सत्ता, विरासत और रक्त–रिश्ते: अजित दादा के जाने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे कठिन मोड़ पर पवार परिवार, तेज हुई एनसीपी में नए डिप्टी सीएम और नेतृत्व की चर्चाएं
महाराष्ट्र की राजनीति में पवार फैमिली में बहुत कुछ देखा गया। टूट, जोड़, बगावत और सुलह। लेकिन अजित पवार के जाने के बाद जो खालीपन बना है, वह सिर्फ़ सत्ता का नहीं, बल्कि विश्वास, विरासत और पारिवारिक संतुलन का भी है। चाचा–भतीजे की यह सियासी कथा, जिसने दशकों तक राज्य की राजनीति को दिशा दी, अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है जहां हर उत्तर के भीतर नया सवाल छिपा है। अब सवाल यह आ खड़ा हुआ है कि अजित दादा के बाद उनकी उस राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का नेतृत्व कौन संभालेगा, जिसे उन्होंने चाचा शरद पवार से छीना था। चर्चाओं में यह सवाल भी है कि एनसीपी कोटे से नया डिप्टी सीएम कौन बनेगा?
बुधवार को अजित पवार के प्लेन हादसे में निधन के बाद से आज गुरुवार को उनके अंतिम संस्कार तक पूरी पवार फैमिली एक साथ खड़ी दिखी। यह एका दिखनी भी थी क्योंकि भले ही चाचा-भतीजे के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने विभाजन की रेखा खींच दी हो, लेकिन परिवारिक रिश्तों को दोनों ओर से पूरी गर्मजोशी के साथ निभाया गया। अजित दादा के जाने के बाद से ही यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब पार्टी के दोनों धड़े एक हो जाएंगे। एक नहीं होंगे तो फिर अजित दादा की पार्टी ने नये कैप्टन कौन होंगे।
2023 की बगावत: जब विरासत सत्ता से टकराई
यहां यह बताना जरूरी है कि साल 2023 में अजित पवार द्वारा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तोड़ना शरद पवार के लिए सिर्फ़ राजनीतिक झटका नहीं था, यह भावनात्मक आघात भी था। पार्टी का चुनाव चिह्न अजित पवार गुट को मिलना उस चोट को और गहरा कर गया। शरद पवार सार्वजनिक रूप से संयत रहे, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह साफ़ दिखा कि वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।
यह वही शरद पवार थे, जिन्होंने वर्षों तक अजित पवार को संगठन, सत्ता और प्रशासन, तीनों का चेहरा बनने दिया था।
2024: जवाब भी मिला, पलटवार भी हुआ
पार्टी के दो फाड़ होने के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में शरद पवार ने अपने अनुभव और नेटवर्क से यह दिखा दिया कि राजनीतिक वजूद अभी बरकरार है। राज्य में उनकी अगुवाई वाली एनसीपी ने अजित पवार गुट से कहीं अधिक सीटें जीतकर बगावत का करारा जवाब दिया था, लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते तस्वीर फिर पलटी। अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने ज़मीन पर शरद पवार गुट को पीछे छोड़ दिया और बड़ी संख्या में सीटें जीतकर अजित पवार छठी बार सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे।
यह मुकाबला बराबरी का नहीं था। यह ताक़त बनाम अनुभव की सीधी लड़ाई थी, जिसमें दोनों ने अपना-अपना सामर्थ्य साबित किया।
सुलह के संकेत: जब राजनीति से ऊपर रिश्ते दिखे
विधानसभा चुनावों के बाद माहौल बदला। निकाय चुनावों में, भाजपा से गठबंधन न बन पाने पर, पुणे और पिंपरी–चिंचवाड़ नगर निगम में चाचा–भतीजे के धड़े साथ आए। भले ही भाजपा को रोक न पाए हों, लेकिन यह संकेत साफ़ था कि दोनों परिवारों के दरवाज़े एक-दूसरे के लिए पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
इसी के बाद पवार परिवार में फिर से एक होने की चर्चाएं तेज़ हुईं। यह पवार परिवार की परंपरा रही कि राजनीति कितनी भी कठोर क्यों न हो, खून के रिश्ते पूरी तरह टूटे नहीं। इस बात का ख्याल दोनों ही ओर से रखा गया। इसका सबूत शरद पवार के पिछले जन्मदिन के मौके पर भी दिखा था जब अजित पवार अपने परिवार के साथ चाचा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने दिल्ली में उनके आवास पर पहुंचे थे।
उत्तराधिकार की टीस: जहां से दरार गहरी हुई
अजित पवार के मन में खटास तब बढ़ी जब शरद पवार ने उत्तराधिकारी के रूप में सुप्रिया सुले को आगे बढ़ाया। यहीं विरासत की राजनीति ने निजी पीड़ा का रूप लिया। अजित पवार को यह टीस हमेशा सालती रही कि मौका होने के बावजूद और सांगठनिक क्षमता व जनाधार साबित करने के बाद भी चाचा शरद पवार ने उन्हें मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंचने दिया। हालांकि तब उन्होंने चाचा के हर निर्णय को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया, लेकिन यह पीड़ा भीतर गहराती चली गई और उसका उभार बगावत रूपी विस्फोट के रूप में हुआ।
सुप्रिया–अजित: राजनीति से ऊपर रिश्ता
राजनीतिक टकराव के बावजूद, सुप्रिया सुले और अजित पवार के रिश्तों में मर्यादा बनी रही। ‘अजित दादा’ का संबोधन सुप्रिया का दिया हुआ था और वही नाम पूरे महाराष्ट्र में पहचान बन गया। पार्टी टूटने के बाद सुप्रिया के स्वर तल्ख हुए, लेकिन उनके शब्दों में हमेशा ‘अजित दादा’ ही रहा।
बारामती संसदीय सीट की वह लड़ाई, जहां सुप्रिया सुले के सामने अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार थीं, पारिवारिक राजनीति का सबसे तीखा अध्याय रही। जीत सुप्रिया की हुई, हार सुनेत्रा की। इसी प्रकार अजित पवार के सामने शरद पवार द्वारा अपने पौत्र (भाई के पौत्र) को मैदान में उतारा गया, जिसमें जीत अजित पवार की हुई। इसबाद में सुनेत्रा का राज्यसभा पहुंचना और दिल्ली में ननद–भाभी के आमने–सामने घर, यह सब दिखाता है कि इस परिवार ने राजनीति महत्वाकांक्षाओं के साथ पारिवारिक रिश्तों को हमेशा अहमियत दी। एक और उदाहरण सामने आया, जब पिछले दिनों पुणे की कीमती सरकारी जमीन को कौड़ियों में लेने के प्रयास के आरोप अजित पवार पर लगे तो उनके बचाव में चचेरी बहन सुप्रिया सुले उतर आई थीं।
अब सबसे बड़ा सवाल: विरासत किसके हाथ?
