150 करोड़ की जमीन 28 करोड़ में नीलाम! केसर चीनी मिल की बिक्री पर राजनीतिक दलों और किसान यूनियन ने उठाए सवाल, किसानों के 170 करोड़ बकाया के बीच नीलामी पर घमासान, मंडलायुक्त ने दिए जांच के संकेत, डीएम बोले- अभी अंतिम नहीं हुई प्रक्रिया
बरेली। बहेड़ी स्थित केसर चीनी मिल की करीब 14 हेक्टेयर भूमि को 28 करोड़ रुपये में नीलाम किए जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। समाजवादी पार्टी, भारतीय किसान यूनियन, राष्ट्रीय लोकदल और स्थानीय भाजपा नेताओं ने नीलामी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया है कि करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि को औने-पौने दामों में बेच दिया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए मंडलायुक्त बरेली और जिलाधिकारी ने संज्ञान लिया है। मंडलायुक्त ने जांच के संकेत दिए हैं, जबकि जिलाधिकारी ने कहा है कि नीलामी प्रक्रिया अभी अंतिम रूप से पूरी नहीं हुई है और अधिक मूल्य देने वाले इच्छुक पक्षों के लिए अभी भी अवसर खुला है।
किसानों के 170 करोड़ रुपये बकाये के चलते शुरू हुई थी प्रक्रिया
जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने बताया कि केसर चीनी मिल पर किसानों का लगभग 170 करोड़ रुपये का गन्ना मूल्य बकाया है। भुगतान नहीं होने के कारण किसान लंबे समय से आंदोलन कर रहे थे। करीब आठ माह पूर्व किसानों सहित संबंधित पक्षों की सहमति से मिल की भूमि नीलाम करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी ताकि किसानों का बकाया भुगतान कराया जा सके।
उन्होंने बताया कि नीलामी प्रक्रिया के लिए एडीएम (एफआर), एआईजी स्टांप और एसडीएम सदर की तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी। सितंबर 2025 में समिति ने सर्किल रेट के आधार पर भूमि का मूल्यांकन लगभग 27 करोड़ रुपये किया था।
सातवीं बार में सफल हुई नीलामी
प्रशासन के अनुसार चार समाचार पत्रों में दो-दो बार विज्ञापन प्रकाशित कराए गए। बड़े-बड़े बोर्ड लगाकर भी नीलामी की जानकारी दी गई। छह बार प्रयास के बावजूद नीलामी नहीं हो सकी और सातवीं बार प्रक्रिया सफल हुई। नीलामी के दौरान चीनी मिल प्रबंधन के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे और पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई गई।
डीएम ने कहा कि नीलामी पूरी तरह पारदर्शी ढंग से कराई गई है। अभी कागजी औपचारिकताएं पूरी नहीं हुई हैं और मंडलायुक्त के अनुमोदन के बाद ही नीलामी अंतिम रूप से प्रभावी होगी। यदि कोई व्यक्ति या संस्था अधिक मूल्य देने को तैयार है तो वह 15 दिनों के भीतर आपत्ति दर्ज करा सकता है।
किसान यूनियन ने लगाया बड़ा आरोप
भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष बलजिंदर सिंह मान के नेतृत्व में किसान नेताओं ने मंडलायुक्त को ज्ञापन सौंपकर नीलामी पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि जमीन का सरकारी मूल्य लगभग 7,500 रुपये प्रति वर्ग मीटर और बाजार मूल्य करीब 15,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर है।
किसान नेताओं का दावा है कि इस आधार पर भूमि की वास्तविक कीमत करीब 150 करोड़ रुपये बैठती है, लेकिन इसे मात्र 28 करोड़ 5 लाख रुपये में बेच दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि नीलामी प्रक्रिया में बाहरी खरीदारों को शामिल नहीं होने दिया गया और पूरी प्रक्रिया को सीमित दायरे में रखा गया।
किसान यूनियन का कहना है कि यदि भूमि का उचित मूल्य प्राप्त किया जाए तो किसानों के बकाये का बड़ा हिस्सा चुकाया जा सकता है। उन्होंने सक्षम अधिकारी की निगरानी में दोबारा नीलामी कराने की मांग की है।
मंडलायुक्त ने मांगी रिपोर्ट
मंडलायुक्त भूपेंद्र एस. चौधरी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कराने की बात कही है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि जांच में किसी प्रकार की खामी या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख और रालोद ने भी खोला मोर्चा
पूर्व ब्लॉक प्रमुख मोहन सिंह चौहान ने मंडलायुक्त से मुलाकात कर नीलामी रद्द करने की मांग की। उनका आरोप है कि बहुमूल्य भूमि को कौड़ियों के भाव बेच दिया गया।
वहीं रालोद नेता चौधरी सचिन सिंह ने भी नीलामी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है। उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को पूरे मामले से अवगत कराकर हस्तक्षेप की मांग की है।
सपा विधायक अताउर्रहमान ने लगाए मिलीभगत के आरोप
बहेड़ी से सपा विधायक अताउर्रहमान ने नीलामी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि चीनी मिल की बहुमूल्य जमीन और संपत्तियों को बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर बेचा गया है। उन्होंने कहा कि इससे किसानों और आम जनता के हित प्रभावित हुए हैं।
उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच और पारदर्शी तरीके से पुनः नीलामी कराने की मांग की। विधायक ने आरोप लगाया कि नीलामी प्रक्रिया में ऐसे भाजपा नेता सक्रिय थे जो भविष्य में बहेड़ी विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं।
किसानों की निगाहें अब प्रशासनिक फैसले पर
170 करोड़ रुपये के गन्ना मूल्य बकाये, 14 हेक्टेयर भूमि की नीलामी और कथित रूप से कम कीमत पर बिक्री के आरोपों के बीच यह मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से बेहद संवेदनशील हो गया है। किसानों, राजनीतिक दलों और स्थानीय संगठनों की नजरें अब मंडलायुक्त की जांच और अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।