नेपाल से लेकर पड़ोसी मुल्कों तक उठते बवंडर: भारत को अभी से होना होगा सचेत
आजकल नेपाल बहुत चर्चा में है। पहले बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका भी चर्चा में रहे। बोले तो, बवंडर कहां नहीं उठ खड़ा हुआ है, या दहलीज पर खड़ा है। अमेरिका-नाटो-यूक्रेन की रूस से लगातार ठनी हुई है, और उधर ग़ाज़ा, ईरान व अरब के कुछेक मुल्कों के साथ इज़राइल की लड़ाई। जहां इज़राइल ने क़तर के दोहा पर हाल ही में हमला किया है, तो दूसरी तरफ अमेरिका वेनेज़ुएला से भी दो-दो हाथ आज़मा रहा है। हद तो तब दिखी जब परसों नेपाल में एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी को जला दिया गया, और वहां के वित्त मंत्री की बुरी तरह पिटाई हुई। पिटाई तो अनेक और मंत्रियों और उनके परिवारजनों की भी हुई। देश का तख्तापलट किसी पिक्चर के अंत जैसा अचानक हो गया। बांग्लादेश और श्रीलंका में भी जब तक कोई सोच-समझ पाता, तब तक सब कुछ हो गया था।
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
उपरोक्त को संज्ञान में लेते हुए भारत को भी आज और अभी से बहुत सचेत रहना होगा। हालात यहां के भी इतने ठीक नहीं हैं, और भड़काने या चिंगारी सुलगाने के लिए घर के अंदर और बाहरी तत्व तत्पर और तैयार लगते हैं। ईश्वर करे कि हमारी समझ ग़लत हो, पर बचपन से ही फौजी रहा हूं, इसीलिए सच ही कह पाऊंगा, जो समय रहते सचेत करने के लिए ज़रूरी लगा।
आज पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर बुरी तरह से बाढ़ से प्रभावित हैं। लगभग सब कुछ उजड़ गया है। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि सब कुछ अनहोनी प्रकृति की वजह से ही तो नहीं हुआ। बहुत सारी खामियां हमारे सिस्टम की एक-एक कर उजागर होती गईं, और मज़लूम बस देखते और सहते गए।
काफी कुछ नेपाल जैसे ही हालात हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है। गैर-जिम्मेदारी, गैर-जवाबदारी ताज़ा हालातों से और भी साफ़ हो रही है। कुछेक नेताओं की वजह से आज तक़रीबन सभी नेताओं पर से जनता का विश्वास खो सा रहा है। नेता चार-पांच, या उससे ज़्यादा पेंशन लेते जा रहे हैं, जहां बहुत सारे नौजवानों के पास कोई नौकरी तक नहीं। अपराध भी काफी हद तक इस वजह से बढ़ रहे हैं।
कई लोगों का काफी समय से कहना है कि भाई-भतीजावाद, करप्शन, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी, जालसाज़ी, मिलावटखोरी, जमाखोरी, घटतोली, गैर-जिम्मेदारी, गैर-जवाबदारी, मिलीभगत, रिज़र्वेशन और ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ तो बहुत पहले से ही चल रहे हैं। कुछेक लोगों को यह भी कहते सुना कि कागज़ों पर आज भी अस्सी करोड़ से ज़्यादा लोगों को जीवन-यापन के लिए सरकार मजबूर है फ्री में राशन देने को। 80 करोड़ जनसंख्या कोई कम नहीं होती। सोचिए, कितने करोड़ ‘इज़्ज़त घर’ बनवाए गए और आज वे किस हाल में हैं। कितने अलग-अलग योजनाओं के तहत घर बनवाए गए और वे आज किस हाल में हैं, और उनमें आज कौन रह रहा है।
सड़कें, पुल, पुलिया इत्यादि के क्या हाल हैं, और बनने के दो-तीन महीने के अंदर ही उनका क्या हाल हो जाता है, क्या वह दुनिया को बताया जाता है? गोदी मीडिया और गोदी से उतरा हुआ मीडिया ही आज है। कुछ ही ऐसे मीडिया और पत्रकार बचे हैं, जो आज भी अपने कलम की निष्पक्षता को कायम रखने में जी-जान लुटा रहे हैं। खुद देखिए कि आजकल न्यूज़ कितने लोग सुनते हैं, या अब भी अख़बारों को देखते और विश्वास करते हैं।
अब जो भी सड़क, पुल, पुलिया इत्यादि बन रही है, वह चल क्यों नहीं पा रही? चौकोर पुल बन चुके हैं देखते-देखते, और किसी पर कोई असर या फ़र्क नहीं। रेलवे पहुंचती है कश्मीर, पर सब कुछ एक बारिश में स्वाहा। कहां गई सूझ-बूझ, समझदारी, दूरदर्शिता, ज़िम्मेदारी, जवाबदारी? सुना जा रहा है कि आज देश पर ढाई लाख करोड़ का ऋण चढ़ चुका है, और प्रत्येक बच्चे पर एक लाख का कर्ज। जो पानी की तरह इधर-उधर बहाया गया। कौन ज़िम्मेदार है? जनता पर क्या असर नहीं पड़ेगा?
नोटबंदी हुई, पर क्या आम इंसान का संशय खत्म हो गया कि जो भी अब उसकी जेब में नोट है, वह असली ही है? आज देश में रिज़र्वेशन भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है, जो मुखर नहीं है। आज भी सामाजिक बदलाव एक महीने में ही लाया जा सकता है। एससी, एसटी और पिछड़ा वर्ग परिवारों की कन्या से जो भी विवाह करे, उनके बच्चों को भी यदि एससी, एसटी और बैकवर्ड ही समझा जाए, तब एक दिन वह भी बहुत जल्दी आ सकता है जब पूरा देश एक जैसा हो सकता है। दूसरी तरफ, यदि समन्वय और सामाजिक उत्थान की नज़र से देखा जाए, तब एक पासवान का बालक, जिसकी मां ब्राह्मण परिवार की हो, तब उसे यदि ब्राह्मण समझें, तो यह जात-पात का भेद और रिज़र्वेशन का चक्कर छह महीने में खत्म किया जा सकता है।
मुद्दे तो अनेक हैं। सुलगने को तैयार। यदि हमारा देश समय रहते सचेत हो गया तो बहुत बढ़िया रहेगा। लंका कौन बनना चाहता है और कौन नेपाल जैसा? समझदारी की ज़रूरत है। खुदगर्जी और मुंह में राम, बगल में छुरी शायद ज़्यादा न चल पाए। आज न जाने कितने घुसपैठिए भी तो आम जनता में मिल गए हैं। देशभक्त मुसलमान भी आज किनारे हो लिया है, अन्यथा इन घुसपैठियों की क्या मजाल थी कि वे भारत में घुसकर रहें और देश-विरोधी हरकतों में भी सक्रिय रहें।
तनिक सोचिएगा ज़रूर, और सचेत भी रहें।