अभिषेक बनर्जी के खिलाफ उभरा जनाक्रोश महज विरोध नहीं, सत्ता के अहंकार के खिलाफ जनता की खुली चेतावनी है
बंगाल के सोनारपुर में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के विरोध की घटना केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि उस जन-असंतोष का संकेत है जो लंबे समय से सत्ता, अहंकार और जनसमस्याओं की अनदेखी के खिलाफ भीतर ही भीतर सुलग रहा था। लोकतंत्र में जनता देर से बोलती है, लेकिन जब बोलती है तो सत्ता के सबसे मजबूत किलों की नींव तक हिला देती है।
कोलकाता। पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में टीएमसी सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के विरोध की घटना को केवल एक राजनीतिक टकराव मानना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। यह घटना उस जनाक्रोश की अभिव्यक्ति प्रतीत होती है जो वर्षों से लोगों के मन में जमा होता रहा और अवसर मिलते ही फूट पड़ा।
घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक साजिश या विपक्ष द्वारा प्रायोजित हमला बताने का प्रयास कर रही है, लेकिन स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाएं एक अलग कहानी कहती हैं। लोगों का आरोप है कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधि ने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं, विकास कार्यों और जनसरोकारों की उपेक्षा की। लोकतंत्र में जनता अपेक्षा करती है कि उसका प्रतिनिधि केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में उसके बीच मौजूद रहे। जब यह विश्वास टूटता है तो नाराजगी भी बढ़ती है।
इस घटना का एक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक पक्ष भी है। बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान अभिषेक बनर्जी का वह चर्चित बयान आज भी लोगों के स्मृति-पटल पर मौजूद है, जिसमें उन्होंने राजनीतिक विरोधियों और मतदाताओं को चुनौतीपूर्ण अंदाज में कहा था कि देखता हूं कि चार मई (मतगणना वाले दिन) को दोपहर 12 बजे के बाद किसका बाप बचाने आता है। राजनीति में ऐसे बयान भले ही तत्काल तालियां बटोर लें, लेकिन लोकतंत्र में जनता उन्हें भूलती नहीं है। सत्ता के गलियारों में कही गई बातें अक्सर चुनावी मैदानों और जनसभाओं से निकलकर जनता के मन में स्थायी छाप छोड़ देती हैं।
बंगाल की राजनीति में यह पहली घटना नहीं है। राज्य के कई अन्य टीएमसी नेताओं को भी विभिन्न क्षेत्रों में जनता के विरोध का सामना करना पड़ा है। पार्टी के तमाम पार्षदों ने इसीलिए इस्तीफा दे दिया है क्योंकि उनके घरों से बाहर निकलते ही जनता उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर पीट रही थी। यह संकेत है कि बंगाल में राजनीतिक नेतृत्व और आम जनता के बीच दूरी काफी बढ़ चुकी थी। जब जनप्रतिनिधि जनता के बीच कम और सत्ता के गलियारों में अधिक दिखाई देने लगते हैं, तब लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है।
वास्तव में लोकतंत्र का सबसे बड़ा सत्य यही है कि जनता किसी को स्थायी अधिकार नहीं देती। जनता केवल अवसर देती है। जो नेता उस अवसर को सेवा में बदलता है, वह लंबे समय तक सम्मान पाता है। जो उसे विशेषाधिकार समझ लेता है, उसके लिए वही जनता सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।
सोनारपुर की घटना केवल अभिषेक बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस के लिए चेतावनी नहीं है। यह देश के हर सत्ताधारी नेता, सांसद, विधायक और मंत्री के लिए एक राजनीतिक संदेश है। सत्ता की ताकत प्रशासनिक हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत जनता के हाथ में होती है। चुनावी जीत किसी नेता को जनता से ऊपर नहीं बनाती। जनादेश शासन का अधिकार देता है, जनता पर अधिकार नहीं।
राजनीति में अहंकार का इतिहास हमेशा छोटा रहा है। जनता देर से प्रतिक्रिया देती है, लेकिन जब देती है तो उसका प्रभाव वर्षों तक दिखाई देता है। सत्ता के मद में जनता को कमजोर, बिखरा हुआ या असहाय समझने वाले नेताओं को इतिहास बार-बार याद दिलाता रहा है कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता ही करती है।
सोनारपुर की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को दोहराती है कि जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है। वह सत्ता की निर्माता भी है और आवश्यकता पड़ने पर सत्ता को आईना दिखाने वाली सबसे बड़ी ताकत भी। जो नेता इस सत्य को समझते हैं, वे राजनीति में लंबे समय तक टिकते हैं। जो इसे भूल जाते हैं, उनके लिए जनता का फैसला सबसे कठोर राजनीतिक दंड साबित होता है।