थाईलैंड का कंबोडिया पर भीषण हमला, एक सैन्य ठिकाना नष्ट

बैंकाक। थाईलैंड ने हाल ही में कंबोडिया के विवादित सैन्य ठिकानों पर एफ-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर सैन्य कार्रवाई की। यह कदम तब उठाया गया जब थाई क्षेत्र में भारी गोलीबारी और रॉकेट से हमला किया गया। थाई सेना की उप प्रवक्ता ऋचा सुक्सुवानन ने स्पष्ट रूप से कहा कि हमने योजना के अनुसार सैन्य ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की। इस दौरान छह एफ-16 विमानों में से एक ने कंबोडियाई क्षेत्र में एक सैन्य ठिकाने को नष्ट कर दिया। वहीं थाईलैंड ने दावा किया है कि कंबोडिया के साथ जारी संघर्ष के दौरान 9 लोगों की मौत हो गई।

Jul 24, 2025 - 17:48
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थाईलैंड का कंबोडिया पर भीषण हमला, एक सैन्य ठिकाना नष्ट


 

यह पहली बार नहीं है, जब दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ा हो, लेकिन इस बार यह प्रतिक्रिया अधिक आक्रामक और योजनाबद्ध दिखाई देती है। थाई सेना का दावा है कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई है, जबकि कंबोडिया ने इसे क्रूर और बर्बर सैन्य आक्रमण करार दिया है।


 यह विवाद कोई नया नहीं है। दोनों देशों के बीच यह तनाव 12वीं सदी के प्रसिद्ध हिंदू मंदिर प्रीह विहार को लेकर दशकों से जारी है। 1962 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने इस मंदिर को कंबोडिया का हिस्सा घोषित किया था, लेकिन थाईलैंड के कुछ राष्ट्रवादी गुट इसे आज भी चुनौती देते हैं। मंदिर का न केवल ऐतिहासिक महत्व  है, बल्कि कंबोडियाई राष्ट्रीयता और धार्मिक भावनाओं से भी जुड़ा है। इसी क्षेत्र में बार-बार सैन्य झड़पें हुई हैं। इससे पहले साल 2008, 2011 और अब 2025 में फिर से लड़ाई हो गई थी।

इस बार हुए हमलों में ना सिर्फ सैन्य ठिकाने बल्कि नागरिक क्षेत्र भी प्रभावित हुए। थाईलैंड के अनुसार कंबोडियाई सैनिकों ने सीमा पर एक सैन्य अड्डे और अस्पताल को निशाना बनाया है। यह सब दर्शाता है कि संघर्ष अब केवल सैन्य सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। इसका असर आम नागरिकों पर भी पड़ रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने दोनों देशों से संयम बरतने और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की अपील की है। इसके अलावा यूएनएससी की आपातकालीन बैठक की भी मांग की गई है।

दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजदूतों को निष्कासित कर दिया है। थाईलैंड ने कंबोडिया के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी है कि अगर हमले जारी रहे तो वह अपनी आत्मरक्षा की रणनीति को और तेज करेगा। इस घटना का प्रभाव न केवल क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ेगा, बल्कि आसियान जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इसके परिणाम देखने को मिल सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यही हाल रहा तो अमेरिका और चीन जैसी वैश्विक शक्तियां भी मध्यस्थता के लिए सामने आ सकती हैं।