तो क्या सरकार थक चुकी है?  विकास की धीमी चाल: जुमलों का आकर्षण फीका पड़ा!

तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार की रफ्तार थम सी गई है। विमानन से शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, शहरों, न्यायपालिका और पुलिस तक लगभग हर क्षेत्र सुस्ती, संकट और अव्यवस्था से घिरा दिखाई दे रहा है। महंगे दावे और जमीनी हकीकत के बीच फर्क बढ़ा है, भ्रष्टाचार और पेंडेंसी ने सिस्टम को कमजोर किया है, जबकि जनता को राहत देने वाले साहसिक सुधार अब भी दूर हैं।

Dec 9, 2025 - 14:56
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तो क्या सरकार थक चुकी है?  विकास की धीमी चाल: जुमलों का आकर्षण फीका पड़ा!

-बृज खंडेलवाल-

2014 में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए सत्ता में आई, तो पूरा देश उम्मीदों की लहर में डूबा था। 'अच्छे दिन आने वाले हैं', स्वच्छ शहर, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, पारदर्शी नौकरशाही, ये नारे लोगों में नया जोश भर रहे थे। स्वच्छ भारत अभियान, स्मार्ट सिटी मिशन और नमामि गंगे जैसे योजनाएं एक आधुनिक भारत की झलक दे रही थीं।

लेकिन 2025 में, तीसरे कार्यकाल की शुरुआत होते-होते यह उत्साह ठंडा पड़ रहा है। सुधारों की तेज रफ्तार अब ठहराव और सुस्ती में बदल गई है। सरकार लगातार चुनावी मोड में उलझी रहती है, जिससे नीतियां आधी-अधूरी रह जाती हैं।

इस दौर का सबसे बड़ा झटका हवाई यात्रा के क्षेत्र को लगा है। कभी 'उड़ान' योजना को आम आदमी की उड़ान कहा गया था, लेकिन आज विमानन क्षेत्र गहरी मंदी में डूबा है। जून 2025 में एयर इंडिया फ्लाइट 171 की भयावह दुर्घटना, अहमदाबाद से टेकऑफ के महज 32 सेकंड बाद ईंधन कटऑफ से दोनों इंजन फेल हो गए, जिससे 241 यात्रियों में से 241 की मौत हो गई और जमीन पर 19 लोग हताहत हुए, ने सुरक्षा तंत्र की खौफनाक कमियों को उजागर कर दिया। डीजीसीए में स्टाफ की भारी कमी, अपर्याप्त ट्रेनिंग और रखरखाव में लापरवाही जैसी समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं।

और अब दिसंबर में इंडिगो की देशव्यापी उड़ानें ठप हो गईं, 2 दिसंबर से शुरू हुए पायलट कमी के संकट ने 400 से अधिक उड़ानें रद्द कर दीं, हजारों यात्री फंस गए। सरकार केवल 'निगरानी' की बातें करती रही, जबकि टिकटों के दाम आसमान छूने लगे, दिल्ली-मुंबई रूट पर 48,972 रुपये तक पहुंच गए। ईंधन कीमतों में 38% की बढ़ोतरी (2019 से 2025 तक) और कमजोर रुपए ने सालाना 10-15% की महंगाई को और भड़काया। घरेलू यात्रियों की संख्या भी रुक-सी गई, अप्रैल-अगस्त 2025 में महज 2.2% की वृद्धि, जुलाई में तो गिरावट दर्ज हुई। सरकार के पास जुगाड़ू समाधान हैं, लेकिन कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं।

शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों में समानता का वादा अभी भी अधूरा है। शिक्षा में जातिगत असमानताओं की 'छिपी अपार्थीड' जारी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 समावेशिता की बात तो करती है, लेकिन 78% स्कूलों में अभी भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है, बुनियादी सुविधाएं ही अपूर्ण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ड्रॉपआउट दर ऊंची बनी हुई है, और डिजिटल डिवाइड ने असमानता को और गहरा दिया है। 

स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति और भी नाजुक है। इलाज का खर्च अब भी ज्यादातर (39.4%) जनता की जेब से जाता है, 2014-15 के 62.6% से भले कमी आई हो, लेकिन यह बोझ गरीबों पर असहनीय है। आयुष्मान भारत को 'सभी के लिए' बताया गया, लेकिन ओपीडी, दंत चिकित्सा, कॉस्मेटिक सर्जरी जैसी सेवाओं को बाहर रखा गया है। अनौपचारिक क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों को पूर्ण लाभ नहीं मिल पा रहा, और ग्रामीण इलाकों में अस्पतालों की कमी से लोग तड़प रहे हैं, शहरी पूर्वाग्रह सिस्टम को चरमरा रहा है। सुधारों की कमी से पूरा तंत्र टूटने की कगार पर है। 

