संसार भर के साईंटिस्ट पिछले कई वर्षों से इस विषय में कहते भी आ रहे हैं। वे अब और भी मुखर हो गये हैं।
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान
हमें वैकल्पिक ऊर्जा की ओर अनिवार्य रूप से तत्काल बढ़ जाना चाहिए। भारत के ग्लेशियर इतना जल्दी से पिघलते जायेंगे, यह कुछ वर्ष पहले सोच के भी परे था। पहाड़ों पर जगह-जगह सैलाब आते जा रहे हैं। सभी ने देखा कि कैसे उत्तराखंड का धराली गांव हाल ही में सैलाब में बह गया। पहले तो लोगों ने इसे बादल फटने का कारण बताया, परन्तु मौसम विभाग ने जब अपने आंकड़ों द्वारा यह स्पष्ट किया कि यह आपदा बादल फटने से नहीं हुई, तब लोग अन्य कारणों को खोज रहे हैं। बहुत सारे कारण हैं, जो एक-दूसरे के साथ इस बुरी तरह से उलझे हुए हैं कि एक सिरा भी ढूंढना मुश्किल है।
रूस के इलाके में एक बहुत विनाशकारी भूकंप आया था, जिसके बाद दूर-दूर तक सुनामी की आशंका बनी रही थी। नुकसान भूकंप के इलाके से बहुत दूर तक देखे गये। हम जमीन के मीलों अन्दर से तेल और गैस तो निकाल लेते हैं, पर यह नहीं सोचते कि नतीजा क्या होगा। जमीन की गहराई में अनेकों जीओलॉजिकल प्लेट हैं, जो हमारे विचार से बीच में तैरते तेल, पेट्रोलियम पदार्थों और मौजूद गैस की वजह से उतनी ताकत से नहीं टकरा पाते थे, जैसा कि अब, जब भारी मात्रा में तेल-गैस का दोहन लगातार होता जा रहा है। अब तक यह बढ़िया 'कुशन' की तरह टेकटॉनिक प्लेट्स को एक-दूसरे से टकराने से बचाता रहता था।
अब यह जीवाश्म ईंधन अत्यधिक निकलता चला जा रहा है, तब कैसे और कब तक 'टेकटॉनिक प्लेट्स' आपस में बुरी तरह न भिड़ने लगेंगी, जैसा अब हो रहा है। उदाहरण के तौर पर अंडे की क्रेट को देखिये। यदि अण्डों की क्रेट को हटा दिया जाये, तब भी क्या सभी अंडे सुरक्षित बने रहेंगे? कई अन्य विषयों के साथ-साथ हमें डिसास्टर मैनेजमेंट की भी जानकारी है। ब्रिटिश मैडिकल जर्नल और केनेडियन मेडिकल असोशियेशन जर्नल में कई वर्ष पहले जापान के फूरोशिमा में आपदा आने पर कुछेक लेख लिखे थे, जो प्रकाशित भी हुए। वहां हमने इन त्रासदियों के यही मूलभूत कारण बताये थे। शायद दुनिया को यह सच नहीं सुनना था, और न ही तेल उत्पादन बन्द करना था।
बहुत से व्यावसायिक घराने और अनेक तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल और गैस पर ही आधारित है। तेल बंद होने से उन पर असर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन यह सोचा नहीं गया कि वाहन उद्योग को क्या कठिनाई होगी, यदि उनके वाहन तेल और गैस से न चलकर वैकल्पिक ऊर्जा से चलने लगें। इससे प्राकृतिक आपदाओं को कम करने के साथ-साथ पर्यावरण को भी संभाला जा सकता है।
आज पर्यावरण पर बुरा असर है और बढ़ती आपदाओं को रोकने के लिए कुछ करना नितांत आवश्यक हो चुका है। बहुत देर पहले ही हो चुकी है। अब हमें नए ऊर्जा विकल्प तलाशने होंगे और पेट्रोल, डीज़ल, गैस की जगह ग्रीन फ्यूल की ओर अग्रसर होना होगा। वैसे भी भारत को अपनी आवश्यकता का अस्सी प्रतिशत से अधिक तेल और गैस आयात करना पड़ता है, जिसमें बहुत सारा धन, चाहे डॉलर हो, रुपया हो या रूबल, लगातार बाहर चला जाता है। इसका देश को कोई विशेष लाभ नहीं है।
पेट्रोल-डीज़ल-गैस के व्यापार से जुड़े देश अपना व्यापार करते रहें, परन्तु क्या यह आवश्यक है कि हम लगातार रूसी तेल और गैस का आयात करते जाएं, यह जानते हुए भी कि वैकल्पिक ऊर्जा भारत के लिए अति आवश्यक है? और जब अमेरिका ने भारत पर 50% टैरिफ केवल इस कारण लगाया है कि हम रूस से तेल खरीद रहे हैं, तो यह और भी गंभीर प्रश्न है।
समझदार तो हम हैं, लेकिन अब समझदारी दिखाने की बहुत अधिक आवश्यकता है। कहा भी जाता है कि ज़रूरत ही आविष्कार की जननी है। विकल्प मौजूद हैं बिजली चालित वाहनों के रूप में। पर आज उनका प्रचार कम और विरोध अधिक हो रहा है। सरकार को अब खुलकर समझदारी दिखाने का समय है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों को खुला प्रोत्साहन मिले। उनके नियम, कायदे-कानून सरल बनाए जाएं। उन पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क हटाए जाएं। प्रोत्साहन और मदद खुले तौर पर दी जाए, अन्यथा बदलाव सरलता से नहीं आ पाएगा।
सरकार को अपने एलईडी बल्ब कार्यक्रम का उदाहरण देखना चाहिए। यदि सरकार ने तब निर्णय न लिया होता और जनता व सरकारी अमले को प्रोत्साहित न किया होता, तो क्या एलईडी का जमाना इतनी आसानी से आ पाता?
पहल अब सरकार को करनी होगी। यह नहीं कि सरकार सब कुछ जानती न हो, लेकिन वह किस चिंता में रुकी हुई है? दोस्ती निभाने की? दोस्ती तो अनेक अन्य तरीकों से भी निभाई जा सकती है। देशहित के विषय में सोचने और निर्णय लेने का यही समय है। गरीबों को सस्ते, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बिजली चालित वाहन उपलब्ध कराने चाहिए। सब्सिडी देकर उन्हें और सस्ता किया जा सकता है। इससे दस-पंद्रह साल बाद वाली बातें भी बंद हो सकती हैं। देश को अपार लाभ होगा।
जो लोग फिर भी पेट्रोल, डीज़ल, गैस आदि से अपने वाहन और उद्योग चलाना चाहते हैं, उन्हें पर्यावरण की अतिरिक्त चिंता अवश्य करनी चाहिए।
(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं और कई पुस्तकों के लेखक हैं।)