खेल दिवसः मैदानों से कब्ज़ा हटाइए और खिलाड़ियों को बढ़ाइए, खेलों से ही घटेगी अस्पतालों की जरूरत
भारत के विकास और स्वास्थ्य के लिए खेल जरूरी हैं। खेल मैदान घटने और राजनीति बढ़ने से खिलाड़ियों को अवसर नहीं मिल पाते। क्रिकेट से आगे बढ़कर हर खेल और महिला खिलाड़ियों को भी सम्मान देना होगा। कॉरपोरेट व समाजसेवी संगठनों की मदद से खेलों को बढ़ावा मिले तो भारत हर खेल में विश्व में नंबर वन बन सकता है।
पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो होंगे खराब। यह कहावत अब पुरानी हो चुकी है। आज खेल न केवल प्रोफेशन बन चुका है बल्कि इसमें सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों ही उपलब्ध हैं। खेलों में भी तकनीक और प्रतिस्पर्धा अन्य व्यवसायों की तरह प्रवेश कर चुकी है।
खेल मैदान, अस्पतालों की जरूरत घटाते हैं
प्रबुद्ध नागरिकों और वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस देश में खेल के मैदान अधिक होंगे, वहां अस्पतालों की आवश्यकता कम होगी। परंतु भारत में स्थिति चिंताजनक है। गांव से लेकर शहर तक, प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक खेल के मैदानों पर अन्य गतिविधियों ने कब्जा जमा लिया है। कहीं सरकारी कार्यों के नाम पर तो कहीं अवैध निर्माण ने मैदानों को निगल लिया है। स्थिति यह है कि मूकबधिर विद्यालय का खेल मैदान हॉस्टल में बदल गया और बड़े कॉलेजों के मैदान पर मेट्रो परियोजनाओं का कब्जा हो गया।
खेल मैदान राजनीति से मुक्त हों
जरूरत है कि खेल के मैदानों का नियंत्रण गैर-राजनीतिक नागरिकों और सामाजिक संगठनों के हाथों में रहे। सरकार की सीएसआर पॉलिसी और कॉरपोरेट जगत इसमें अहम योगदान दे सकते हैं। यदि सरकार द्वारा दिए जाने वाले अनुदान का सही इस्तेमाल हो और कॉरपोरेट जगत खिलाड़ियों के प्रोत्साहन में योगदान दे तो खेल संस्कृति मजबूत हो सकती है।
हर खेल को मिले बराबरी का सम्मान
हमारी मानसिकता अब भी क्रिकेट और वह भी पुरुष क्रिकेट तक सीमित है। जबकि विश्व स्तर पर भारतीय महिला और पुरुष खिलाड़ी कई खेलों में झंडे गाड़ चुके हैं। हमें यह मिथक तोड़ना होगा कि खेल केवल क्रिकेट तक सीमित हैं। महिला खिलाड़ियों को भी पुरुषों के बराबर सम्मान देना होगा।
राजनीति से मुक्त हो खेल संगठन
भारत को वैश्विक स्तर पर शीर्ष स्थान दिलाने के लिए खेलों से राजनीति को पूरी तरह बाहर करना होगा। राजनीतिक हस्तक्षेप और पदों पर राजनीतिक लोगों की नियुक्ति रोकनी होगी। खेल संगठनों में केवल वे लोग हों जो समाजसेवी, कॉरपोरेट या खेलप्रेमी हों ताकि बिना स्वार्थ और पारदर्शिता से कार्य हो सके। तभी भारत हर खेल में नंबर वन की स्थिति में पहुंच सकेगा।
हर मोहल्ले में हैं ध्यानचंद
प्रतिभा हर शहर और गांव में मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्थानीय प्रशासन, संगठन और नागरिक उसे कितनी गंभीरता से प्रशिक्षण और संसाधन देते हैं। यदि शहरवासी अपने खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने की ललक रखें, तो उनका नाम भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर चमकेगा।
खिलाड़ियों से जुड़े हर पहलू का ऑडिट
खिलाड़ी अपनी मेहनत और प्रतिभा से देश का नाम रोशन करता है, लेकिन सुविधाओं और सम्मान के मामले में वह अक्सर सरकारी तंत्र के आगे मजबूर रहता है। इसलिए सरकार को खिलाड़ियों से जुड़े अनुदान और सुविधाओं का पारदर्शी ऒडिट कराना चाहिए।
राष्ट्रीय खेल दिवस पर लें संकल्प
29 अगस्त, हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद जी की जयंती पर मनाए जाने वाले राष्ट्रीय खेल दिवस पर सभी खेल संगठनों को संकल्प लेना चाहिए कि बिना भाई-भतीजावाद के खिलाड़ियों को सहयोग देंगे। यही इस दिवस की सार्थकता होगी।
-राजीव गुप्ता, जनस्नेही कलम से
लोक स्वर, आगरा