आगरा में भगवान परशुराम स्वत वंदन कार्यक्रम में धर्म और संस्कारों की गूंज, युवाओं को जड़ों से जोड़ने का संदेश

आगरा। बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक चिंतन का एक सशक्त मंच तैयार हुआ, जब विप्र फाउंडेशन एवं तारक सेवा संस्था के संयुक्त तत्वावधान में ‘श्री भगवान परशुराम: शब्द स्वर वंदन’ कार्यक्रम का आयोजन संस्कृति भवन ललित कला संस्थान में किया गया। संगोष्ठी, काव्य-पाठ और भजन संध्या के माध्यम से सनातन मूल्यों, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों पर गहन मंथन हुआ, जिसमें वक्ताओं ने युवाओं को धर्म और संस्कार से जोड़ने की आवश्यकता पर जोरदार आवाज उठाई।

May 1, 2026 - 21:18
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आगरा में भगवान परशुराम स्वत वंदन कार्यक्रम में धर्म और संस्कारों की गूंज, युवाओं को जड़ों से जोड़ने का संदेश
संस्कृति भवन ललित कला संस्थान में आयोजित श्री भगवान परशुराम: शब्द स्वर वंदन कार्यक्रम को संबोधित करते मुख्य वक्ता महंत योगेश पुरी। मंच पर मौजूद हैं प्रो. उमापति दीक्षित, प्रो. लवकुश मिश्रा, प्रो. बल्देव भाई शर्मा और डॉ. रुचि चतुर्वेदी आदि।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. बल्देव भाई शर्मा (पूर्व कुलपति, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय एवं पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली), मुख्य वक्ता महंत योगेश पुरी (श्रीमनःकामेश्वर मंदिर के महंत), प्रो. लवकुश मिश्रा (डीन, स्टूडेंट्स फॉरेन अफेयर्स, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर यूनिवर्सिटी), मधुकर चतुर्वेदी (संगीतज्ञ) एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. राजीव द्विवेदी (निदेशक, वृंदावन शोध संस्थान) द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। काशी विश्वनाथ के मंगलाचरण को स्वर देते हुए प्रो. उमापति दीक्षित (अध्यक्ष, तारक सेवा संस्था) ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की।

आत्मचिंतन का आह्वान, परंपराओं से जुड़ने की सीख

मुख्य वक्ता महंत योगेश पुरी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत ऋषियों की परंपरा का देश है, लेकिन आज भौतिकवाद की अंधी दौड़ में समाज अपनी जड़ों से कटता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान परशुराम किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त मानवता के प्रेरणास्रोत हैं।

उन्होंने धार्मिक उदासीनता पर चिंता जताते हुए कहा कि अपनी आस्था और प्रतीकों को अपनाने में झिझक समाज को कमजोर बना रही है। ब्राह्मणत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल जन्म से नहीं, बल्कि आचरण, ज्ञान और तप से स्थापित होता है। यदि मार्गदर्शक वर्ग ही अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाए, तो समाज का संतुलन बिगड़ना तय है।

महंत योगेश पुरी ने युवाओं से कहा कि वर्तमान समय देश के लिए स्वर्णिम अवसर है, ऐसे में सही इतिहास और संस्कारयुक्त शिक्षा का प्रसार अनिवार्य है। शिक्षित व्यक्ति भटक सकता है, लेकिन धर्म से दीक्षित व्यक्ति नहीं, इस कथन के साथ उन्होंने संस्कार आधारित शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित किया।

बौद्धिक और सांस्कृतिक चिंतन पर जोर

मुख्य अतिथि प्रो. बल्देव भाई शर्मा ने कहा कि समाज में पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति में गिरावट आना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के गहन अध्ययन की आवश्यकता बताई।

प्रो. लवकुश मिश्रा ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने का संदेश दिया और वर्तमान शिक्षा प्रणाली की कमियों पर प्रकाश डाला। वहीं मधुकर चतुर्वेदी ने वेद-उपनिषदों के आधार पर ब्राह्मणत्व की व्याख्या करते हुए ज्ञान और अध्ययन की महत्ता पर जोर दिया।

काव्य और भजन में दिखी श्रद्धा

कार्यक्रम के काव्य-पाठ सत्र में डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने- सत्य सनातन को लाठी ब्रज धरा धाम को वंदन है… और सचिन दीक्षित ने- सबसे पहले वंदन कर… जैसी रचनाओं से वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। संतोष तिवारी की संगीतमय भजन प्रस्तुति ने कार्यक्रम को भक्तिमय रंग में रंग दिया। संचालन पदम गौतम ने किया।

व्यापक उपस्थिति

कार्यक्रम में डॉ. मनोज पांडेय, डॉ. अजीत कुमार पांडे, बृजेश चतुर्वेदी, प्रभु दत्त उपाध्याय, अशोक गोयल, जितेंद्र फौजदार, मोनिका तिवारी, संतोष तिवारी, आचार्य उमाशंकर पाराशर, संजय कुमार, प्रकाश, रामकुमार सिद्धार्थ, अवधेश उपाध्याय, डॉ. मथुरा प्रसाद गौतम, लक्ष्मण चौधरी, वंदना चौधरी, प्रो. बी.के. सिंह, शाहतोष गौतम, निर्मला दीक्षित, राहुल चतुर्वेदी, निधि चतुर्वेदी, बी.आर. शर्मा, सीमा शर्मा, हिमानी चतुर्वेदी, मीना शर्मा, प्रदीप, अदिति, आलोक, जयंत, रवि चौबे, निशांत चतुर्वेदी, डॉ. आनंद राय, राकेश निर्मल, डॉ. रामेंद्र शर्मा, रवि सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

SP_Singh AURGURU Editor