हिंदी साहित्य के पुरोधा डॉ. इंद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि: कई पीढ़ियों को दिए भाषा, संस्कार और स्वाभिमान के अमूल्य पाठ
आगरा। सादगी, स्वाभिमान, साधना, करुणा और देशभक्ति के पर्याय माने जाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं स्वतंत्रता सेनानी डॉ. इंद्रपाल सिंह 'इंद्र' की जयंती पर रविवार को यूथ हॉस्टल में भावपूर्ण स्मरण समारोह आयोजित किया गया। साहित्य साधिका समिति एवं डॉ. इंद्रपाल सिंह 'इंद्र' स्मारक समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में आगरा, दिल्ली, लखनऊ, ग्वालियर सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों, शिक्षाविदों और समाजसेवियों ने डॉ. इंद्र के साहित्यिक, शैक्षिक और सामाजिक योगदान को याद करते हुए उन्हें हिंदी जगत की अमूल्य धरोहर बताया।
वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि डॉ. इंद्रपाल सिंह 'इंद्र' केवल साहित्यकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसी प्रेरणास्रोत विभूति थे जिन्होंने अनेक पीढ़ियों को हिंदी भाषा, साहित्य, संस्कृति और जीवन मूल्यों के संस्कार प्रदान किए। उनका व्यक्तित्व सादगी, सौम्यता, आत्मसम्मान, दृढ़ संकल्प, प्रेम, करुणा और राष्ट्रभक्ति का जीवंत उदाहरण था।
दीप प्रज्ज्वलन और पुस्तक लोकार्पण के साथ हुआ शुभारंभ
समारोह का शुभारंभ अध्यक्ष डॉ. खुशीराम शर्मा, मुख्य अतिथि दिल्ली की साहित्यकार डॉ. उपासना सिंह, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ, लखनऊ की साहित्यकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित, ग्वालियर की साहित्यकार डॉ. मधुलिका सिंह तथा कार्यक्रम संयोजक एवं आरबीएस कॉलेज की पूर्व प्राचार्य डॉ. सुषमा सिंह द्वारा मां शारदे एवं डॉ. इंद्र की तस्वीर पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया।
इस अवसर पर डॉ. इंद्र द्वारा रचित पुस्तक ‘देवी चरित्र’ तथा डॉ. सुषमा सिंह की पुस्तक ‘समीक्षायन’ का सामूहिक लोकार्पण भी किया गया।
साहित्य साधिका समिति की संस्थापक डॉ. सुषमा सिंह, श्रीमती रमा वर्मा 'श्याम' तथा अध्यक्ष डॉ. रेखा कक्कड़ ने अतिथियों का स्वागत किया। डॉ. मंजू स्वाती ने मां शारदे की वंदना प्रस्तुत की, जबकि कार्यक्रम का संचालन समिति की सचिव डॉ. यशोधरा यादव 'यशो' ने किया।
डॉ. इंद्र का साहित्यिक अवदान हिंदी जगत की धरोहर
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. खुशीराम शर्मा ने कहा कि डॉ. इंद्रपाल सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपनी साधना, लगन और निष्ठा से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी हिंदी सेवा से प्रेरित होकर अनेक लोग साहित्य सृजन से जुड़े। उन्होंने बताया कि नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी अध्यापन के कारण उनका डॉ. इंद्र से घनिष्ठ संबंध रहा और उनके साहित्यिक अवदान के वे सदैव प्रशंसक रहे हैं।
‘देवी चरित्र’ मौलिक आनंद प्रदान करने वाली कृति
मुख्य अतिथि डॉ. उपासना सिंह ने कहा कि डॉ. इंद्र की पुस्तक ‘देवी चरित्र’ संस्कृत की ‘दुर्गा सप्तशती’ का काव्यानुवाद होते हुए भी पाठकों को मौलिक रचना का आनंद प्रदान करती है। यह उनकी साहित्यिक प्रतिभा और भाषाई सामर्थ्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
शिक्षा और साहित्य में बनाया विशिष्ट स्थान
विशिष्ट अतिथि शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ ने कहा कि इंद्रपाल सिंह 'इंद्र' ने अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर शिक्षा और साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान बनाया। उन्होंने अपने शिष्यों और साहित्य के माध्यम से हिंदी भाषा की ऐतिहासिक सेवा की। उनका साहित्य हिंदी की अमूल्य धरोहर है।
लखनऊ से आईं साहित्यकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित ने कहा कि डॉ. इंद्र श्रेष्ठ सर्जक, नाटककार, समीक्षक और शिक्षाविद् थे। उनकी रचनाधर्मिता और साहित्यिक दृष्टि हिंदी जगत के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
संस्मरणों में जीवंत हुआ डॉ. इंद्र का व्यक्तित्व
ग्वालियर की साहित्यकार डॉ. मधुलिका सिंह ने संस्मरण साझा करते हुए बताया कि उनके पिता ओजस्वी कवि जगदीश सिंह परमार और डॉ. इंद्रपाल सिंह 'इंद्र' एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र थे। दोनों एक-दूसरे की रचनाओं के प्रशंसक थे और उनके मिलने पर साहित्यिक महफिलें सज जाया करती थीं।
डॉ. सुषमा सिंह ने कहा कि उनके पिता एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, देशभक्त, साहित्य एवं संस्कृति के उत्थान के लिए समर्पित और अपने दायित्वों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तित्व थे।
श्रीमती रमा वर्मा 'श्याम' ने भावुक शब्दों में कहा कि पिता वह आशीर्वाद हैं जिनकी छाया में जीवन के दुख छोटे लगने लगते हैं। वहीं डॉ. रेखा कक्कड़ ने कहा कि डॉ. इंद्र ने आत्मसम्मान और स्वाभिमान को जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया तथा अन्याय के सामने कभी समझौता नहीं किया। वे छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे।
उन्होंने बताया कि डॉ. इंद्र अपनी रचनाएं स्वयं टाइपराइटर पर टाइप किया करते थे और वह टाइपराइटर आज भी उनकी पुत्री डॉ. सुषमा सिंह ने सहेज कर रखा है, जो उनकी अमूल्य स्मृतियों का प्रतीक है।
कविताओं और भावनाओं में झलकी श्रद्धांजलि
डॉ. यशोधरा यादव 'यशो' ने पिता के महत्व पर भावपूर्ण पंक्तियां प्रस्तुत करते हुए कहा कि पिता विश्वास, आकाश और जीवन की शक्ति होते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नीलम भटनागर ने काव्यात्मक श्रद्धांजलि अर्पित की, जबकि पुत्रवधू डॉ. प्रेरणा आदित्य सिंह ने कहा कि डॉ. इंद्र ने सदैव उन्हें पुत्री समान स्नेह दिया और व्यक्तित्व विकास के लिए प्रेरित किया।
डॉ. मिथिलेश पाठक ने कहा कि डॉ. इंद्र जुझारू व्यक्तित्व के धनी थे और सभी के प्रति सहज प्रेम, सहयोग और आत्मीयता रखते थे।
समारोह में डॉ. कुसुम चतुर्वेदी, डॉ. मिथिलेश पाठक, डॉ. शेषपाल सिंह, सुशील सरित, अशोक अश्रु, साधना वैद, परमानंद शर्मा, महेश शर्मा, डॉ. विनोद माहेश्वरी, विजय तिवारी, रवींद्र वर्मा, डॉ. राजेश पाल सिंह धाकरे, डॉ. प्रेरणा आदित्य सिंह, सुधा परिहार सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं समाजसेवी उपस्थित रहे।