भारत पर सवालों की बौछार, चीन पर खामोशी! आखिर पश्चिमी मीडिया का यह कैसा डबल स्टैंडर्ड?
पश्चिमी मीडिया भारत की लोकतांत्रिक कमियों, प्रेस स्वतंत्रता, सांप्रदायिक तनाव और राजनीति पर बेहद आक्रामक नजरिया अपनाता है, जबकि चीन जैसे सख़्त नियंत्रित देश पर अपेक्षाकृत नरम रवैया दिखाता है। भारत खुला लोकतंत्र होने के कारण ज्यादा जांच और आलोचना झेलता है, जबकि चीन पर कारोबारी और रणनीतिक हितों के चलते वैसी तीखी वैश्विक नैरेटिव नहीं बनती। अगर लोकतंत्र और मानवाधिकार की कसौटी है, तो वही पैमाना हर देश पर समान रूप से क्यों नहीं लागू होता।
-बृज खंडेलवाल-
मई 2026 में हाल ही में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था- भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?
वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के गिरते स्तर की मिसाल बना दिया।
लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था? चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।
यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है। सीएए को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में हिंदू राष्ट्रवाद और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?"
चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रख रखा है। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।”
क्यों? क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की। भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।
शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है। मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार जोज़फ।
भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं- “बैकस्लाइडिंग”, “मेजॉरिटेरियन”, “हिंदू नेशनलिज्म”। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।
दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है।
यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है। ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।
खुलापन भी बनता है वजह, एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है। भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं।
चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।
पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से।
चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है। भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।
यह फर्क क्यों मायने रखता है। मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती। यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है।
1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है ; उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।
अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा।
पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए। भारत की तुलना सिर्फ पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।
भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए। फिलहाल ऐसा नहीं दिखता। और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।Bottom of Form