रामू की चीख जंगल तक गूंज रही हैः 72 साल की हथिनी तड़प रही है, आदेश के बावजूद ट्रांसफर नहीं हुआ
उदयपुर/मथुरा। 72 साल की बूढ़ी हथिनी रामू इस वक्त जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। दशकों तक कैद और सड़कों पर भीख मांगने के बाद आज रामू की हालत इतनी गंभीर हो चुकी है कि वह चल भी नहीं सकती। पैर सड़ चुके हैं, नाखून झड़ चुके हैं, घाव गहरे हो चुके हैं और वह बमुश्किल सांस ले रही है।
उदयपुर के आवरी माता मंदिर के पास अस्थाई टेंट में रामू को ज़िंदा रखने की हर कोशिश की जा रही है। राजस्थान वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस की टीम द्वारा फ्लूइड थेरेपी, घावों की ड्रेसिंग, पोर्टेबल एक्स-रे और लेजर ट्रीटमेंट जैसे मेडिकल प्रयास जारी हैं। उसे हर 36 घंटे में हाइड्रा क्रेन से पलटा जाता है, ताकि स्थिति और न बिगड़े।
आदेश था, मगर पालन नहीं हुआ
अप्रैल 2024 में राजस्थान की हाई पॉवर कमेटी ने रामू और मोती नाम की दो हथिनियों को मथुरा के विशेष हाथी अस्पताल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया था। ये अस्पताल देश में हाथियों के लिए पहला और एकमात्र ऐसा संस्थान है, जहां विशेषज्ञ देखभाल उपलब्ध है। लेकिन रामू के मालिक और महावत ने कोर्ट के लिखित आदेश को मानने से इनकार कर दिया।
रामू को दर्दनाक मौत की ओर धकेल दिया गया
अब उसकी हालत इतनी नाजुक है कि उसे शिफ्ट करना भी संभव नहीं रह गया है। वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण कहते हैं, “अगर उसे समय पर अस्पताल भेजा गया होता, तो ये दिन नहीं देखना पड़ता।” उनके अनुसार, मोती की हालत भी तेजी से बिगड़ रही है और अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो दूसरी रामू बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।
ये जीवन और मृत्यु का सवाल है
बैजूराज एम.वी., डायरेक्टर, कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स, वाइल्डलाइफ एसओएस ने कहा, "क्रोनिक फुट रोट जैसी बीमारियां जानलेवा होती हैं। यह केस साफ बताता है कि पशु कल्याण के आदेशों को टालने का मतलब है- जानवर को मरने देना।"
अपील: अब और देरी मत कीजिए
वाइल्डलाइफ एसओएस ने फिलहाल मौके पर इमरजेंसी मेडिकल सपोर्ट उपलब्ध करा रखा है, लेकिन विशेषज्ञों और पशु प्रेमियों की यही अपील है कि मोती को तुरंत अस्पताल भेजा जाए, ताकि वह रामू जैसी तकलीफ से बच सके।