समय चक्र और पितृपक्ष : आधुनिकता की चकाचौंध में पितरों को तर्पण की लौ बुझ न जाए
मैं समय चक्र हूं। समय का पहिया निरंतर घूमता रहता है। उसकी धूल में भूत, भविष्य और वर्तमान की तमाम कहानियां समा जाती हैं। आजकल पितृपक्ष चल रहे हैं। इस कालखंड में अपने पितरों को तर्पण देना उनकी आत्मा की शांति और शुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। परंतु समाज में तेजी से आ रहे बदलावों के कारण आशंका बलवती होती जा रही है कि कहीं ऐसा न हो कि समय के भंवर में पितृपक्ष की परंपरा भी खो जाए।
हर वर्ष 16 दिन के लिए आने वाले पितृपक्ष हमें अपने पूर्वजों को याद करने का अवसर देते हैं। सनातन परंपरा का स्पष्ट संदेश है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अजर-अमर रहती है। इसलिए उनकी मुक्ति और शांति के लिए भोज आयोजित किए जाते हैं। साथ ही उनके त्याग, समर्पण और जीवन शिक्षाओं का पुनः स्मरण किया जाता है। मगर आज विज्ञान और आधुनिकता की आड़ में इन परंपराओं की अनदेखी बढ़ती जा रही है।
संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक
बीते समय में संयुक्त परिवार की परंपरा थी। लोग रोज़गार और धनार्जन के लिए विदेश (दिसावर) जाते, फिर भी परिवार सामूहिक रूप से बुज़ुर्गों का ध्यान रखता था। लेकिन आज एकल परिवारों के चलन ने सब कुछ बदल दिया है। लोग धन कमाने के लिए बाहर तो जाते हैं, मगर पीछे छूटे माता-पिता और बुज़ुर्ग अक्सर अकेले पड़ जाते हैं। उनकी देखभाल सीमित हो जाती है और कई को वृद्धाश्रमों का सहारा लेना पड़ता है।
आधुनिकता और रिश्तों की दूरी चिंता का विषय
आज की सभ्यता और आधुनिक जीवनशैली ने पारिवारिक संस्थाओं को कमजोर किया है। मैं और मेरे दो बच्चे की सोच ने रिश्तों और रीति-रिवाजों की जड़ों को खोखला किया है। युवाओं के सामने धनार्जन और कैरियर सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गए हैं। मगर यह भूल जाते हैं कि जो माता-पिता अपने जीवन का सब कुछ बच्चों के लिए न्योछावर करते हैं, कल उनकी वृद्धावस्था में उन्हें भी स्नेह, सेवा और सहारा चाहिए होगा।
जिम्मेदारी सिर्फ धन तक सीमित न हो
आज कई लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़कर मान लेते हैं कि कुछ धन की व्यवस्था कर देना ही जिम्मेदारी निभा देना है। लेकिन क्या केवल इतना ही पर्याप्त है? अगर मां-बाप की सेवा और परंपराओं को भूलना है तो उनकी संपत्ति पर हक़ जताने का अधिकार भी छोड़ देना चाहिए। परंपराओं का त्याग कर केवल भौतिक सुख की तलाश कहीं आने वाली पीढ़ियों को भी मैं-मैं की खाई में न धकेल दे।
पितृपक्ष का भविष्य खतरे में
शादी की बदलती धारणाएं, लिव-इन रिलेशन, बच्चों को न जन्म देना या एक-दो पर सिमट जाना, ये प्रवृत्तियां आने वाली पीढ़ियों में पितृपक्ष की स्मृति और जिम्मेदारी को और कमजोर कर सकती हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि भविष्य में कौन करेगा अपने पितरों का तर्पण? कौन याद करेगा उनके त्याग को?
आज भी कई परिवार पूरे श्रद्धा भाव से पितृपक्ष निभाते हैं और बच्चों को भी यह संस्कार सिखाते हैं। लेकिन बहुत से लोग केवल पंडित को दक्षिणा देकर या वृद्धाश्रम में जाकर खानापूर्ति कर लेते हैं। समय चक्र चेतावनी देता है कि अगर हमने विवाह और परिवार जैसी व्यवस्थाओं को तोड़-मरोड़कर अपना लिया, तो कहीं ऐसा न हो कि पितृपक्ष जैसी परंपराएं भी इतिहास के गर्भ में खो जाएं।
पितृपक्ष का असल अर्थ है- पूर्वजों को स्मरण करना, उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना और उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारना। यह सिर्फ अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है।
-राजीव गुप्ता- जनस्नेही कलम से
लोकस्वर आगरा।