कैस्ट्रेशन से ही थम पाएगा आगरा में कुत्तों और बंदरों का आतंक: नसबंदी तो है घोटाले की जननी

कैस्ट्रेशन से न केवल कुत्तों और बंदरों की आबादी नियंत्रित होगी, बल्कि उनकी आक्रामकता भी खत्म होगी। आगरा के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विजय सिंघल कहते हैं, जैसे बैल और सांड की प्रवृत्ति में फर्क होता है, वैसे ही कैस्ट्रेशन से हिंसक जानवर शांत हो सकते हैं। नगर निगम द्वारा नसबंदी के नाम पर करोड़ों खर्च किए जाने के बावजूद कोई असर नहीं दिख रहा।

Aug 8, 2025 - 13:21
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कैस्ट्रेशन से ही थम पाएगा आगरा में कुत्तों और बंदरों का आतंक: नसबंदी तो है घोटाले की जननी

आगरा। बैल और सांड की प्रकृति में फर्क सिर्फ एक प्रक्रिया से होता है और वह प्रक्रिया है कैस्ट्रेशन (बधियाकरण)। यही फर्क कुत्तों और बंदरों पर भी उतना ही असरदार हो सकता है, जितना गौ वंश पर हुआ करता है। कैस्ट्रेशन केवल जनसंख्या नियंत्रण का उपाय नहीं, बल्कि हिंसा पर नियंत्रण का भी वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीका है।

आगरा में यह मसला इसलिए और भी गंभीर हो गया है क्योंकि नगर निगम नसबंदी के नाम पर सवा साल में 12 करोड़ रुपये खर्च कर चुका है, लेकिन न तो कुत्तों-बंदरों की संख्या घटी, न ही हमले थमे। वरिष्ठ पार्षद रवि माथुर इसे खुला घोटाला बताते-बताते थक चुके हैं, जिसके सत्यापन का कोई पुख्ता सिस्टम तक विकसित नहीं किया गया। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि अगर बैल बन सकता है शांत, तो सांड जैसे बर्ताव करने वाले कुत्तों और बंदरों जैसे जानवरों पर कैस्ट्रेशन क्यों नहीं?

शहर में कुत्तों और बंदरों के हमलों से त्रस्त लोग अब समाधान चाहते हैं। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. विजय सिंघल ने सुझाव दिया है कि जिस तरह सदियों से हमारे यहां गौ वंश का कैस्ट्रेशन किया जाता रहा है, उसी तर्ज पर कुत्तों और बंदरों का भी कैस्ट्रेशन किया जाए। इससे न केवल उनकी आबादी घटेगी, बल्कि वे आक्रामक भी नहीं रहेंगे।

डॉ. सिंघल का कहना है कि जिस बछड़े का कैस्ट्रेशन किया जाता है, वह बड़ा होकर सीधा-सादा बैल बनता है, जबकि बिना कैस्ट्रेशन वाला बछड़ा सांड बनता है जो स्वभाव से हिंसक होता है। हार्मोनल बदलावों के कारण ही यह अंतर आता है। यही प्रक्रिया कुत्तों और बंदरों पर भी लागू की जाए तो बच्चों व महिलाओं पर होने वाले हमलों में भारी कमी आ सकती है।

कैस्ट्रेशन सत्यापन योग्य प्रक्रिया है

डॉ. सिंघल का यह सुझाव मानकर नगर निगम इस पर अमल करे और कैस्ट्रेशन की प्रक्रिया कैमरे के सामने कराए तो इसका सत्यापन भी आसानी से हो सकेगा। इसमें पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार रोका जा सकता है। यदि कैस्ट्रेशन का डेटा व वीडियो सार्वजनिक किए जाएंगे तो नगर निगम पर से संदेह स्वतः दूर हो जाएगा। या फिर यूं कहिए कि नगर निगम में हो रहे कथित घोटाले पर लगाम लग जाएगी।

हालांकि नगर निगम का पशु कल्याण विभाग यह दावा भी करता है कि वह कुत्तों और बंदरों का कैस्ट्रेशन कराता है। जब भी शिकायत हुई है, चंद जानवरों के कैस्ट्रेशन के फोटो दिखाकर अधिकारी अपना बचाव कर लेते हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग ही है। शायद नगर निगम अधिकारी चाहते ही नहीं कि कुत्तों और बंदरों की संख्या घटे। यह घट गई तो नसबंदी के नाम पर चल रहे खेल भी बंद हो जाएंगे।

नसबंदी में 12 करोड़ खर्च, फिर भी बंदर और कुत्ते बढ़े

वरिष्ठ पार्षद रवि माथुर के अनुसार, नगर निगम ने पिछले डेढ़ साल में शहर के अंदर कुत्तों और बंदरों की नसबंदी अभियान पर लगभग 12 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। लेकिन इसके बावजूद न तो बंदरों की संख्या कम हुई और न ही कुत्तों की। उल्टा हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। रवि माथुर आरोप लगाते रहे हैं कि नसबंदी अभियान में भारी घोटाला चल रहा है, जिस पर कोई जांच तक नहीं बैठाई गई।

आपको बता दें कि नगर निगम सदन में वरिष्ठ पार्षद रवि माथुर इकलौते ऐसे पार्षद हैं, जो कुत्तों और बंदरों के नाम पर चल रहे अभियान को बड़ा घोटाला करार देते आ रहे हैं। वे सदन में बार-बार इस मुद्दे को उठा चुके हैं, लेकिन हार बार उनकी बात को जिम्मेदार अधिकारियों ने अनसुना ही किया है। नगर निगम प्रशासन की चुप्पी से यह साफ होता है कि पूरे सिस्टम में मिलीभगत है। आंकड़े बस कागजों पर हैं, धरातल पर कुछ नहीं।

नसबंदी नहीं, ‘दिखावा’ हो रहा है!

आज यह सवाल खड़ा हो गया है कि कुत्तों और बंदरों के नसबंदी अभियान की जवाबदेही कैसे तय की जाए? जब तक हर प्रक्रिया का प्रमाण नहीं होगा, तब तक जनता यह मानने को तैयार नहीं कि वास्तव में कुत्तों-बंदरों की नसबंदी हो रही है।

कैस्ट्रेशन से हो सकता है ट्रैकिंग सिस्टम

चूंकि कैस्ट्रेशन एक स्थायी प्रक्रिया है, इसका प्रभाव जानवरों के व्यवहार में भी दिखता है, अतः इसका प्रभाव भी दिखाई देगा। जबकि मौजूदा नसबंदी के नाम पर चल रही प्रक्रिया में ऐसा कोई स्पष्ट प्रभाव देखने को नहीं मिलता।

अंततः सवाल वही- जिम्मेदार कौन?

जनता पूछ रही है कि यदि करोड़ों की लागत से भी समस्या हल नहीं हो रही, तो दोषी कौन है? डॉ. सिंघल जैसे विशेषज्ञ जब वैज्ञानिक उपाय सुझा रहे हैं, तो सरकार व प्रशासन को अब जागना चाहिए। एक अनुत्तरित सवाल यह भी है कि अगर कैस्ट्रेशन अपना लिया जाएगा तो फिर घोटाले के रास्ते तो बंद ही हो जाएंगे।

SP_Singh AURGURU Editor