अब वक्त आ गया है कि जनसंख्या नीति को बदल दिया जाए!
देश में तेजी से बढ़ती आबादी अब केवल संख्या का विषय नहीं, बल्कि गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं का मूल कारण बनती जा रही है। सीमित संसाधनों पर बढ़ता दबाव आमजन के जीवन स्तर को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में परिवार नियोजन को आसान बनाना, गरीब वर्ग तक गर्भनिरोधक साधनों की पहुंच सुनिश्चित करना, कन्या संतति को प्रोत्साहन देना और छोटे परिवारों को आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराना समय की बड़ी जरूरत है। सोच यही होनी चाहिए कि कम बच्चे होंगे तो परिवार उन्हें बेहतर शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और भविष्य दे सकेगा, जिससे समाज अधिक जागरूक, सक्षम और विकसित बन पाएगा।
-लक्ष्मण प्रसाद-
हिन्दुस्तान में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रदूषण सबसे बड़ी समस्याएं हैं और इनमें भी सबसे मुख्य समस्या अत्यधिक जनसंख्या है, क्योंकि यह गरीबी, बेरोजगारी और प्रदूषण को भी बढ़ाती है। अनेक योजनाओं और प्रयोजनों के बावजूद यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सरकार इन समस्याओं के उचित निवारण के लिए गंभीर नहीं है, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं में समेकित किया जा सकता है।
राजनेता इसलिए ध्यान नहीं देते
संजय गांधी जी के प्रयासों से पुरुष नसबंदी अभियान 1975-77 में चलाया गया था। उस अभियान के दायरे में सरकारी कर्मचारियों को लेना सरकार की भूल साबित हुई। तत्कालीन प्रशासन ने सरकार को बदनाम करने के लिए कुंवारों और साधुओं की भी नसबंदी की, जिससे सरकार की बदनामी हुई तथा ऐसे आरोप हैं कि मतगणना में भी गड़बड़ियां उस समय कर्मचारियों द्वारा की गईं। तब से लेकर आज तक राजनेता कुर्सी प्रेम के कारण इस मुद्दे से दूर रहते हैं।
जनवृद्धि का समर्थन करने वालों के तर्क
हमारी अतिरिक्त (एक्स्ट्रा) संतानें सरकार से कुछ नहीं ले रहीं। परिवार से मिलकर समाज और समाज मिलकर सरकार को बनाता है। सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अतिरिक्त संतान देश के भीतर किसी-न-किसी का रोजगार खत्म कर रही है। अतिरिक्त संतानों का बोझ सरकार पर नहीं तो समाज पर पड़ता है। यदि समाज से कुछ नहीं ले रहे, तो रेगिस्तान या विदेश से जीविका कमाकर दिखाओ।
यह सोच गलत कि बच्चे ईश्वर की देन होते हैं
यह सोच गलत है। ईश्वर की देन तो ईसा थे, जो कुंवारी मरियम से पैदा हुए थे। यदि आपका बच्चा बीबी से केवल हाथ मिलाने से पैदा हो जाए, तो ईश्वर या अल्लाह की देन कह सकते हैं। हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ने एक-दूसरे से डरकर खूब अपनी आबादी बढ़ाई है।
अल्पसंख्यक होने का अर्थ कमजोर होना नहीं
जनसंख्या वृद्धि का समर्थन करने वालों को कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सदैव स्मरण रखने चाहिए कि 1.5 (डेढ़) लाख अंग्रेज 34 करोड़ हिन्दुस्तानियों पर राज करते थे। यह भी जानें कि अल्पसंख्यक यहूदी जाति के पास 83 नोबेल पुरस्कार हैं, कूका आन्दोलन में अल्पसंख्यक सिखों की भूमिका रही और एक छोटे देश वियतनाम से युद्ध में अमेरिका की हार हुई।
नीतिगत त्रुटियां - नियोजन साधनों तक गरीबों की पहुंच न होना
सरकार ने घर-घर तक पोलियो ड्रॉप पहुंचाई, वैसे ही जनसंख्या नियोजन के साधन (कंडोम, जैल, गर्भ-निरोधक इंजेक्शन) नहीं पहुंचाए गए।
अब से 30 साल पहले यह मांग उठी थी कि प्रत्येक आबादी क्षेत्र में कंडोम मशीनें लगाई जाएं, जहाँ लोगों को 2 रुपये का सिक्का डालकर एक कंडोम मिल जाए। यह कार्य आज तक नहीं हो पाया है। नियोजन साधनों की आसान उपलब्धता के बाद ही आप गरीबों को दोषी कह पाएंगे।
क्या होना चाहिए
यदि एक गरीब पांच बच्चे पैदा करता है, तो वह पांच नए गरीब होंगे और एक अमीर यदि पांच बच्चे पैदा करता है, तो वह पांच नए अमीर होंगे। इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए यदि कानून बनाया जाए, तो वह सफल होगा।
-जनसंख्या गणना में दो लड़कियों को एक लड़के के बराबर माना जाए।
-सरकारी कर्मचारियों को 2 चाइल्ड पॉलिसी से अलग किया जाए।
- अमीरों को अधिक बच्चे पैदा करने की कानूनन छूट हो।
- जिनके केवल एक संतान है, उसकी आकस्मिक मृत्यु पर तत्काल एक लाख रुपये सहायता दी जाए और सरकार पीड़ित परिवार (मध्यम/निम्न आय वर्ग) को साढ़े सात हजार रुपये मासिक भत्ता आजीवन दे। जिनकी एकमात्र संतान विकलांग हो, उन्हें भी विकलांगता के प्रतिशत अनुसार भत्ता दिया जाना चाहिए।
- एक कम आय वाले परिवार में यदि दो लड़कियाँ और एक लड़का है, तो उसे आबादी बढ़ाने का दोषी नहीं माना जाए।
-अमीरों को प्रति पांच करोड़ रुपये की अतिरिक्त स्थिर संपत्ति पर अगला बच्चा पैदा करने की छूट हो, अधिकतम 10 बच्चे।
- सरकारी कर्मचारियों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अथवा दंपत्ति को दो बच्चे, तृतीय श्रेणी कर्मचारी को तीन बच्चे, द्वितीय श्रेणी कर्मचारी को चार बच्चे और प्रथम श्रेणी कर्मचारी को पांच बच्चे पैदा करने की कानूनन अनुमति हो।
-अतिरिक्त बच्चे होने पर प्रति दो बच्चों को प्रति एक बच्चे का राशन मिले तथा अतिरिक्त संतानों को 35 वर्ष आयु तक मताधिकार न मिले। यदि वे उच्च स्नातक हो जाते हैं, तो यह अधिकार 25 वर्ष आयु में दे दिया जाए।
-जिन परिवारों ने षड्यंत्र करके कन्या संतति को जन्म नहीं दिया, वहां किसी को अपनी बेटी नहीं देनी चाहिए। ऐसे परिवार अनाथाश्रम से लड़की गोद लेकर पालें। वन चाइल्ड पॉलिसी का पालन करने वालों पर यह सामाजिक दबाव (लड़की गोद लेने का) नहीं होना चाहिए।
- आईवीएफ द्वारा कन्या संतति निर्धारित करने की कानून द्वारा छूट दी जाए।
सेरोगेसी सशर्त मान्य की जाए
सेरोगेसी के लिए शर्तें हों कि महिला विवाहित हो और उसके पास एक संतान अवश्य हो। आयु 23 से 36 वर्ष के मध्य हो। सेरोगेसी चाहने वाले उसका 25 लाख रुपये का बीमा दो वर्ष के लिए कराएं। 25 हजार रुपये मासिक (कुल 15 माह तक) दें। बच्चा प्राप्त करने पर 10 लाख रुपये दें। मिसकैरेज होने पर (चार माह से अधिक का) तीन लाख रुपये दें।
संदेश
जो विकसित नहीं है, उसका कारण कुपोषण है। वे शोषित होते हैं, फलस्वरूप विद्रोही होते हैं और आबादी बढ़ाने को अपनी ताकत समझते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि यदि वे चार बच्चों के बजाय दो बच्चे पैदा करेंगे, तो उनका विकास अधिक हो पाएगा। विकसित को न्याय स्वतः मिल जाता है। इस तरह निम्न आय वर्ग के लोग एक तरह के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं।
Top of Form
Bottom of Form
(लेखक फेसरीडर हैं। लेख में ‘आपके जीवन की समस्याएं और उनके समाधान' नाम से उपलब्ध ई-बुक में संग्रहित आलेख के संपादित अंश हैं)