यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक से सवर्ण आक्रोश में घिरी केंद्र सरकार को संजीवनी, भाजपा नेताओं की आई जान में जान, लेकिन सवाल अब भी कायम- आख़िर ऐसे नियम क्यों लाए गए जिन्होंने पार्टी के कोर वोटर सामान्य वर्ग को ही हाशिए पर खड़ा कर दिया?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नये इक्विटी रेगुलेशन–2026 पर रोक लगाए जाने से केंद्र सरकार और भाजपा को उस राजनीतिक संकट से बड़ी राहत मिली है, जो सामान्य वर्ग के तीखे विरोध के कारण गहराता जा रहा था। इस फैसले से आंदोलन की तीव्रता कुछ कम हुई और भाजपा नेताओं को तत्काल दबाव से राहत मिली है। हालांकि सवर्ण समाज के भीतर नाराज़गी और सवाल अब भी कायम हैं कि ऐसे नियम आखिर क्यों लाए गए। अदालत की रोक ने संकट टाला है, लेकिन भाजपा के लिए भरोसा बहाल करने की चुनौती अभी बाकी है।
-एसपी सिंह-
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी को उस राजनीतिक संकट से बाहर निकाल दिया है, जो यूजीसी के नये इक्विटी रेगुलेशन–2025 के बाद तेज़ी से गहराता जा रहा था। शीर्ष अदालत द्वारा इन नियमों पर रोक लगाए जाने को केवल एक कानूनी आदेश भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भाजपा के लिए राजनीतिक संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है। खासकर सामान्य वर्ग से जुड़े भाजपा नेताओं के लिए यह फैसला बड़ी राहत बनकर आया है, जो बीते कई दिनों से आंदोलनकारी युवाओं के सीधे निशाने पर थे।
यूजीसी के नये इक्विटी रेगुलेशन लागू होते ही उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में सामान्य वर्ग के युवाओं का गुस्सा सड़कों पर उतर आया था। विश्वविद्यालय परिसरों से निकलकर यह विरोध भाजपा नेताओं के घरों तक पहुंच गया था। कहीं पोस्टर लगाए गए, कहीं नारेबाज़ी हुई और कहीं यह दबाव बनाया गया कि भाजपा नेता भी खुलकर इन नियमों का विरोध करें। स्थिति यह बन गई थी कि पार्टी के सवर्ण चेहरे खुद को असहज और असुरक्षित महसूस करने लगे थे। आंदोलनकारियों का सीधा सवाल था- जब सरकार भाजपा की है, तो ऐसे नियम क्यों लाए गए जो सामान्य वर्ग को हाशिए पर धकेलते हैं।
इस उबाल ने भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी थी। कारण साफ था- सामान्य वर्ग भाजपा का वह कोर वोट बैंक है, जिसने कमजोर दौर में भी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। चाहे सत्ता में रहकर निर्णय लेने का दौर हो या विपक्ष में संघर्ष का समय, सवर्ण समाज भाजपा के साथ खड़ा रहा है। ऐसे में उसी समाज के भीतर से उठती नाराज़गी पार्टी के लिए खतरे की घंटी थी। शायद यही वजह रही कि पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी सामने आकर यूजीसी के इन नियमों पर सवाल उठाने पड़े।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी ने इन नियमों को बनाते समय सवर्ण समाज की संभावित प्रतिक्रिया का सही आकलन नहीं किया। नियमों का उद्देश्य चाहे समानता और समावेशन बताया गया हो, लेकिन सामान्य वर्ग ने इसे अपने अधिकारों पर सीधा प्रहार माना। विरोध जिस तेजी से फैल रहा था, उससे यह डर सताने लगा था कि कहीं यह असंतोष भाजपा से स्थायी दूरी का कारण न बन जाए।
ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप केंद्र सरकार और भाजपा दोनों के लिए राहत की सांस लेकर आया। अदालत द्वारा नये इक्विटी रेगुलेशन पर रोक लगते ही आंदोलन की धार कुछ हद तक कुंद पड़ी और भाजपा नेतृत्व को भी यह कहने का अवसर मिल गया कि मामला अब न्यायिक विचाराधीन है। यानी राजनीतिक तौर पर जिस फांस में पार्टी फंसती जा रही थी, उसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक झटके में ढीला कर दिया।
हालांकि, यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही। सवर्ण समाज के भीतर सवाल अभी भी जिंदा हैं। पार्टी से यह पूछा जाना तय है कि आखिर किस सोच के तहत ऐसे नियम लाए गए। क्या सामान्य वर्ग को भाजपा अपना बंधुआ समर्थक मानकर उसके हितों की अनदेखी कर सकती है? क्या पार्टी को यह अधिकार है कि वह अपने सबसे पुराने समर्थक वर्ग पर बिना संवाद के नीतियां थोप दे? ये सवाल अब भी भाजपा के सामने खड़े हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में भाजपा को वह पुराना अनुभव भी याद दिलाया जा रहा है, जब सवर्ण समाज ने असंतोष का सीधा राजनीतिक संदेश दिया था। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच का आदेश दिया गया था, लेकिन मोदी सरकार ने दलित संगठनों के दबाव में आकर उस फैसले को संसद के जरिए पलट दिया। इस कदम को सवर्ण समाज ने अपने हितों की अनदेखी के रूप में देखा और नाराज़गी खुलकर सामने आई। नतीजा यह हुआ कि उसी साल हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों में सत्ता गंवानी पड़ी। यह अनुभव भाजपा के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जाता है कि सवर्ण समाज की उपेक्षा केवल सामाजिक असंतोष ही नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक नुकसान का कारण भी बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भले ही तत्काल संकट टाल दिया हो, लेकिन यह भी साफ कर दिया है कि नीतिगत फैसलों में सामाजिक संतुलन और संवाद की अनदेखी भारी पड़ सकती है। आने वाले समय में भाजपा को सिर्फ अदालत की आड़ नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी सवर्ण समाज के भरोसे को दोबारा मजबूत करना होगा।