अजित पवार के जाने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है क्या एनसीपी के दोनों धड़े एक होंगे? अगर एक होते हैं, तो शरद पवार के बाद नेतृत्व कौन संभालेगा? क्या सुप्रिया सुले का नेतृत्व अजित पवार का परिवार स्वीकार करेगा?
अगर धड़े अलग रहे, तो अजित पवार की पार्टी को संभालने की चुनौती और गहरी है। सुनेत्रा पवार राजनीतिक रूप से अनुभवी नहीं हैं। पार्थ और रोहित पवार के पास भी जनसंघर्ष और संगठन का अनुभव नहीं है। ऐसे में क्या प्रफुल्ल पटेल जैसे अजित पवार के भरोसेमंद साथी पार्टी की कमान संभालेंगे, यह सवाल भी हवा में है।
गुरुवार को बारामती में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अजित पवार के अंतिम संस्कार के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर नेतृत्व और सत्ता संतुलन को लेकर हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में एनसीपी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री छगन भुजबल ने अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार से शोकाकुल माहौल में मुलाकात की। राजनीतिक गलियारों में इस भेंट को केवल औपचारिक शोक-संवेदना तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पार्टी के भावी नेतृत्व और सरकार में रिक्त हुए उप मुख्यमंत्री पद को लेकर अहम विमर्श के रूप में देखा जा रहा है।
अजित पवार के आकस्मिक निधन से महाराष्ट्र सरकार में उप मुख्यमंत्री का एक महत्वपूर्ण पद खाली हो गया है। चूंकि एनसीपी वर्तमान में एनडीए का हिस्सा है, इसलिए यह स्वाभाविक सवाल उठ खड़ा हुआ है कि यह रिक्त पद किसे सौंपा जाएगा। सत्ता समीकरण और गठबंधन संतुलन को देखते हुए यह पद एनसीपी के खाते में ही रहेगा, इस पर लगभग सभी घटक दल सहमत माने जा रहे हैं।
इसी बीच राजनीतिक चर्चाओं में यह अटकल तेज हो गई है कि सुनेत्रा पवार को राज्यसभा से इस्तीफा दिलाकर महाराष्ट्र का उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। समर्थकों का तर्क है कि अजित पवार की राजनीतिक विरासत, पार्टी पर उनकी पकड़ और पारिवारिक संतुलन बनाए रखने के लिहाज से सुनेत्रा पवार एक स्वीकार्य नाम हो सकती हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि सुनेत्रा पवार के पास प्रत्यक्ष प्रशासनिक या संसदीय अनुभव नहीं है, जो इस पद के लिए एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
वहीं, अजित पवार के बेटे को लेकर भी अटकलें जरूर हैं, लेकिन उम्र और संसदीय अनुभव की कमी के कारण फिलहाल उन्हें इस दौड़ से बाहर माना जा रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता यह भी समझते हैं कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भावनाओं के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता और गठबंधन की अपेक्षाओं को संतुलित करना बेहद जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, अजित पवार के जाने से खाली हुआ उप मुख्यमंत्री पद केवल एक संवैधानिक रिक्ति नहीं, बल्कि एनसीपी के भविष्य, नेतृत्व की दिशा और एनडीए के भीतर उसकी भूमिका से जुड़ा बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन गया है। प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल की सुनेत्रा पवार से मुलाकात को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है, जहां शोक के बीच सत्ता और संगठन की अगली तस्वीर गढ़ने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं।
राजनीति से आगे की कहानी
यह सिर्फ़ सत्ता की लड़ाई नहीं थी, यह परिवार, विरासत और पहचान की लड़ाई थी। अजित पवार के साथ एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ है, जिसमें निर्णय तेज़ थे, टकराव खुले थे और रिश्ते हर हाल में ज़िंदा। अब महाराष्ट्र की राजनीति पवार परिवार उस मोड़ पर है, जहां हर रास्ता कठिन है और हर फैसला इतिहास बनेगा।