बांग्लादेश में उथल-पुथल: भारत को दुविधा से बाहर निकलकर ठोस कदम उठाने की ज़रूरत
बांग्लादेश में बढ़ती अस्थिरता, कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों पर हिंसा भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुकी है। यदि भारत ने समय रहते निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो 1971 के बाद पाकिस्तान के मामले जैसी रणनीतिक भूल दोहराई जा सकती है। कूटनीति की सीमाएं स्पष्ट हैं और देरी भविष्य में कहीं अधिक महंगी साबित हो सकती है। अब साहसिक, स्पष्ट और समयबद्ध नीति की आवश्यकता है।
-बृज खंडेलवाल-
क्या भारत फिर इतिहास को दोहराते हुए खामोश तमाशबीन बना रहेगा? क्या हम सचमुच बांग्लादेश को एक और पाकिस्तान में तब्दील होते देखने का इंतज़ार कर रहे हैं, उस मोड़ तक, जहाँ से वापसी नामुमकिन हो जाती है?
रूस ने यूक्रेन के मामले में देर नहीं की। पश्चिम एशिया में इज़रायल और अमेरिका ने अपने हितों के लिए बिना हिचक “डंडा” चलाया। लेकिन भारत, जो सबसे ज़्यादा दांव पर लगा है, वह अब भी सुस्ती और कूटनीतिक शिष्टाचार में उलझा क्यों है? बांग्लादेश में उभरता सत्ता शून्य, कट्टरपंथ का फैलाव और बाहरी शक्तियों की घुसपैठ कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि सामने खड़ी सच्चाई है।
कल अगर वहाँ परमाणु संयंत्र पूरी तरह चालू हो गया, अगर कट्टर ताक़तें राज्य तंत्र पर काबिज़ हो गईं, तो फिर भारत के पास क्या विकल्प बचेंगे, सिवाय पछतावे के? तब हर कदम ज़्यादा महँगा, ज़्यादा खतरनाक होगा।
यह चेतावनी का अंतिम घंटा है। निर्णायक, स्पष्ट और समयबद्ध कार्रवाई अब नहीं हुई, तो देरी सिर्फ़ रणनीतिक भूल नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक अपराध होगी।
भारत के पूर्व क्षेत्र की भू-राजनीति एक ख़तरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी है। साल 2025 के अंत तक बांग्लादेश, जो कभी भारत का भरोसेमंद और क़रीबी पड़ोसी था, आज अस्थिरता, अराजकता और भारत-विरोधी माहौल का शिकार हो गया है। अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सत्ता से बेदख़ली के बाद हालात तेज़ी से बिगड़े। छात्र आंदोलनों से शुरू हुआ विरोध जल्द ही व्यापक बग़ावत में बदल गया। शेख़ हसीना ने भारत में पनाह ली और बांग्लादेश की कमान नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के हाथों में आ गई।
जिस बदलाव को नैतिक और अस्थायी समाधान बताया गया था, वह जल्द ही एक सियासी दांव पेच में बदल गया। इस व्यवस्था को अब कट्टरपंथी ताक़तें, भारत-विरोधी तत्व और बाहरी दख़ल भर रहे हैं। इसके नतीजे साफ़ नज़र आ रहे हैं, हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं, सांप्रदायिक हिंसा आम होती जा रही है और भारत के ख़िलाफ़ ज़हर भरा प्रचार खुलकर हो रहा है। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ और चीन की रणनीतिक चालें इस अव्यवस्था का फ़ायदा उठा रही हैं। ऊपर से, रूपपुर परमाणु बिजली संयंत्र का जल्द चालू होना हालात को और संगीन बना रहा है।
