आस्था के जुलूस क्यों बन रहे नफ़रत के अखाड़े? इसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए

धार्मिक जुलूस अब आस्था के बजाय टकराव और हिंसा का कारण बनते जा रहे हैं। इसका एकमात्र हल यही है कि जुलूसों के दौरान बेहतर सुरक्षा व्यवस्था रहे। प्रशासन निष्पक्ष रहे और आपसी सद्भाव बढ़े।

Sep 11, 2025 - 16:23
 0
आस्था के जुलूस क्यों बन रहे नफ़रत के अखाड़े? इसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए

-बृज खंडेलवाल-

कर्नाटक के मड्डूर में हाल ही में गणेश विसर्जन शोभायात्रा पर पत्थरबाज़ी हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, माहौल अचानक हिंसक बन गया, श्रद्धालुओं ने जवाबी हमला किया, पुलिस ने लाठीचार्ज किया और शहर में दहशत फैल गई। अगले दिन हजारों गुस्साए लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया।

यह कोई अकेला वाक़िआ नहीं था। पिछले कुछ बरसों में  धार्मिक जुलूस, जो कभी ख़ुशी और आस्था की निशानी हुआ करते थे, अब बार-बार दंगे-फसाद और झगड़ों में तब्दील होते जा रहे हैं।

मार्च में बिहार के पटना ज़िले के सहनौरा गाँव में होलिका दहन जुलूस को कुछ समूहों ने रोकने की कोशिश की। इसके बाद झगड़ा भड़क उठा, कई लोग ज़ख़्मी हुए, पुलिस की गाड़ियाँ तोड़ी गईं और हालात काबू में करने के लिए गोली चलानी पड़ी। उसी महीने पंजाब के लुधियाना में होली का जुलूस को लेकर  झड़प हो गई और पत्थरबाज़ी में लोग घायल हुए। पुलिस ने हालांकि इसे सांप्रदायिक मानने से इनकार कर दिया। इसी दिन बंगाल के बीरभूम ज़िले में डोल पूर्णिमा मनाते श्रद्धालुओं पर हमला हुआ। इल्ज़ाम है कि हमला एक सियासी आदमी की अगुवाई में हुआ और पुलिस की जवाबी कार्यवाही से लोग संतुष्ट नहीं हुए। 

अप्रैल में मध्य प्रदेश के गुना में हनुमान जयंती के जुलूस पर पत्थर फेंके गए, एक बच्चा भी घायल हुआ। झारखंड के हज़ारीबाग़ में यही त्‍यौहार हिंसा और आगज़नी में बदल गया, कई गाड़ियां और मकान जला दिए गए। जुलाई में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कांवड़ यात्रा पर तलवारों और डंडों से हमला हुआ।

यह सिलसिला सिर्फ़ उत्तर भारत तक सीमित नहीं है। आंध्र प्रदेश के रायचोटी (तिरुपति के क़रीब) में वीरभद्र स्वामी मंदिर के भक्तों पर हमला हुआ, मगर अजीब बात यह कि पुलिस ने मुक़दमा उन्हीं पर दर्ज कर दिया। इससे पहले हरियाणा के नूंह में ब्रज मंडल यात्रा पर हमला, आगज़नी और पत्थरबाज़ी ने पूरे मुल्क को हिला दिया था।

सवाल यह है कि सदियों से चल रही ये धार्मिक परम्पराएँ अचानक क्यों निशाना बनने लगीं हैं? कुछ तबकों के लिए ये जुलूस अब महज़ पूजा नहीं रहे, बल्कि ताक़त का इज़हार लगने लगे हैं। ऊंची आवाज़ में म्यूज़िक, उकसाने वाले नारे और संवेदनशील इलाक़ों से गुज़रना, इन सबको धमकी की शक्ल में देखा जाता है। दूसरी तरफ़,  कुछ लोगों को यह महसूस होता है कि लगातार उनके धर्म और परम्पराओं पर हमले किये जा रहे हैं।

सियासत भी इन हालात को और संगीन बना देती है। त्‍यौहारों के वक़्त भड़कने वाली हिंसा कई बार इत्तेफ़ाक़ नहीं होती बल्कि जानकार लोगों के मुताबिक सुनियोजित सी लगती है। वोट-बैंक की सियासत में हर पत्थर को सियासी हथियार बना दिया जाता है। नतीजा यह निकलता है कि दोनों तबक़े अपने-आपको मज़लूम मानने लगते हैं।

असल नाकामी मगर लॉ इन्फोर्समेंट करने वाली एजेंसियों की है। हिंदुस्तान का संविधान हर शख़्स को मज़हबी आज़ादी की गारंटी देता है, लेकिन अगर लोग त्‍यौहार मनाते हुए डरें तो यह गारंटी बेमानी हो जाती है। गणेश विसर्जन हो या होली, हनुमान जयंती हो या कांवड़ यात्रा, जब ये जुलूस दंगे और आगज़नी में बदल जाएं तो यह सिर्फ़ साम्प्रदायिक नफ़रत नहीं बल्कि इंतज़ामिया की नाकामी भी है। पुलिस अगर पहले से एहतियाती कदम उठाए, रूट तय करे, सेंसिटिव इलाक़ों में फ़ोर्स तैनात करे, और सख़्ती से क़ानून लागू करे तो इन हालात से बचा जा सकता है।

लिहाज़ा ज़रूरत इस बात की है कि पुलिस और प्रशासन पूरी तटस्थता और सख़्ती के साथ क़ानून लागू करें। दोषियों पर फौरन कार्रवाई हो, चाहे वो किसी भी बिरादरी से हों। मज़हबी रहनुमाओं से बातचीत कर माहौल को काबू में रखना भी उतना ही ज़रूरी है। वरना यह ख़तरा बना रहेगा कि जुलूस और त्‍यौहार राजनीति और नफ़रत की भेंट चढ़ते रहेंगे।

मसला सिर्फ़ दंगे-फसाद का नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब और गंगा-जमुनी रवायत का भी है। त्‍यौहार, जो कभी रंग, ख़ुशी और मेल-मिलाप की पहचान थे, अब अगर ख़ौफ़ और फ़साद का सबब बन जाएं तो यह हमारी सामाजिक सांस्कृतिक हार होगी।

अगर क़ानून अपनी ज़िम्मेदारी निभाए, तो त्‍यौहार फिर वही होंगे जो हमेशा से रहे हैं, ईमान और भाईचारे, मेल मिलाप का जश्न, न कि दहशत और नफ़रत का मैदान।

डिस्क्लेमर:

यह लेख विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। लेखक का उद्देश्य किसी भी धर्म, समुदाय या व्यक्ति को आहत करना नहीं है। यह लेख केवल शांति, भाईचारे और प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता पर केंद्रित है।

SP_Singh AURGURU Editor