विश्व पर्यावरण दिवस पर ताज की पुकार: विकास की दौड़ में क्यों मुरझा रही है भारत की सबसे खूबसूरत धरोहर?

विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि आर्थिक विकास और आधुनिक सुविधाओं की दौड़ में कहीं हमारी ऐतिहासिक धरोहरें तो पीछे नहीं छूट रही हैं। ताजमहल आज भी प्रदूषण, धूल, बढ़ते यातायात और यमुना नदी की खराब स्थिति जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसके कारण उसके संगमरमर की चमक प्रभावित हो रही है। वर्षों से संरक्षण के लिए अनेक प्रयास और योजनाएं बनाई गईं, लेकिन अपेक्षित परिणाम अभी भी दूर हैं। पर्यावरण संरक्षण और धरोहरों की सुरक्षा को केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व के रूप में स्वीकार करना समय की मांग है।

Jun 5, 2026 - 12:55
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विश्व पर्यावरण दिवस पर ताज की पुकार: विकास की दौड़ में क्यों मुरझा रही है भारत की सबसे खूबसूरत धरोहर?

-बृज खंडेलवाल-

कल्पना कीजिए। विश्व पर्यावरण दिवस संध्या है। चांदनी ताजमहल पर बिखरी हुई है। अचानक संगमरमर की सीढ़ियों पर दो परछाइयां उतरती हैं। एक शाहजहां की। दूसरी मुमताज़ की। दोनों अपने प्रेम की इस अमर निशानी को देखते हैं।

शाहजहाँ की आंखें नम हो जाती हैं। "क्या यही वह ताज है जिसे मैंने दुनिया के लिए छोड़ा था?" मुमताज़ धीरे से संगमरमर की दीवार छूती हैं। उंगलियों पर पीली धूल चिपक जाती है। दोनों खामोश हो जाते हैं। शायद आज ताजमहल खुद भी रो रहा है।

यह कहानी किसी कविता की नहीं, एक कड़वी हकीकत की है। करीब चालीस वर्ष पहले, 1983 में, पर्यावरणविद् और वकील एम.सी. मेहता ने ताजमहल के रंग में बदलाव देखा। वह दूधिया सफेद संगमरमर, जिसे मुगल कारीगरों ने बेमिसाल मेहनत से तराशा था, धीरे-धीरे पीला पड़ रहा था। खतरे की घंटी बज चुकी थी।

1984 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने हस्तक्षेप किया। उम्मीद जगी कि ताज बच जाएगा। लेकिन चार दशक बाद भी सवाल वहीं खड़ा है। क्या हमने सचमुच ताज को बचाया?

ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन, जिसे टीटीजेड कहा जाता है, लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला क्षेत्र है। इसमें ताजमहल समेत तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल आते हैं।

1980 के दशक में इस इलाके में 250 से 300 तक कोयला आधारित फाउंड्रियां धुआं उगल रही थीं। दूसरी ओर मथुरा रिफाइनरी से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड हवा के साथ आगरा पहुंचती थी। नमी से मिलकर यह सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती थी। वैज्ञानिकों ने इसे "मार्बल कैंसर" नाम दिया। संगमरमर धीरे-धीरे बीमार पड़ने लगा।

1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 292 उद्योगों को प्राकृतिक गैस अपनाने या क्षेत्र छोड़ने का आदेश मिला। हरित पट्टियां विकसित करने, प्रदूषण की निगरानी करने और प्रभावित मजदूरों के पुनर्वास के निर्देश दिए गए। यह फैसला पर्यावरण न्यायशास्त्र की मिसाल बन गया।

कुछ बदलाव हुए भी। अधिकांश कोयला आधारित उद्योग या तो बंद हुए या गैस पर चले गए। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। पुराने दुश्मन गए तो नए आ गए। आज ताज को कारखानों से कम, वाहनों से ज्यादा खतरा है। लाखों पर्यटक, बढ़ती ट्रैफिक, निर्माण कार्यों की धूल, आसपास के ईंट-भट्ठे और यमुना की बदहाली नया संकट बन चुके हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि हवा में धूल कणों का स्तर आज भी सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। सर्दियों में हालात और बिगड़ जाते हैं। ताज का रंग फिर भी बदल रहा है।

यमुना, जो कभी ताज का प्राकृतिक दर्पण थी, अब एक बीमार नदी बन चुकी है। उसके सूखे और प्रदूषित किनारों से उठती धूल सीधे ताज तक पहुंचती है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पूरी क्षमता से नहीं चल रहे। हरित पट्टियां जगह-जगह सिकुड़ रही हैं।

कागजों में योजनाएं बनती हैं। बैठकों में भाषण होते हैं। फाइलें घूमती हैं। लेकिन ताज का संगमरमर हर दिन थोड़ा और बूढ़ा हो जाता है।

विडंबना देखिए। जिस स्मारक ने मुगल साम्राज्य के उतार-चढ़ाव देखे, जिसने औपनिवेशिक उपेक्षा झेली, जिसने युद्धों और राजनीतिक उथल-पुथल को सहा, वह आज हमारी प्रशासनिक उदासीनता के सामने असहाय खड़ा है।

हम विकास के नाम पर ऊंची सड़कें बना रहे हैं, नई इमारतें खड़ी कर रहे हैं, निवेश सम्मेलनों में तालियां बजा रहे हैं। लेकिन यदि ताज का रंग ही खो गया तो दुनिया आगरा को किसलिए याद रखेगी?

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का उत्सव नहीं है। यह आईना देखने का दिन भी है।

ताजमहल केवल एक मकबरा नहीं। यह भारत की पहचान है। यह हमारी सांस्कृतिक पूंजी है। यह करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है।

वाहन प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण, यमुना का पुनर्जीवन, हरित क्षेत्रों की कानूनी सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं। क्योंकि संगमरमर के पास अब और चालीस साल इंतजार करने का समय नहीं है। और शायद अगली पूर्णिमा की रात, यदि शाहजहाँ और मुमताज़ फिर लौटें, तो वे अपने ताज को देखकर मुस्कुरा सकें; रोएं नहीं।

SP_Singh AURGURU Editor