ममता बनर्जी के किले में दिखने लगीं दरारें! बैठकों से विधायकों की गैरहाजिरी और नेताओं के नाराजगी भर स्वर क्या टीएमसी के टूटते संतुलन का संकेत है?
टीएमसी की बैठकों में सांसदों-विधायकों की बढ़ती अनुपस्थिति, वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी के घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चाओं को जन्म दिया है। ऐसे समय में ममता बनर्जी का आंदोलनकारी रुख क्या पार्टी को बचाए रखने की रणनीति है। दूसरी ओर भाजपा के मुकाबले की राजनीतिक मजबूरियों ने कांग्रेस और टीएमसी को पहले की तुलना में करीब ला दिया है। कुल मिलाकर बंगाल की राजनीति अब नए समीकरणों और संभावित पुनर्संरचना के दौर में प्रवेश करती दिख रही है।
-एसपी सिंह-
पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक ऐसा माना जाता रहा कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस एक-दूसरे के पर्याय हैं। पार्टी का संगठन, सरकार, चुनावी रणनीति और जनाधार सब कुछ ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द घूमता था। लेकिन हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने पहली बार यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या टीएमसी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है? क्या तृणमूल कांग्रेस बिखराव की ओर बढ़ने लगी है?
पार्टी की तीन बैठकों में विधायकों की लगातार घटती उपस्थिति, वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भरे बयान, कुछ सांसदों की भी बैठक से दूरी और पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर बढ़ती चर्चाओं ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टीएमसी केवल एक अस्थायी राजनीतिक संकट से गुजर रही है या फिर पार्टी बड़े बिखराव की ओर बढ़ रही है।
बैठकों से गायब विधायक क्या संकेत दे रहे हैं?
राजनीति में कई बार नेता सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बोलते, लेकिन उनकी मौजूदगी या गैर-मौजूदगी बहुत कुछ कह देती है। टीएमसी की पहली बैठक से 10 विधायक, दूसरी बैठक से 35 विधायक और तीसरी बैठक से 60 विधायक अनुपस्थित रहे हैं, तो यह केवल व्यस्तता या संयोग का मामला नहीं माना जाएगा। 31 मई की बैठक में महज 20 विधायकों की मौजूदगी के कारण यह बैठक टालनी पड़ी थी और पार्टी की ओर से सफाई दी गई थी कि विधायक क्षेत्रों में व्यस्त थे, लेकिन यह बात गले नहीं उतरती। खासकर तब जब पार्टी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हो।
किसी भी दल में लगातार बढ़ती अनुपस्थिति आमतौर पर तीन संकेत देती है- नेतृत्व के प्रति असंतोष, भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को लेकर अनिश्चितता और वैकल्पिक राजनीतिक विकल्पों की तलाश। यही तीन कारण हैं कि टीएमसी के भीतर बढ़ती दूरी को राजनीतिक पर्यवेक्षक गंभीरता से देख रहे हैं।
अभिषेक बनर्जी बनाम पुराना नेतृत्व?
टीएमसी के भीतर पिछले कुछ वर्षों से एक मौन संघर्ष की चर्चा होती रही है। एक धड़ा अभिषेक बनर्जी को पार्टी का भविष्य मानता है, जबकि दूसरा धड़ा पुराने नेताओं की भूमिका कम होने से असहज दिखाई देता है। हाल ही में पार्टी में उभरे असंतोष के स्वरों में भी शिकायतें अभिषेक बनर्जी के व्यवहार को लेकर ही ज्यादा सामने आई हैं।
यदि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और सांसदों में असंतोष बढ़ रहा है, तो इसके पीछे केवल चुनावी हार नहीं बल्कि राजनीतिक भविष्य भी एक बड़ा कारण हो सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में उत्तराधिकार की लड़ाई अक्सर खुले मंच पर नहीं बल्कि संगठनात्मक गतिविधियों में दिखाई देती है। टीएमसी में भी कुछ वैसा ही परिदृश्य बनता नजर आ रहा है।
दो विधायकों को पार्टी से बाहर निकालना पड़ा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब तृणमूल कांग्रेस ने अपने दो विधायकों, संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निष्कासित कर दिया। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई जब विधानसभा से जुड़े एक दस्तावेज में कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर कथित फर्जीवाड़े का विवाद सामने आया था। दोनों विधायकों ने दावा किया था कि संबंधित दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर वास्तविक नहीं हैं, जिसके बाद यह मामला स्पीकर द्वारा सीआईडी को सौंप दिया गया। इस मामले में भी अभिषेक बनर्जी का ही नाम सामने आ रहा है, जिन्होंने इन दोनों विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर बनाकर नेता विरोधी दल पद के लिए विधायकों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव भेज दिया था।
जब ये दोनों विधायक खुलकर अभिषेक बनर्जी के सामने आ गए और स्पीकर से शिकायत कर दी तो टीएमसी ने दोनों विधायकों पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने और संगठनात्मक अनुशासन का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल हस्ताक्षर फर्जीवाड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि टीएमसी के भीतर बढ़ रही गुटबाजी, असंतोष और नेतृत्व को लेकर उभर रहे मतभेदों का भी संकेत है।
अभिषेक बनर्जी मुद्दे पर आंदोलन के मायने?