भारत-बांग्लादेश के रिश्ते 1971 के मुक्ति संग्राम की आग में तपकर बने थे, जब भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान को आज़ादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। उस जीत ने दो-राष्ट्र सिद्धांत को भी ध्वस्त किया था। बाद के वर्षों में शेख़ मुजीबुर रहमान और फिर शेख़ हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष और भारत-मित्र देश बना रहा। मगर आज वही विरासत ख़तरे में है।
शेख़ हसीना के बाद जिस तरह से कट्टर और संकीर्ण सोच वाली ताक़तें उभरी हैं, वह भारत की 1971 के बाद की पाकिस्तान नीति की याद दिलाती है। भारत ने जंग तो जीत ली, लेकिन सियासी नरमी दिखाकर पाकिस्तान को फिर से मज़बूत होने दिया, नतीजा यह हुआ कि उसने परमाणु हथियार बनाए और दशकों से भारत के ख़िलाफ़ आतंक फैला रहा है। आज बांग्लादेश भी उसी रास्ते पर फिसलता दिख रहा है।
सबसे गंभीर चिंता हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ती हिंसा है, जो बांग्लादेश की आबादी का लगभग 8 प्रतिशत हैं। कहीं ईशनिंदा के आरोप में लिंचिंग हो रही है, तो कहीं खुलेआम हत्याएँ। मंदिरों में तोड़-फोड़, घरों की लूट और महिलाओं-बच्चियों पर हमले आम हो चुके हैं। अल्पसंख्यक संगठनों के मुताबिक अगस्त 2024 के बाद हज़ारों घटनाएँ दर्ज की गई हैं। यूनुस सरकार ज़बानी निंदा तो करती है, लेकिन ज़मीनी हालात क़ाबू में लाने में नाकाम रही है।
भारत में भी इसका गहरा असर पड़ा है। दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। ग़ुस्सा बढ़ रहा है और सब्र टूट रहा है। बहुत से लोग इसे सिर्फ़ मानवीय संकट नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा सवाल मान रहे हैं।
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार अब दिशाहीन नज़र आती है। सलाहकारों के इस्तीफ़े, चुनावों में लगातार देरी और कट्टरपंथी नेताओं की वापसी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। ढाका की सड़कों पर ख़िलाफ़त की माँग करते कट्टर संगठन खुलेआम मार्च कर रहे हैं। इससे साफ़ है कि बांग्लादेश अपनी धर्मनिरपेक्ष बुनियाद से दूर जा चुका है। अगर चुनाव टाले जाते रहे, तो यह देश हमेशा के लिए कट्टरपंथ के शिकंजे में फँस सकता है।
भारत के सामने विकल्प सीमित हैं। कूटनीति अब तक बेअसर रही है। आर्थिक दबाव एक रास्ता हो सकता है, क्योंकि बांग्लादेश व्यापार, बिजली और रास्तों के लिए भारत पर निर्भर है, लेकिन यह उपाय धीमा है। सबसे ख़तरनाक विकल्प है, ख़ामोशी से हालात को बिगड़ते देखना, ख़ासकर तब जब परमाणु संयंत्र अस्थिर माहौल में चालू होने वाला हो।
ऐसे में भारत को एक कठिन लेकिन ज़रूरी सवाल पर गंभीरता से सोचना होगा, क्या निर्णायक दख़ल अब अपरिहार्य हो चुका है? सीमित और लक्षित सैन्य कार्रवाई, जिसका मक़सद हालात को स्थिर करना, अल्पसंख्यकों की हिफ़ाज़त करना और कट्टरपंथी नेटवर्क को तोड़ना हो, जोखिम भरी ज़रूर है। अंतरराष्ट्रीय दबाव भी आएगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि सही वक़्त पर लिया गया साहसिक फ़ैसला लंबे समय में शांति लाता है।
अगर भारत ने आज भी देरी की, तो बांग्लादेश उसकी पूर्वी सीमा पर एक स्थायी सिरदर्द बन सकता है। लेकिन समय रहते क़दम उठाए गए, तो अभी भी हालात संभाले जा सकते हैं। कभी-कभी सब्र नहीं, बल्कि हिम्मत ही अमन का रास्ता खोलती है।Top of Form
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