रामायण और महाभारत काल से आज तक: इतिहास, भूगोल और धर्म के सूत्रों में उलझी दुनिया- क्या अब भारत निभाएगा ‘जटायु’ जैसा धर्म?

इतिहास और पौराणिक कथाएं बताती हैं कि संघर्ष और नैतिक चुनौतियां पहले भी थीं और आज भी हैं। जटायु का त्याग धर्म का आदर्श है, जबकि शल्य का प्रसंग परिस्थितियों की मजबूरी दिखाता है। भूगोल, विज्ञान और परंपराओं के आधार पर यह संकेत मिलता है कि अतीत और वर्तमान जुड़े हुए हैं। अंत में प्रश्न उठता है कि वैश्विक संघर्ष के समय भारत को शांति स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, केवल दर्शक नहीं बनना चाहिए।

Mar 30, 2026 - 12:57
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रामायण और महाभारत काल से आज तक: इतिहास, भूगोल और धर्म के सूत्रों में उलझी दुनिया- क्या अब भारत निभाएगा ‘जटायु’ जैसा धर्म?

-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

बात पुरानी भी है और नई भी। समय बदला है, पर परिस्थितियां कहीं न कहीं वैसी ही दिखाई देती हैं। तब भी अपने ही दो खेमे आमने-सामने थे, और आज भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। महाभारत में नकुल और सहदेव के सगे मामा मद्रराज शल्य, जिन्हें पांडवों के साथ खड़ा होना चाहिए था, परिस्थितियों और कौरवों की चतुराई के चलते उनके पक्ष में जा खड़े हुए। यह एक ऐसा प्रसंग है, जो समय के साथ धुंधला तो पड़ा, लेकिन पूरी तरह मिट नहीं सका।

रामायण और रामचरितमानस में वर्णित पक्षीराज जटायु का प्रसंग मानवता और धर्म का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है। जटायु का सीता माता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, फिर भी उनकी पुकार सुनते ही उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए रावण से युद्ध किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह त्याग केवल संबंधों का नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य का प्रतीक था।

रावण सीता माता का हरण कर जिस दिशा में ले जा रहा था, उसे असुर लोक कहा गया, जिसे कुछ लोग फारस की खाड़ी के पश्चिमी क्षेत्रों से जोड़कर देखते हैं। फारस के इतिहास में ‘आहुरा माजदा’ का उल्लेख मिलता है, जिन्हें शिल्पाकृतियों में पक्षीराज के रूप में दर्शाया गया है। यह एक रोचक समानता है, जो जटायु के स्वरूप से जोड़ी जाती है। संसार में इस प्रकार की पक्षी-आकृति वाले देवता का उल्लेख विरल है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि जटायु का संबंध उस भूभाग से रहा हो सकता है।

इसी क्रम में अहिरावण का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। कथाओं के अनुसार, वह रात्रि में श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया था। हनुमान जी ने उनकी रक्षा के लिए अपनी पूंछ से सुरक्षा घेरा बनाया, फिर भी अहिरावण सफल रहा। यदि इसे भौगोलिक दृष्टि से देखें, तो फारस के पश्चिमी क्षेत्रों में तुर्किये के ‘डेरिंन्कुयु’ जैसे भूमिगत शहरों के अवशेष मिलते हैं, जो धरती के भीतर बसे हुए थे। यह तथ्य पौराणिक कथाओं और वास्तविक भूगोल के बीच एक रोचक सामंजस्य प्रस्तुत करता है।

भौगोलिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि फारस (ईरान) का क्षेत्र और खाड़ी के देश परस्पर भिन्न प्रकृति के हैं। जहां खाड़ी क्षेत्र आज भी व्यापक रूप से बंजर और रेतीला दिखाई देता है, वहीं फारस का भूभाग अनेक बड़ी नदियों के दोआब में स्थित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक उपजाऊ रहा है। दूसरी ओर, खाड़ी क्षेत्र और अफ्रीका के सहारा मरुस्थल के बीच पाई जाने वाली समानताएं यह संकेत देती हैं कि संभवतः प्राचीन काल में ये भूभाग किसी न किसी रूप में परस्पर जुड़े रहे हों, अथवा एक ही भू-खंड का हिस्सा रहे हों।

