तेल की गुलामी से मुक्ति का समय: क्या भारत वैकल्पिक ऊर्जा से विश्व राजनीति का खेल बदल सकता है?
तेल आधारित वैश्विक राजनीति भारत पर दबाव बना रही है, जिससे अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं। भारत के लिए जरूरत तेल निर्भरता से मुक्ति और वैकल्पिक ऊर्जा की ओर निर्णायक कदम बढ़ाने की। ऊर्जा परिवर्तन से भारत न केवल दबाव-मुक्त होगा, बल्कि आत्मनिर्भर और पर्यावरण-संतुलित विकास की राह पकड़ेगा। आगामी बजट में इस दिशा में ठोस नीतिगत पहल भारत का भविष्य बदल सकती है।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
आज की वैश्विक राजनीति पर तेल का खेल हावी है। लालच, दबाव और वर्चस्व, तीनों का केंद्र तेल बन चुका है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि किसी देश के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उठा ले जाना भी व्यावहारिक कूटनीति समझा जाने लगा है। तेल पर कब्ज़ा यानी ताक़त, हैसियत और दबदबा।
भारत में भी तेल रोज़मर्रा की ज़रूरत है। वर्षों तक इसकी आपूर्ति खाड़ी देशों से होती रही, लेकिन अब बड़ा हिस्सा मित्र देश रूस से आ रहा है। इसी वजह से भारत पर अमेरिका का जबरदस्त दबाव है। रूस से तेल खरीदने पर सवाल, ऊपर से 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ, जो हालात के मुताबिक कभी 500 प्रतिशत तक उछल जाता है, भारत की अर्थव्यवस्था को सीधा झटका देता है।
भावनाओं से हटकर देखें तो भारत की मूल नीति हमेशा संतुलन और मित्रता की रही है। न अमेरिका से टकराव, न रूस से दूरी, न खाड़ी देशों से वैमनस्य। भारत शांति प्रिय है और यही उसकी तासीर भी है। लेकिन सवाल यह है कि अगर भारत तेल पर निर्भरता ही खत्म करने का फैसला कर ले तो?
जब तेल ही नहीं खरीदा जाएगा, तब किसी भी महाशक्ति के पास दबाव बनाने का बहाना कहां बचेगा? हाल ही में डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वचलित तोप, जो बिजली से चलने वाले भारी ट्रक पर बिना शोर और बेहद किफायती ढंग से चलती है, इस दिशा में संकेत देती है कि तकनीक हमारे पास है। जरूरत है गति और राजनीतिक इच्छाशक्ति की।
आज परिवहन और उद्योग क्षेत्र में तेल की खपत सबसे अधिक है। यदि सरकार ठान ले कि ट्रांसपोर्ट ही नहीं, बल्कि उद्योगों में भी तेल का उपयोग चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाए, तो तस्वीर बदल सकती है। यह सच है कि इससे रूस को आर्थिक नुकसान होगा, लेकिन उसकी भरपाई अन्य आयातों से की जा सकती है। पर्यावरण को होने वाला नुकसान भी बचेगा। यूक्रेन भी भारत का मित्र है, और भारत उसके लिए भी सकारात्मक सोच रखता है। मजबूरी सिर्फ तेल की है, जो फिलहाल सबसे सस्ता और सुनिश्चित रूप से रूस से मिल रहा है।
दिल्ली-एनसीआर का कोहरा, एयर क्वालिटी इंडेक्स, कोयले से चलने वाले पावर हाउस, पानीपत और मथुरा की रिफाइनरियां, इन सबका पर्यावरण पर गहरा दुष्प्रभाव है, जिसकी जिम्मेदारी अक्सर किसानों पर डाल दी जाती है। जबकि असल जड़ ऊर्जा की पुरानी और प्रदूषणकारी व्यवस्था है।
दुनिया में कुछ ताक़तें प्रलय की ओर बढ़ने को तैयार बैठी हैं। ऐसे में भारत क्यों उसी रफ्तार को बढ़ाए? समझदारी इसी में है कि आने वाले बजट में तेल से तिलांजलि लेने की निर्णायक पहल हो। वैकल्पिक ऊर्जा को खुला प्रोत्साहन मिले, चाहे इसके लिए जीएसटी घटानी पड़े, सब्सिडी देनी पड़े या रेड टेप हटानी पड़े। रोड टैक्स कम हों, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मेले लगें, रिसर्च और डेवलपमेंट में युवाओं को बड़े पैमाने पर जोड़ा जाए।
हम खुद को विश्व गुरु कहते हैं, फिर कब तक तेल आयात के सहारे देश चलाते रहेंगे? अगर तेल आयात पर होने वाला खर्च वैकल्पिक ऊर्जा में लगाया जाए, तो अर्थव्यवस्था और पर्यावरण, दोनों सुधरेंगे। आयात से होने वाली बचत का आधा हिस्सा भी यदि सब्सिडी में दे दिया जाए, तो देश का व्यापक कल्याण संभव है। शेष धन शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, रेल-सड़क, हवाई अड्डों, बस अड्डों और बंदरगाहों के विकास में लगाया जा सकता है। फौजी तैयारी और आपदा प्रबंधन को भी नई मजबूती मिलेगी।
यह बचत हर साल दोहराई जाएगी। सोचिए, तब भारत कितनी तेज़ी से विकसित होगा, कितना आत्मनिर्भर बनेगा। सवाल बस इतना है कि क्या हम अब भी तेल की गुलामी को ही विकास मानते रहेंगे?