केवल हिन्दू शब्द ही साफतौर पर राष्ट्रीयता को करता है व्यक्त-मोहन भागवत

आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में कहा कि हमारी राष्ट्रीयता को साफ तौर पर व्यक्त करने वाला एक ही शब्द है, वह है हिंदू। उन्होंने कहा कि हमारी एकता का आधार हमारी संस्कृति है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसी देश में हिंसक मार्गों से परिवर्तन नहीं आता है।

Oct 2, 2025 - 11:59
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केवल हिन्दू शब्द ही साफतौर पर राष्ट्रीयता को करता है व्यक्त-मोहन भागवत


नागपुर । संघ के 100 साल होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक तरफ जहां समाज में विविधता में एकता की बात कही और कहा कि विविधता को भेद में नहीं बदलने देना चाहिए, वहीं उन्होंने फिर दोहराया कि हमारी राष्ट्रीयता को साफ तौर पर व्यक्त करने वाला एक ही शब्द है, वह है हिंदू। भागवत ने कहा कि छोटी बड़ी बातों पर, केवल मन के संदेह पर कानून हाथ में लेकर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करना ये प्रवृति ठीक नहीं। मन में प्रतिक्रिया रखकर, किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए शक्ति प्रदर्शन करना ऐसी घटनाओं के योजनापूर्वक कराया जाता है। उस चंगुल में फंसना नहीं चाहिए।

सनातन काल से चलता आया है हिंदू समाज

मोहन भागवत ने कहा कि हमारी एकता का आधार हमारी संस्कृति है। विविधता के साथ भी हम सबको मिलाने वाली भारतीय संस्कृति है, यह राष्ट्रीयता है, यही हमारे लिए हिंदू राष्ट्रीयता है। किसी को हिंदू शब्द से आपत्ति है तो वह हिंदवी कहे, भारतीय कहे, आर्य कहे। ये सारे समानार्थी शब्द हैं लेकिन इस राष्ट्रीयता को स्पष्ट रूप से निर्देशित करने वाला एक ही शब्द हमको मिलता है, वह है हिंदू। उन्होंने कहा कि ये राष्ट्र राज्य पर आधारित नहीं है। हमारे यहां नेशन स्टेट की कल्पना नहीं है। हमारी संस्कृति राष्ट्र को बनाती है। राज्य आते जाते रहते हैं, राष्ट्र निरंतर रहा है। सनातन काल से अब तक ये हमारा प्राचीन हिंदू राष्ट्र है। सब प्रकार के उतार चढ़ाव देखे पर हम सदैव विद्यमान है। इसलिए हिंदू समाज का बल संपन्न, शील संपन्न होना इस देश कि विकास , सुरक्षा, एकता की गारंटी है। क्योंकि हिंदू समाज सनातन काल से ही चलता आया है। वह इस देश का जिम्मेदार समाज है। उन्होंने कहा कि हम और वो इस मानसिकता से ये समाज पूरी तरह मुक्त था, मुक्त है और मुक्त रहेगा। वसुधैव कुटुंबकम की उदार विचारधारा का संरक्षक यही समाज रहा है। संघ 100 साल से हिंदू समाज को संगठित करने का काम कर रहा है।  

कई बर्तन साथ में होते हैं तो आवाज हो ही जाती है

संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में सब प्रकार कि विविधता का स्वागत है। बाहर से आई विचारधारा को भी हम पराया नहीं मानते, अलगाव से नहीं देखते। सबको मानते हैं स्वीकारते हैं। उन्हें भी सम्मान देते हैं। वह विशिष्टताएं भेद का कारण न बनें ये देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज देश में विविधताओं को भेद में उभारने की कोशिश चल रही है। समाज, देश, संस्कृति और राष्ट्र के नाते हम एक ही हैं। विविधताएं तो भाषा, पंथ, संप्रदाय, खानपान, रीतिरिवाज, रहने की जगह इसकी है। भागवत ने कहा कि सबकी अपनी विशिष्टताएं हैं, उनकी अपनी श्रद्धा है, महापुरुष हैं, पूजा के स्थान हैं। मन वचन कर्म से आपस में इनकी अवमानना नहीं होनी चाहिए।

