ग्रीनलैंड पर आर-पार की तैयारी में ट्रंप, नाटो की एकजुटता भी बेअसर! टैरिफ की धमकी, सैन्य अभ्यास और वैश्विक टकराव के बीच ग्रीनलैंड का भविष्य अधर में
वाशिंगटन। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख लगातार सख्त होता जा रहा है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि ट्रंप इस रणनीतिक द्वीप पर कब्जे के मुद्दे पर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। दूसरी ओर डेनमार्क और नाटो देश ग्रीनलैंड को बचाने की बातें तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी सैन्य और आर्थिक ताकत अमेरिका के सामने बेहद सीमित नजर आ रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या ग्रीनलैंड को ट्रंप की महत्वाकांक्षा से कोई बचा पाएगा या फिर इसका भविष्य पहले ही तय हो चुका है?
ग्रीनलैंड भले ही प्रशासनिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा हो, लेकिन उसकी भौगोलिक और सामरिक अहमियत ने उसे वैश्विक शक्तियों के केंद्र में ला खड़ा किया है। यहां मौजूद सोने के भंडार, दुर्लभ खनिज, तेल और रेयर अर्थ मटीरियल के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग के कारण खुलते नए समुद्री मार्ग अमेरिका, चीन और रूस, तीनों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। बर्फ के पिघलने से एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी कम हो सकती है, और ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का मतलब इन मार्गों पर प्रभावी पकड़।
ग्रीनलैंड की इच्छा और डेनमार्क का रुख
ग्रीनलैंड की आबादी महज करीब 56 हजार है। डेनमार्क साफ कर चुका है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। नाटो के अन्य देशों ने भी यही रुख अपनाया है। इससे नाराज ट्रंप ने नाटो के आठ देशों पर 10 फीसदी टैरिफ लगा दिया और ग्रीनलैंड पर समझौता न होने की स्थिति में 1 फरवरी से 25 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी।
फ्रांस ने खोला मोर्चा, ईयू का ‘बजुका’ सामने
ट्रंप की टैरिफ धमकी के जवाब में नाटो सदस्य फ्रांस ने खुलकर मोर्चा संभाला है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने यूरोपियन यूनियन से ‘एंटी-कोअर्सन इंस्ट्रूमेंट’ को सक्रिय करने की मांग की है। इसे व्यापारिक दुनिया का ‘बजुका’ कहा जाता है, जिसके जरिए यूरोपियन यूनियन, अमेरिका से आयात रोक सकता है या उस पर अतिरिक्त टैक्स लगा सकता है। हालांकि जानकार मानते हैं कि यह हथियार अमेरिका पर सीमित असर ही डाल पाएगा।
नाटो की सैन्य एकजुटता, पर ताकत नाकाफी
ग्रीनलैंड में नाटो देशों ने ‘आर्कटिक एंड्योरेंस’ नाम से सैन्य अभ्यास शुरू किया है। इसमें फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नॉर्वे, नीदरलैंड्स, फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क के सैनिक शामिल हैं। लेकिन हकीकत यह है कि यह अभ्यास प्रतीकात्मक ज्यादा और प्रभावी कम है। फ्रांस के केवल 15, जर्मनी के 13 और कुछ देशों के तो एक-एक सैनिक ही इसमें शामिल हैं। डेनमार्क के भी ग्रीनलैंड में कुल करीब 200 सैनिक ही तैनात हैं। आने वाले समय में ‘ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री’ नाम से बड़ा अभ्यास प्रस्तावित है, लेकिन अमेरिका जैसी सैन्य शक्ति के सामने यह भी नाकाफी माना जा रहा है।
अमेरिका के बिना नाटो अधूरा
सच्चाई यह है कि नाटो की रीढ़ अमेरिका ही है। चाहे इंटेलिजेंस हो, सैटेलाइट नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स या मिसाइल डिफेंस। नाटो देशों के करीब 60 फीसदी हथियार अमेरिका से आते हैं। एलएनजी गैस का बड़ा हिस्सा, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर तक में यूरोप अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर है। ऐसे में नाटो, अमेरिका के खिलाफ न तो सैन्य मोर्चा खोल सकता है और न ही आर्थिक दबाव बना सकता है।
तो ग्रीनलैंड को कौन बचा सकता है?
मौजूदा हालात में ग्रीनलैंड को अगर कोई संतुलन दे सकता है, तो वे केवल रूस और चीन हैं। लेकिन अगर ये दोनों शक्तियां खुलकर इस टकराव में उतरती हैं, तो मामला सिर्फ ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं रहेगा। तब वैश्विक युद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, जिसकी तबाही की कल्पना करना भी मुश्किल है।