पुस्तक प्रेम दिवस नौ अगस्त पर विशेष: एक नशा जो आत्मा को उजास देता है

प्रेम एक ऐसी अनुभूति है, जो जीवन को धरती पर रहते हुए भी स्वर्ग जैसा बना देती है। यह प्रेम चाहे परिवार का हो, प्रकृति या भक्ति का, लेकिन जो प्रेम पुस्तकों से किया जाता है, वह व्यक्ति को दिव्य और तेजस्वी बना देता है। किताबों से प्रेम एक नशा है, लेकिन यह किसी अन्य नशे जैसा नहीं होता। यह नशा आत्मा को मांजता है, सोच को चमकाता है और व्यक्तित्व को निखारता है।

Aug 8, 2025 - 12:14
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पुस्तक प्रेम दिवस नौ अगस्त पर विशेष: एक नशा जो आत्मा को उजास देता है

प्राचीन काल में जब धन, सोना और भूमि संपत्ति का प्रतीक माने जाते थे, तब भी राजा-महाराजाओं, विद्वानों और समाजसेवियों ने पुस्तकालयों की स्थापना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। पांचवीं सदी से ही पुस्तकालय ज्ञान और संस्कृति के केन्द्र रहे हैं।

लेकिन दुर्भाग्यवश भारत में कई ऐतिहासिक पुस्तकालय विदेशी आक्रांताओं की दुर्भावनाओं के शिकार हुए। फिर भी भारत की परंपरा में ज्ञान के ये मंदिर समय-समय पर स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा पुनः स्थापित होते रहे।

हर वर्ष 9 अगस्त को राष्ट्रीय पुस्तक प्रेमी दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन सभी लोगों को समर्पित है जो पुस्तकों से प्रेम करते हैं, साहित्य में रुचि रखते हैं और लेखन को जीवन की धारा मानते हैं।

इस दिन देशभर में गोष्ठियों, काव्य-पाठ, पुस्तक चर्चाओं और साहित्यिक आयोजनों के ज़रिए पुस्तक प्रेम को जाग्रत किया जाता है। यह अवसर है पुस्तक के उस महत्व को रेखांकित करने का, जो जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाती है।

किताबें केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं, बल्कि वे आत्मा को ऊर्जा, मन को दृढ़ता और जीवन को दिशा देती हैं। पुस्तक प्रेमी व्यक्ति समाज में सम्मान से सिर उठाकर जीता है।  वह किसी भौतिक वस्तु से नहीं डरता, क्योंकि उसका आत्मविश्वास, सोच और तर्क प्रबल होता है। पुस्तकों से मिलने वाला ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता, न ही चोरी हो सकता है।

आज पुस्तकालयों की स्थिति दयनीय होती जा रही है। अधिकांश स्कूल, कॉलेज और संस्थानों में पुस्तकालयों की हालत जर्जर है, क्योंकि न तो प्रशासन और न ही सरकार इसे प्राथमिकता देती है।

इंटरनेट की सहज उपलब्धता ने भी लोगों को भ्रमित कर दिया है कि अब किताबों की ज़रूरत नहीं रही। किताब किराए पर देने वाली परंपरा, जो कभी हर गली-मोहल्ले में सक्रिय थी, अब समाप्त हो चुकी है।

आगरा शहर में कभी राजवंशों, बुद्धिजीवियों और सेठों द्वारा बनाए गए दर्जनों पुस्तकालय आज बदहाली की कगार पर हैं। नगर निगम के अधीन जॉन्स पुस्तकालय को अब भाई अधीश भटनागर पुस्तकालय के रूप में नया रूप मिला है, लेकिन बाकी पुस्तकालय सरकार और पीपीपी मॉडल की बाट जोह रहे हैं।

कुछ सच्चे पुस्तक प्रेमियों ने हार नहीं मानी है। कई लोग अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा किताबों पर खर्च कर अपने घरों में निजी पुस्तकालय बना चुके हैं। कई जगहों पर निजी तौर पर वाई-फाई, चाय, कॉफी के साथ पुस्तकालय स्थापित किए गए हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। यह नवाचार एक उम्मीद है कि पुस्तक प्रेम को फिर से जीवंत किया जा सकता है।

साहित्यकारों, पुस्तक प्रेमियों और लेखकों को चाहिए कि वे एक साझा मंच बनाकर एक-दूसरे से पुस्तकों की बॉर्डरिंग करें। यह न केवल विचारों का आदान-प्रदान होगा, बल्कि नए पाठकों को भी जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकता है।

आज के समय में कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा सीएसआर फंड का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक कार्यों में किया जाता है। पुस्तकालयों के विकास के लिए भी इस फंड का उपयोग किया जाना चाहिए। सामाजिक संस्थाएं, स्कूल और स्वयंसेवी संगठन मिलकर पुस्तकालयों को फिर से सशक्त बना सकते हैं।

एक शिक्षक, एक पत्रकार या एक साहित्यकार के लिए निरंतर ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया जीवनदायिनी है। किताबें न केवल पढ़ने वाले को सजाती हैं, बल्कि समाज को भी संवेदनशील और सशक्त बनाती हैं।

इस पुस्तक प्रेमी दिवस पर आइए संकल्प लें कि पुस्तकों को सिर्फ अलमारी की शोभा न बनने दें, उन्हें जीवन का हिस्सा बनाएं। किताबों से प्रेम कीजिए, क्योंकि यही प्रेम आपको सबसे श्रेष्ठ बनाता है।

-राजीव गुप्ता ‘जनस्नेही कलम से’

लोकस्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor