पिता और भतीजे के कंधों का सहारा लेकर मानवाधिकार आयोग को अपनी पीड़ा बताने पहुंचा राजू, किरावली थाने में थर्ड देकर तोड़ दिये गये थे दोनों पैर, आयोग ने चार सप्ताह में मांगी विस्तृत रिपोर्ट
आगरा। किरावली थाने में पुलिस द्वारा राजू नामक युवक को अमानवीय यातनाएं दिए जाने के मामले में उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने गुरुवार को आगरा में मंडलायुक्त सभागार में पीड़ित की सुनवाई की। मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नरेश पारस पीड़ित राजू को लेकर आयोग के समक्ष पेश हुए।
चलने-फिरने में असमर्थ पीड़ित राजू अपने पिता और भतीजे के कंधों का सहारा लेकर मंडलायुक्त सभागार पहुंचा। वहां उसने आयोग के समक्ष अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि किरावली थाने में उसके साथ न केवल मारपीट की गई, बल्कि उसे उल्टा लटकाकर इस कदर पीटा गया कि उसके दोनों पैर टूट गए। पीड़ित ने आयोग को अपने घायल पैरों के एक्स-रे और अन्य चिकित्सकीय दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।
जनसुनवाई की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष राजीव लोचन ने एक अन्य सदस्य के साथ की। सुनवाई के दौरान पुलिस प्रशासन की ओर से अवगत कराया गया कि आरोपित पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। इस पर आयोग के अध्यक्ष ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया है, तो इससे यह सिद्ध होता है कि घटना हुई है। आयोग ने मामले को गंभीर मानते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की और संकेत दिए कि रिपोर्ट के आधार पर आगे आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नरेश पारस ने आयोग के समक्ष मांग रखी कि केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है, बल्कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के उत्पीड़न का नहीं, बल्कि कानून के रखवालों द्वारा कानून को कुचलने का उदाहरण है। यदि ऐसे मामलों में सख्त और निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, तो आम जनता का पुलिस और व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।
बता दें कि नरेश पारस ने ही इस प्रकरण की शिकायत उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराई है, जिसके क्रम में आयोग ने 5 फरवरी को मंडलायुक्त सभागार में जनसुनवाई की सूचना दी थी। नरेस पारस ने बताया कि आयोग द्वारा सुनवाई का समय पांच फरवरी को सुबह 10 बजे से निर्धारित किया गया था, जबकि उनके पास आज सुबह साढ़े दस बजे जगदीशपुरा थाने से फोन आया कि आयोग द्वारा की जाने वाली सुनवाई का नोटिस थाने आकर रिसीव कर लें। इससे साबित होता है कि पुलिस नहीं चाहती थी कि पीड़ित या वे स्वयं (नरेस पारस) समय पर आयोग के समक्ष पहुंच पाएं। हालांकि उन्होंने नोटिस व्हाट्सएप पर मंगवाया और फिर पीड़ित राजू को पिता और भतीजे के सहारे आयोग के समक्ष लेकर पहुंचे।
जनसुनवाई के दौरान मौजूद अधिकारियों और आयोग के सदस्यों ने पीड़ित की दयनीय स्थिति को देखकर संवेदना व्यक्त की और भरोसा दिलाया कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।