आगरा में फिर बंद दरवाज़े के पीछे बुझी एक बुज़ुर्ग की ज़िंदगी, वृद्धाश्रम की बढ़ती ज़रूरत और बदलते पारिवारिक-सामाजिक ढांचे पर गहरे सवाल खड़े कर गई है यह मौत

फ्लैट के भीतर पसरी खामोशी, तीन दिन बाद उठती दुर्गंध और एक अकेला शव। आगरा में सिकंदरा के शिवम एलीगेंट अपार्टमेंट से लेकर पिछले महीने सीतापुर के दुर्गपुर तक की ये दो घटनाएं किसी संयोग की कहानी नहीं हैं। ये उस समाज का आईना हैं, जहां भीड़ के बीच बुज़ुर्ग भीतर से अकेले होते जा रहे हैं। रिटायर्ड इंजीनियर शैलेंद्र कुमार और सीतापुर में सेवानिवृत्त जिला विकलांग अधिकारी जावेद फारुकी की मौतें हमें झकझोरती हैं कि आधुनिक जीवन की रफ्तार में मानवीय रिश्ते कैसे पीछे छूटते जा रहे हैं।

Feb 1, 2026 - 11:27
Feb 1, 2026 - 22:39
 0
आगरा में फिर बंद दरवाज़े के पीछे बुझी एक बुज़ुर्ग की ज़िंदगी, वृद्धाश्रम की बढ़ती ज़रूरत और बदलते पारिवारिक-सामाजिक ढांचे पर गहरे सवाल खड़े कर गई है यह मौत

आगरा। आगरा शहर के सिकंदरा क्षेत्र स्थित शिवम एलीगेंट अपार्टमेंट के एक बंद फ्लैट से 78 वर्षीय रिटायर्ड इंजीनियर शैलेंद्र कुमार का शव बरामद हुआ। वे अकेले रहते थे। तीन दिन तक फ्लैट का दरवाज़ा नहीं खुला। पड़ोसियों को दुर्गंध महसूस हुई तो पुलिस को सूचना दी गई। फ्लैट खोले जाने पर शव के साथ ही पलंग के पास दवाइयां, फूड पैकेट और रोज़मर्रा की जरूरत का सामान मिला।
शैलेंद्र कुमार के गोद लिए पुत्र भारतीय सेना में हैं और पुणे में तैनात हैं। परिवार से दूर, शहर के बीचोंबीच रहते हुए भी शैलेंद्र कुमार भीतर से कितने अकेले थे, यह सवाल उनकी मौत के बाद और गहरा हो गया।

समाज बदल रहा है, रिश्ते सिमट रहे हैं

इस घटना से आहत डॉ. आलोक मित्तल, जो रोटरी क्लब और चिकित्सा पेशे के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हैं, कहते हैं, आज का सामाजिक परिदृश्य तेज़ी से बदल रहा है। एकल परिवार, कामकाजी जीवन की व्यस्तताएं और बच्चों का शिक्षा या रोज़गार के लिए बाहर बस जाना, इन सबके बीच बड़ी संख्या में वृद्धजन अकेलेपन, असुरक्षा और अवसाद से जूझ रहे हैं। संयुक्त परिवारों में सम्मान और संरक्षण पाने वाले बुज़ुर्ग आज स्वयं को सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।

डॊ. आलोक मित्तल का मानना है कि ऐसे समय में सामाजिक वृद्धाश्रम किसी विवशता का नहीं, बल्कि एक सकारात्मक और व्यावहारिक समाधान का प्रतीक बन सकते हैं। ऐसे स्थान जहां केवल रहने का ठिकाना नहीं, बल्कि साथ जीने, हंसने और सहारा बनने की संस्कृति हो।

सीतापुर की घटना: भीड़ के बीच घातक खामोशी

आगरा जैसा ही मामला पिछले महीने उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के दुर्गपुर में सामने आया था, जहां निजी आवास में 65 वर्षीय सेवानिवृत्त जिला विकलांग अधिकारी जावेद फारुकी का शव बिस्तर पर मिला। सीतापुर और आगरा के ये मामले आधुनिक सभ्यता की उस भयावह सच्चाई को उजागर करते हैं, जहां बाहर ज़िंदगी शोर मचाती है और भीतर मौत खामोशी से दस्तक दे देती है।

बुजुर्गों के सुगम जीवन के लिए लगातार कार्यरत सेंटर फॉर सेल्फ एंड करियर डेवलपमेंट (सीएससीडी) के डायरेक्टर डॉ. नवीन गुप्ता कहते हैं, बाहरी शोर के बीच भीतर की खामोशी घातक बन चुकी है। बाहर बहुत चहल-पहल दिखती है, लेकिन व्यक्ति भीतर से असहनीय एकाकीपन से जूझ रहा है। यह त्रासदी हमारे सामाजिक ताने-बाने और रिश्तों की औपचारिकता पर सवाल खड़े करती है।

डॊ. नवीन गुप्ता अफसोस जताते हुए कहते हैं, विडंबना यह है कि परिवार साथ रहते हुए भी दूर होते जा रहे हैं। बच्चे करियर की तलाश में केवल भौगोलिक ही नहीं, भावनात्मक दूरी भी बना रहे हैं। बुज़ुर्गों के लिए पूछना, सुनना और समझना धीरे-धीरे बोझ समझा जाने लगा है।

वृद्धाश्रम: कलंक नहीं, विकल्प

इसी खालीपन के बीच अच्छे वृद्धाश्रमों की मांग बढ़ रही है। यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है।
डॉ. नवीन गुप्ता बताते हैं कि कई बुज़ुर्ग मानने लगे हैं कि साल के कुछ महीने ऐसे स्थानों पर बिताना शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से अधिक उपयोगी हो सकता है।

आगरा को पहल करनी होगी

आगरा जैसे ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से सक्रिय शहर में सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं और नागरिक समूहों को संवेदनशील और आधुनिक सामाजिक वृद्धाश्रमों की दिशा में गंभीर पहल करनी होगी। ऐसे केंद्र न केवल सुरक्षित आश्रय देंगे, बल्कि मानवीय मूल्यों और आपसी सहयोग को भी सुदृढ़ करेंगे।

बुजुर्ग हमारी जड़ें, इन्हें सहारे की ज़रूरत है

वृद्धजन हमारे समाज की जड़ें हैं। उनका अनुभव हमारी धरोहर है। उन्हें दया नहीं, अपनापन चाहिए। शैलेंद्र कुमार और जावेद फारुकी की मौतें चेतावनी हैं कि अगर समाज ने समय रहते अकेलेपन को नहीं पहचाना, तो बंद दरवाज़ों के पीछे ऐसी खामोश मौतें बढ़ती चली जाएँगी।

SP_Singh AURGURU Editor