छह दिनों में नौ मौतें: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर मौत का तांडव, वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने मुख्यमंत्री योगी से मांगा हस्तक्षेप, ‘स्पीड कॉरिडोर नहीं, सेफ्टी कॉरिडोर बनाइए’ - यूपीड़ा की स्वीकृत सुरक्षा योजनाएं अब तक फाइलों में, लगातार हादसों पर उठ रहे गंभीर सवाल

आगरा/लखनऊ। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर लगातार हो रहे भीषण सड़क हादसों और केवल छह दिनों के भीतर नौ लोगों की मौत के बाद सड़क सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को विस्तृत पत्र भेजकर व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा है कि जब उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीड़ा) स्वयं दुर्घटनाओं के कारणों और समाधान पर सहमत हो चुका है, तब भी सुरक्षा उपायों का धरातल पर क्रियान्वयन न होना गंभीर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।

Jun 1, 2026 - 19:58
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छह दिनों में नौ मौतें: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर मौत का तांडव, वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने मुख्यमंत्री योगी से मांगा हस्तक्षेप, ‘स्पीड कॉरिडोर नहीं, सेफ्टी कॉरिडोर बनाइए’ - यूपीड़ा की स्वीकृत सुरक्षा योजनाएं अब तक फाइलों में, लगातार हादसों पर उठ रहे गंभीर सवाल

के.सी. जैन ने 1 जून 2026 को मुख्यमंत्री को ई-मेल के माध्यम से भेजे पत्र में कहा कि आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे अब गति का प्रतीक कम और हादसों का पर्याय अधिक बनता जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कब तक लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे और सुरक्षा सुधार केवल बैठकों और फाइलों तक सीमित रहेंगे।

छह दिनों में दो भीषण हादसे, नौ लोगों की मौत

पत्र में जैन ने 26 मई और 1 जून 2026 को हुए दो बड़े हादसों का उल्लेख किया है। 26 मई की सुबह उन्नाव जिले के औरास थाना क्षेत्र स्थित निभा खेड़ा गांव के पास किलोमीटर 262 पर दिल्ली से बिहार जा रही लगभग 50 यात्रियों से भरी डबल डेकर वातानुकूलित बस अनियंत्रित होकर पलट गई थी। हादसे में छह लोगों की मौत हो गई थी जबकि 21 यात्री गंभीर रूप से घायल हुए थे। प्रारंभिक जांच में चालक को झपकी आना हादसे का प्रमुख कारण माना गया।

इसके ठीक छह दिन बाद 1 जून की रात आगरा के फतेहाबाद थाना क्षेत्र में एक्सप्रेसवे पर एक और भीषण हादसा हुआ। बिहार से राजस्थान लौट रही एक तेज रफ्तार कार आगे चल रहे कंटेनर में पीछे से जा घुसी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि कार के परखच्चे उड़ गए। हादसे में परमिला (31 वर्ष), पूजा कुमारी (32 वर्ष) और राजू (35 वर्ष) की मौत हो गई, जबकि छह वर्षीय अयांश सहित पांच लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला

के.सी. जैन ने अपने पत्र में बताया कि आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर बढ़ती दुर्घटनाओं को लेकर हेमंत जैन द्वारा 9 दिसंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय में आईए संख्या 286099/2024 दाखिल की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को अपनी सड़क सुरक्षा समिति को भेजा था। समिति की बैठकों में स्वयं के.सी. जैन भी शामिल हुए, लेकिन अभी तक समिति ने अपनी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत नहीं की है। इस बीच हादसों का सिलसिला लगातार जारी है।

यूपीड़ा के आंकड़ों ने ही खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल

एडवोकेट के.सी. जैन ने खुलासा किया कि 10 नवंबर 2025 को लखनऊ स्थित यूपीड़ा मुख्यालय में आयोजित बैठक में सड़क सुरक्षा पर विस्तृत प्रस्तुति दी गई थी। उस बैठक में यूपीड़ा ने स्वयं स्वीकार किया था कि वर्ष 2021 से 2025 के बीच आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर कुल 7,024 दुर्घटनाएं हुईं। इनमें 54.7 प्रतिशत हादसों का प्रमुख कारण चालक की झपकी या थकान थी। लगभग 70 प्रतिशत दुर्घटनाएं रात 12 बजे से सुबह 8 बजे के बीच हुईं।

बैठक में यह भी माना गया था कि रात्रिकाल में 120 किलोमीटर प्रति घंटा की गति सीमा सुरक्षित नहीं है और सर्दियों के दौरान इसे घटाकर 75 किलोमीटर प्रति घंटा करने पर भी सहमति बनी थी। इसके बावजूद आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

2019 के बाद नहीं हुआ स्वतंत्र रोड सेफ्टी ऑडिट

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2019 के बाद से एक्सप्रेसवे का कोई स्वतंत्र सड़क सुरक्षा ऑडिट नहीं कराया गया, जबकि इस दौरान वाहनों की संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है। इसके बावजूद सुरक्षा मानकों की समीक्षा नहीं की गई।

बैठक में सहमति बनी, लेकिन अमल नहीं हुआ

यूपीड़ा ने नवंबर 2025 की बैठक में कई महत्वपूर्ण उपायों पर सहमति जताई थी। इनमें रात्रिकालीन गति सीमा कम करना, ड्रोन आधारित निगरानी, आईआईटी दिल्ली या सीआरआरआई से नया रोड सेफ्टी ऑडिट, डेटा विश्लेषक की नियुक्ति, क्रैश बैरियर निर्माण, चालक वेलनेस जोन, हर 40-50 किलोमीटर पर विश्राम केंद्र, मुफ्त डॉरमिटरी, कम कीमत पर भोजन-चाय और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ई-निगरानी प्रणाली शामिल थीं। लेकिन इनमें से अधिकांश उपाय आज तक धरातल पर दिखाई नहीं दिए।

क्या गति को जीवन से अधिक महत्व दिया जा रहा है?

के.सी. जैन ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि जब 54.7 प्रतिशत हादसों का कारण चालक की थकान है तो रात्रि में 120 किलोमीटर प्रति घंटा की गति सीमा क्यों जारी है? यदि यमुना एक्सप्रेसवे पर रात में गति सीमा कम की जा सकती है तो आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा?

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या बड़े वाहनों पर रियर रिफ्लेक्टर, हैजर्ड लाइट और सुरक्षा मानकों की प्रभावी जांच हो रही है? क्या ई-निगरानी केवल ओवरस्पीडिंग तक सीमित रहनी चाहिए या लेन उल्लंघन, मोबाइल उपयोग, सीट बेल्ट, ओवरलोडिंग और वाहन फिटनेस जैसे पहलुओं पर भी निगरानी बढ़ाई जानी चाहिए?

मुख्यमंत्री से की गई प्रमुख मांगें

के.सी. जैन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि यूपीड़ा को निर्देशित कर 30 दिनों के भीतर सभी स्वीकृत सुरक्षा उपायों की स्थिति सार्वजनिक कराई जाए। रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक गति सीमा 80 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की जाए। प्रत्येक 40 से 50 किलोमीटर पर चालक विश्राम केंद्र और मुफ्त डॉरमिटरी स्थापित की जाए। आईआईटी दिल्ली या सीआरआरआई से तत्काल नया रोड सेफ्टी ऑडिट कराया जाए तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली को व्यापक रूप से लागू किया जाए।

स्लीपिंग ऑन व्हील्स सबसे बड़ा खतरा

के.सी. जैन का कहना है कि देश में सड़क सुरक्षा पर चर्चा अक्सर ओवरस्पीडिंग तक सीमित रहती है, जबकि वास्तविक समस्या चालक की थकान है। लंबी दूरी तक लगातार वाहन चलाने वाले बस और ट्रक चालक अक्सर पहिये पर ही सो जाते हैं, जिससे बड़े हादसे होते हैं। यदि चालकों को सम्मानजनक, सुरक्षित और किफायती विश्राम की सुविधा नहीं मिलेगी तो दुर्घटनाओं का सिलसिला रोकना मुश्किल होगा।

उन्होंने कहा, केवल छह दिनों में नौ लोगों की मौत कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का संकेत है। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे की सफलता वाहनों की गति से नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षित घर वापसी से मापी जानी चाहिए। अब समय आ गया है कि इसे स्पीड कॉरिडोर नहीं, बल्कि सेफ्टी कॉरिडोर बनाया जाए।

SP_Singh AURGURU Editor