ममता बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी से जुड़े प्रकरण को लेकर राज्यव्यापी आंदोलन का आह्वान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं माना जा रहा। इसके पीछे कई संभावित राजनीतिक उद्देश्य दिखाई देते हैं-
पहला संगठन को एकजुट रखना। जब कोई दल आंतरिक संकट से गुजरता है तो नेतृत्व अक्सर बाहरी मुद्दों को केंद्र में लाकर कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक साझा संघर्ष से जोड़ने की कोशिश करता है। दूसरी वजह विमर्श बदलना। जब चर्चा पार्टी की अंदरूनी टूट-फूट पर हो रही हो तो आंदोलन के जरिए राजनीतिक बहस का केंद्र बदलने की कोशिश की जाती है। तीसरा कारण है नेतृत्व की पकड़ दिखाना। राज्यव्यापी आंदोलन यह संदेश देने का प्रयास भी हो सकता है कि पार्टी अभी भी नेतृत्व के पीछे मजबूती से खड़ी है।
कांग्रेस और टीएमसी: दुश्मनी से जरूरत तक का सफर
यहीं से कांग्रेस और टीएमसी के रिश्तों का नया अध्याय शुरू होता दिखाई देता है। एक समय था जब ममता बनर्जी राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थीं। बंगाल में कांग्रेस को राजनीतिक रूप से सीमित रखने की रणनीति भी टीएमसी की प्राथमिकता थी।
लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज टीएमसी को राजनीति में बने रहने के लिए कांग्रेस के सहयोग की आवश्यकता है और कांग्रेस को बंगाल में एक ऐसे सहयोगी की जरूरत है जो भाजपा को सीधी चुनौती दे सके। दोनों दलों की मजबूरी एक-दूसरे की जरूरत बनती जा रही है।
क्या टीएमसी टूट सकती है?
यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि टीएमसी टूटने जा रही है। ममता बनर्जी की छवि संघर्ष करने वाले नेताओं में होती है और पार्टी का बड़ा संगठनात्मक ढांचा अभी भी उनके साथ खड़ा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि सांसदों और विधायकों का पार्टी की बैठकों में अनुपस्थिति का सिलसिला जारी रहता है तथा यदि वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी बढ़ती है तो यह टीएमसी के लिए गंभीर चेतावनी साबित हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: ममता के बाद कौन?
असल संकट चुनावी हार से बड़ा है। टीएमसी के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तराधिकार का है। ममता बनर्जी उम्र के उस दौर में पहुंच चुकी हैं, जहां से वे पहले जैसा जुझारूपन शायद न दिखा पाएं। ऐसे में क्या पार्टी पूरी तरह अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में जाएगी? तब क्या पुराने नेताओं की भूमिका बनी रहेगी? क्या संगठन इस बदलाव को सहज रूप से स्वीकार करेगा? आने वाले महीनों में यही प्रश्न टीएमसी की दिशा तय करेंगे।
कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में टीएमसी एक संक्रमण काल से गुजरती दिखाई दे रही है। फिलहाल ममता बनर्जी की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी पार्टी को एकजुट रखना है। आने वाला समय तय करेगा कि यह केवल राजनीतिक उथल-पुथल है या बंगाल की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की प्रस्तावना।