इतिहास और पौराणिक संदर्भों को देखें तो राम-रावण युद्ध में चले अस्त्र-शस्त्रों के अलावा उस दौर में दो विशेष बाण भी चलाए गए थे- एक भगवान परशुराम की इच्छा से भगवान श्रीराम द्वारा, और दूसरा समुद्र देव के संकेत पर भगवान श्रीराम के आदेश से लक्ष्मण जी द्वारा। इन घटनाओं के वास्तविक प्रभाव क्या रहे, यह निश्चित रूप से कहना कठिन है, परंतु लोकमान्यताओं में यह विचार भी मिलता है कि ऐसे दिव्य अस्त्र-शस्त्रों में प्रकृति और भू-आकृति तक को परिवर्तित करने की क्षमता मानी गई है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पृथ्वी के इतिहास पर विचार करें तो पैंजिया का सिद्धांत बताता है कि कभी समस्त महाद्वीप एक ही विशाल भू-भाग का हिस्सा थे, जो समय के साथ टूटकर अलग-अलग महाद्वीपों में विभाजित हो गए। इसी क्रम में गोंडवाना लैंड का निर्माण हुआ, जिसमें भारत भी सम्मिलित था। भारतीय परंपरा में भारतवर्ष को जम्बूदीप और आर्यावर्त जैसे नामों से संबोधित किया जाता रहा है, जो इसके सांस्कृतिक और भौगोलिक महत्व को दर्शाते हैं।

यदि ओमान, सोमालिया, केन्या और तंजानिया जैसे देशों के निवासियों की शारीरिक, सांस्कृतिक और भाषाई समानताओं की तुलना दक्षिण भारतीय समाज से की जाए, तो यह संभावना और भी प्रबल होती प्रतीत होती है कि प्राचीन काल में ये भूभाग किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से जुड़े रहे होंगे। यही कारण है कि आज भी इन क्षेत्रों के बीच कई समानताएं देखने को मिलती हैं। इस प्रकार, भूगोल, विज्ञान और पौराणिक मान्यताओं के समन्वय से यह विषय एक रोचक रहस्य के रूप में उभरता है, जो भविष्य के शोध और खोज के लिए नए आयाम प्रस्तुत करता है।

अब प्रश्न वर्तमान का है। आज जब विश्व के कई क्षेत्र, विशेषकर पश्चिम एशिया, संघर्ष की आग में झुलस रहे हैं और मित्र राष्ट्र आपस में टकराव की स्थिति में हैं, तब भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए? क्या भारत, जो शांति, सह-अस्तित्व और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश देता आया है, केवल दर्शक बना रह सकता है?

‘रमल्लाह’, ‘राम-आशीष’ जैसे कई नाम और स्थान आज भी उस सांस्कृतिक जुड़ाव की ओर संकेत करते हैं, जिसे हमने शायद अनदेखा कर दिया है। जब अपने ही लोग आपस में संघर्ष कर रहे हों, तब मध्यस्थता करना केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व भी बन जाता है।

भारत आज वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण शक्ति है। ब्रिक्स जैसे समूह में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका है। ऐसे में यदि वह शांति स्थापना की दिशा में पहल नहीं करता, तो फिर ‘जटायु’ जैसे त्याग और साहस की अपेक्षा भी कैसे की जा सकती है?

इतिहास हमें केवल कहानियां नहीं देता, बल्कि वर्तमान के लिए मार्गदर्शन भी देता है। प्रश्न यह है कि क्या हम उन संकेतों को समझने और उस पर चलने के लिए तैयार हैं?

SP_Singh AURGURU Editor