रुहेलखंड में सारसों की बढ़ती आबादी ने रचा पर्यावरणीय संतुलन का नया अध्याय: 1942 तक पहुंची संख्या, 302 बच्चों की मौजूदगी से वन विभाग उत्साहित, यह किसानों के लिए समृद्धि के संकेत साथ ही वेटलैंड संरक्षण की बड़ी सफलता

-आरके सिंह- बरेली। उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी सारस की लगातार बढ़ती संख्या ने जहां किसानों के चेहरे पर संतोष की लकीरें खींच दी हैं, वहीं वन्य जीव प्रेमियों और वन विभाग के अधिकारियों में उत्साह की नई लहर दौड़ा दी है। यह केवल पक्षियों की संख्या में वृद्धि नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन की बहाली का सशक्त संकेत भी है।

May 1, 2026 - 11:46
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रुहेलखंड में सारसों की बढ़ती आबादी ने रचा पर्यावरणीय संतुलन का नया अध्याय: 1942 तक पहुंची संख्या, 302 बच्चों की मौजूदगी से वन विभाग उत्साहित, यह किसानों के लिए समृद्धि के संकेत साथ ही वेटलैंड संरक्षण की बड़ी सफलता

रुहेलखंड जोन के मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह के अनुसार, सारस विश्व का सबसे ऊंचा उड़ने वाला पक्षी है, जिसकी ऊंचाई लगभग 156 से 180 सेंटीमीटर तक होती है। नर और मादा में कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखता। यह हिमालय के दक्षिण में प्रजनन करने वाला एकमात्र क्रेन है, जो इसे और भी विशिष्ट बनाता है।

रुहेलखंड में बढ़ती संख्या बनी उपलब्धि

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, रुहेलखंड जोन में सारसों की कुल संख्या 1942 तक पहुंच गई है। जिलेवार स्थिति इस प्रकार है- बरेली 380, बदायूं 115, शाहजहांपुर 1078, पीलीभीत 98, मुरादाबाद 50, रामपुर 04, बिजनौर 174, संभल 25 और नजीबाबाद 18। सारस पाये गये हैं।
विशेष बात यह है कि इस क्षेत्र में 302 बच्चे भी दर्ज किए गए हैं, जो संरक्षण प्रयासों की सफलता का जीवंत प्रमाण हैं।

किसानों के लिए शुभ संकेत, पर्यावरण के लिए वरदान

ग्रामीण क्षेत्रों में सारस की मौजूदगी को शुभ माना जाता है। किसानों का मानना है कि जिन खेतों में सारस विचरण करते हैं, वहां समृद्धि और संतुलन बना रहता है। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ इसे स्वस्थ जलीय एवं दलदली पारिस्थितिकी का संकेत मानते हैं।

जीवनशैली और प्रजनन की अनोखी दुनिया

डिविजनल फॉरेस्ट अफसर दीक्षा भंडारी बताती हैं कि सारस सलेटी रंग का पक्षी होता है, जिसके पैर और चोंच लाल तथा गर्दन सुर्ख लाल होती है। इनके बच्चे भूरे रंग के होते हैं, जो बड़े होकर सलेटी हो जाते हैं।
सारस प्रायः जोड़ों में रहते हैं और जीवनभर एक ही साथी के प्रति निष्ठावान रहते हैं, इसलिए इन्हें प्रेम और वफादारी का प्रतीक माना जाता है।

इनका प्रजनन मुख्यतः जून-जुलाई में शुरू होता है और अगस्त-सितंबर में चरम पर होता है। मादा सामान्यतः दो अंडे देती है और नर-मादा दोनों मिलकर बच्चों का पालन करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण की रीढ़ बना सारस

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. आरके सिंह के अनुसार, सारस संरक्षण का अर्थ केवल एक पक्षी को बचाना नहीं, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है। दलदली क्षेत्र प्राकृतिक जल शोधक का कार्य करते हैं और जैव विविधता को जीवित रखते हैं।

खतरे भी कम नहीं, सतर्कता जरूरी

हालांकि एक समय सारस की संख्या में गिरावट आई थी और यह वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त हो गया था। लेकिन अब संरक्षण प्रयासों से स्थिति सुधर रही है। फिर भी कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, आवास नष्ट होना और अंडों को खतरा अब भी चुनौती बने हुए हैं।

वन विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे सारस के आवास के आसपास कीटनाशकों का प्रयोग कम करें और अंडों व बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।

SP_Singh AURGURU Editor