वर्तमान सरकार की पर्यावरण के प्रति बढ़ती उदासीनता हैरान करती है। अवैध खनन से पहाड़ लुप्त हो रहे हैं, नदियां दम तोड़ रही हैं। हिमालय में 2025 की भूस्खलन घटनाओं ने 200 से अधिक मौतें लीं, अगस्त में कश्मीर में 30, उत्तराखंड में 5+, और अक्टूबर में 60+ हताहत। जंगलों की कटाई और अनियंत्रित विकास परियोजनाएं मुख्य वजह हैं। गंगा में प्रदूषण घटने के बजाय बढ़ा है, जनवरी-अगस्त 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, 216 एसटीपी परियोजनाओं के बावजूद ज्यादातर (लगभग 97% बिहार जैसे राज्यों में) मानकों पर खरे नहीं उतर रहे।

अरावली संरक्षण में ढील देकर खनन की अनुमति ने खतरे की घंटी बजा दी, दिल्ली-एनसीआर में धूल, धक्कड़ और स्मॉग को खुला न्योता मिला। हर सर्दी एQI 400 पार कर जाता है; नवंबर 2025 में लगातार 'गंभीर' दिन दर्ज हुए। जंगलों में अतिक्रमण से हाथी मौतें 20% बढ़ीं, 2024-25 में ओडिशा में ही 106 हाथी मारे गए, राष्ट्रीय स्तर पर मानव-हाथी संघर्ष चरम पर। 

भारत के शहर बिना रोक-टोक के फैल रहे हैं, लेकिन स्थानीय संस्थाएं बेबस और अपंग नजर आ रही हैं। 2025 में भारत की लगभग 36% आबादी शहरी हो चुकी है, फिर भी शहर 'बदहाल' हैं। स्मार्ट सिटी मिशन में 1.53 लाख करोड़ रुपये खर्च के बावजूद जनवरी 2025 तक 7,479 में से 8,058 परियोजनाएं पूरी हुईं, 94% प्रगति दावा की जाती है, लेकिन ज्यादातर फंड टूटी सड़कों और नालियों के पैचवर्क में उड़ गया। पानी भराव, ट्रैफिक जाम, मेट्रो की ओवरलोडिंग, हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल है। 

सबसे बड़ी नाकामी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में रही। इसकी जड़ें नगरपालिकाओं से राज्य स्तर तक फैल चुकी हैं। 2025 में महाराष्ट्र सरकारी विभागों (राजस्व, भूमि रिकॉर्ड) में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए, पुलिस विभाग दूसरे नंबर पर। दिल्ली यूनियन टेरिटरी में दूसरे स्थान पर है, जहां मामले लगातार बढ़े। जांचें वर्षों लंबित हैं, जवाबदेही का कोई निशान नहीं। 

न्यायपालिका: फाइलें बढ़ती रहीं, फैसले अटके रहे

दिसंबर 2025 तक निचली अदालतों में 4.8 करोड़ से ज्यादा केस लंबित हैं, कुल मिलाकर 5.3 करोड़ से ऊपर। जजों की 4,855 रिक्तियां, ढीला सिस्टम, सब मिलकर भरोसे को हिला रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी 88,000+ पेंडेंसी रिकॉर्ड स्तर पर। 

पुलिस: रवैया वही पुराना, सिस्टम वही औपनिवेशिक

2006 के सुधार सिफारिशें फाइलों में धूल खा रही हैं। 2025 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि जाति-धर्म आधारित भेदभाव जारी है, रिश्वत और राजनीतिक हस्तक्षेप आम। इमरजेंसी कॉल्स पर औसत प्रतिक्रिया समय 12 मिनट से कम (कुछ शहरों में 5-6 मिनट), लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर देरी की शिकायतें बरकरार, जबकि फूड डिलीवरी ऐप्स, जोमैटो, ब्लिंकिट अक्सर दस मिनट में पहुंचते हैं। 

वीआईपी संस्कृति

आम जनता धक्के खा रही है, लेकिन खास लोग आगे सरक रहे। जनवरी 2025 के महाकुंभ में 30 लोगों की मौत हुई, वीआईपी जोन और भीड़ प्रबंधन की लापरवाही मुख्य कारण। विपक्ष ने इसे 'वीआईपी संस्कृति' का परिणाम बताया। नेताओं का अहंकार बढ़ता जा रहा है, हर जगह 'सवाल मत पूछो' का लहजा बरकरार है। 

तीसरे कार्यकाल की यह मुश्किल यात्रा ऊंचे दावों से भरी है, लेकिन रफ्तार धीमी पड़ चुकी है। सरकार सुधारों को टाल रही, न पंचायतों को सशक्त बना रही, न राज्यों को अधिक अधिकार दे रही। आरएसएस-भाजपा के बीच मतभेद की अफवाहें बढ़ रही हैं, नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा होते ही खामोशी। एनडीए का तीसरा दौर तभी सफल होगा, जब सरकार सुस्ती त्यागे, साहसिक सुधार करे, सत्ता का विकेंद्रीकरण सुनिश्चित करे और 2014 जैसा जोश लौटाए।

SP_Singh AURGURU Editor