मन के संदेह पर कानून हाथ में ना लें

भागवत ने कहा कि जब कई बर्तन साथ में होते हैं तो आवाज हो ही जाती है। इतने सारे लोगों के समाज में साथ रहने से कभी कभी कोई आवाज हो सकती है लेकिन होने पर भी नियम पालन करना, सद्भावपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। छोटी बड़ी बातों पर, केवल मन के संदेह पर कानून हाथ में लेकर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करना ये प्रवृति ठीक नहीं। मन में प्रतिक्रिया रखकर, किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए शक्ति प्रदर्शन करना ऐसी घटनाओं के योजनापूर्वक कराया जाता है। उस चंगुल में फंसना नहीं चाहिए। उसके परिणाम तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों दृष्टि से ठीक नहीं रहते। इस प्रवृति पर रोकथाम जरूरी है। उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन अपना काम बिना पक्षपात किए, बिना किसी दबाव में आए नियम के अनुसार करें। समाज की सज्जन शक्ति और युवा पीढ़ी को भी सजग और संगठित होना पड़ेगा और जरूरत के हिसाब से हस्तक्षेप भी करना पड़ेगा। ये अराजकता का व्याकरण है इसे रोकना ही पड़ेगा।

हिंसक मार्ग से समाधान नहीं

भागवत ने श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल में हुई उथलपुथल का जिक्र किया। साथ ही कहा कि कभी कभी प्रशासन संवेदनशील नहीं रहता, जनता की अवस्था को ध्यान में रखकर नीति नहीं बनती तो असंतोष रहता है पर उसका इस प्रकार व्यक्त होना किसी के लाभ की बात नहीं है। प्रजातांत्रिक मार्गों से भी परिवर्तन आता है। हिंसक मार्गों से परिवर्तन नहीं आता, उथल पुछल हो जाती है पर स्थिति वैसी ही रहती है। दुनिया भर में जहां भी ऐसी क्रांति आई उसने अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया। इस अराजकता की स्थिति में देश के बाहर की ताकतों को अपने खेल खेलने का मौका मिलता है। ये पड़ोसी, हमारे ही देश हैं... कुछ वर्ष पूर्व भारतीय थे। वे सब हमारे अपने देश हैं, आत्मीयता का संबंध है इसलिए चिंता होती है।
 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का शताब्दी समारोह और विजयादशमी उत्सव बड़े धूमधाम के साथ नागपुर में मनाया जा रहा है। समारोह में भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हैं। समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी शामिल हैं।

इस मौके पर दलाई लामा द्वारा भेजा गया संदेश भी पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने संघ को शुभकामनाएं दीं।  कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी अपने विचार व्यक्त किए और देश के प्रति सामाजिक जिम्मेदारियों और सेवा भाव पर जोर दिया। आरएसएस का यह शताब्दी समारोह और विजयादशमी उत्सव संघ की सेवा, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक योगदान को समर्पित है।

इस मौके पर रामनाथ कोविंद ने कहा, "आज का विजयादशमी उत्सव आरएसएस की शताब्दी का प्रतीक है। नागपुर की पावन भूमि आधुनिक भारत की महान विभूतियों जैसे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर से जुड़ी है।"

पूर्व राष्ट्रपति ने आरएसएस को एक "पवित्र, विशाल वट वृक्ष" के रूप में वर्णित किया, जो भारत के लोगों को एक साथ लाता है, उन्हें गौरव और प्रगति का अहसास कराता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ में पूरे भारत में श्रद्धा और एकाग्रता की लहर फैली, जबकि पहलगाम में आतंकवादियों ने धर्म पूछ कर निर्दोष नागरिकों की हत्या की। उन्होंने यह भी कहा कि सेना का योगदान विश्व स्तर पर देखा गया है और देश के भीतर संवैधानिक उग्रवादी तत्वों का सामना करना भी आवश्यक है।

इस दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा," ये वर्ष श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान का सढ़े तीन सौ वर्ष है...जिन्होंने अत्याचार, अन्याय और सांप्रदायिक भेदभाव से समाज के मुक्ति के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और समाज की रक्षा की। ऐसी एक विभूति उनका स्मरण इस वर्ष होगा। आज 2 अक्टूबर है तो स्वर्गीय महात्मा गांधी की जयंती है। अपने स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका योगदान अविस्मरणीय है लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत कैसा हो उसके बारे में विचार देने वाले हमारे उस समय के दार्शनिक नेता थे, उनमें उनका स्थान अग्रणीय हैं....जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण दिए ऐसे स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री का आज जयंती है। भक्ति, देश सेवा के ये उत्तम उदाहरण हैं."

ट्रंप की टैरिफ पर क्या बोले भागवत?

भागवत ने कहा कि अमेरिका ने टैरिफ अपने भले के लिए अपनाया होगा, लेकिन इसका असर सभी देशों पर पड़ेगा। उन्होंने जोर दिया कि भारत को किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और निर्भरता को मजबूरी में नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने स्वदेशी उत्पादों के उपयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया। भागवत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का होना जरूरी है, लेकिन यह मजबूरी का कारण नहीं होना चाहिए।