मुम्बई, मथुरा और गोकुल के 'हांडी उत्सव' की झलक दर्शाने को बना था गीत 'गोविंदा आला रे...'

1963 की फिल्म ब्लफ मास्टर का गीत गोविंदा आला रे... शम्मी कपूर की ऊर्जा, रफ़ी की आवाज़, राजेन्द्र कृष्ण की लेखनी और कल्याणजी-आनंदजी के संगीत से जन्मा। यह गीत मुंबई और मथुरा-गोकुल के दही-हांडी उत्सव की झलक पेश करता है और आज भी जन्माष्टमी का सबसे लोकप्रिय फ़िल्मी गीत है।

Aug 18, 2025 - 18:27
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मुम्बई, मथुरा और गोकुल के 'हांडी उत्सव' की झलक दर्शाने को बना था गीत 'गोविंदा आला रे...'

-सीपी सिंह सिकरवार-

गोविंदा आला रे.... हिंदी सिनेमा का एक अमर गीत है। यह 1963 की फिल्म ब्लफ मास्टर का है जिसके निर्देशन मनमोहन देसाई के पिता के. अमरनाथ ने किया था। गायक मोहम्मद रफ़ी थे। संगीतकार कल्याणजी, आनंदजी और गीतकार राजेन्द्र कृष्ण थे।

फिल्म में शम्मी कपूर एक मस्तीखोर, शरारती और रंगीन स्वभाव का नायक है। राजेन्द्र कृष्ण ने सोचा कि शम्मी के व्यक्तित्व और कृष्ण-भक्ति दोनों को जोड़ते हुए एक ऐसा गीत होना चाहिए जो जनमानस के दही-हांडी उत्सव से भी जुड़ सके। इसीलिए गोविंदा आला रे… की पंक्तियां रची गईं। ये मुंबई और मथुरा–गोकुल दोनों की झलक एक साथ पेश करती हैं। शम्मी कपूर उस दौर में याहू मैन कहे जाते थे। उनका नृत्य और ऊर्जा गीत को जीवंत बनाती थी।

शूटिंग के समय वास्तविक दही-हांडी उत्सव जैसा माहौल रचा गया। शम्मी कपूर सचमुच युवाओं के साथ फिल्म में एक मस्तीखोर, शरारती और रंगीन स्वभाव के नायक नजर आते हैं। उनका नृत्य और ऊर्जा गीत को जीवंत बनाती थी। शम्मी कपूर सचमुच युवाओं के साथ पिरामिड पर चढ़े और दही-हांडी तोड़ने का अभिनय किया। कई बार वे बिना डुप्लीकेट खुद ही ऊंचाई पर चढ़ गए, जिससे गाने में असली जोश और जोखिम दिखाई देता है। कल्याणजी–आनंदजी ने इसकी धुन लोकसंगीत और बांसुरी-ढोलक की लय पर गढ़ी। रफ़ी साहब की गूंजती आवाज़ ने इसे उत्सव गीत बना दिया, जो दशकों से जन्माष्टमी पर बजता है।

राजेन्द्र कृष्ण ने गीत की पंक्तियां रचते समय मुंबई के दही-हांडी उत्सव की भीड़ को देखा था। कहते हैं कि वे गीत लिखते समय शम्मी कपूर की मस्ती को सामने रखकर शब्द गढ़ते थे, इसलिए इसमें नाच-गान, मटकी-फोड़ और जोश सब कुछ झलकता है।

यह गीत न सिर्फ फिल्म का हाइलाइट बना, बल्कि आज तक जन्माष्टमी का सबसे लोकप्रिय फ़िल्मी गीत है। कई जगह वास्तविक दही-हांडी प्रतियोगिताओं में इसे बजाना परंपरा बन गया है।

इस तरह, राजेन्द्र कृष्ण की लेखनी, कल्याणजी–आनंदजी का संगीत, रफ़ी साहब की आवाज़ और शम्मी कपूर की अदायगी ने मिलकर इस गीत को अमर कर दिया।

SP_Singh AURGURU Editor