कुल्हाड़ी से कटते जंगलों के बीच मंच पर गूंजी ‘रामी’ की पुकार, प्रकृति बचाने के लिए दे दी जान, इप्टा की दमदार प्रस्तुति ने औद्योगीकरण और शहरीकरण के बीच पर्यावरण संरक्षण का दिया मार्मिक संदेश
आगरा। औद्योगीकरण और शहरीकरण की अंधी दौड़ में जब पेड़, झाड़ियां, कुएं और प्राकृतिक सौंदर्य लगातार खत्म होते जा रहे हैं, ऐसे समय में आगरा इप्टा की नाट्य प्रस्तुति ‘रामी’ ने मंच से पर्यावरण संरक्षण की ऐसी मार्मिक पुकार उठाई कि दर्शक प्रकृति और विकास के बीच खड़े सवालों से रूबरू हो गए। माथुर वैश्य सभा भवन में प्रस्तुत नाटक में एक बंजारन बच्ची रामी की कहानी के माध्यम से दिखाया गया कि जिस प्रकृति से मनुष्य जीवन पाता है, उसी के विनाश की कीमत अंततः उसे ही चुकानी पड़ती है। प्रकृति को बचाने के प्रयास में रामी का अपने प्राणों की आहुति देना नाटक का सबसे मार्मिक और झकझोर देने वाला प्रसंग रहा।

नाट्य प्रस्तुति रामी के दौरान दर्शकों को संबोधित करते वरिष्ठ रंगकर्मी दिलीप रघुवंशी और अन्य।
बरगद से कैर की झाड़ी तक प्रकृति में दुनिया देखती थी रामी
‘रामी’ जोधपुर, राजस्थान के प्रसिद्ध कहानीकार श्री सत्यनारायण की कहानी है, जिसका नाट्य रूपांतरण दिलीप रघुवंशी ने किया और उन्होंने ही इसका निर्देशन भी किया। कहानी की केंद्रीय पात्र रामी एक बंजारन बच्ची है, जिसे प्रकृति से गहरा लगाव है। विशाल बरगद का पेड़ हो, कैर की झाड़ी, कुआं या आसपास का कोई प्राकृतिक दृश्य, रामी हर चीज को बेहद आत्मीयता से निहारती है। प्रकृति उसके लिए महज दृश्य नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
सत्या की दोस्ती ने खोली प्रकृति की अद्भुत दुनिया
कहानी में सत्या नामक बच्चे का परिवार उस इलाके में आता है। रामी और सत्या की दोस्ती होती है और रामी उसे प्रकृति के उन अद्भुत रूपों से परिचित कराती है, जिन्हें सामान्य नजरें अक्सर अनदेखा कर देती हैं। दोनों बच्चों की यह दोस्ती प्रकृति के प्रति संवेदना और उसके साथ मनुष्य के सहज रिश्ते को सामने लाती है।
कुछ समय बाद सत्या के पिता का फिर स्थानांतरण हो जाता है और दोनों बच्चे अलग हो जाते हैं। कहानी यहीं से समय की लंबी यात्रा तय करती है। बीस वर्ष बाद सत्या वापस लौटता है और रामी को तलाशता है, लेकिन तब तक उसका जाना-पहचाना प्राकृतिक संसार बदल चुका होता है।
विकास की कीमत पर उजड़ गया प्राकृतिक संसार
सत्या को पता चलता है कि जिस प्राकृतिक सौंदर्य में कभी रामी और वह बचपन बिताते थे, वह औद्योगीकरण और शहरीकरण की भेंट चढ़ चुका है। पेड़-पौधों और प्राकृतिक परिवेश की जगह कंक्रीट और विकास की संरचनाओं ने ले ली है। रामी ने प्रकृति को बचाने के लिए संघर्ष किया, लेकिन अंततः इसी प्रयास में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
नाटक का यही अंत दर्शकों को भीतर तक झकझोर गया। रामी के माध्यम से यह सवाल भी सामने आया कि विकास की ऐसी दौड़, जिसमें प्रकृति ही नष्ट हो जाए, आखिर किसके लिए है। आगरा इप्टा और निर्देशक दिलीप रघुवंशी ने नाटक के जरिए पर्यावरण संरक्षण को लेकर बेहद सारगर्भित और प्रभावी संदेश देने का प्रयास किया।
इप्टा के इतिहास से लेकर रंगमंच की ताकत तक
कार्यक्रम की शुरुआत में प्रो. ज्योत्सना रघुवंशी ने इप्टा के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 1942 में बंगाल के अकाल के समय राजेंद्र रघुवंशी ने बिशन खन्ना के साथ मिलकर एक कल्चरल स्क्वायड की स्थापना की थी। गीतों और नाटकों की प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों में जागरूकता पैदा करने का काम किया गया। वर्ष 1943 में विधिवत इप्टा की स्थापना हुई और इसके बाद इसका कारवां आगे बढ़ता गया।
उन्होंने कहा कि बीच में कुछ रुकावटें आईं, लेकिन राजेंद्र रघुवंशी ने वर्ष 1985 में इप्टा का राष्ट्रीय अधिवेशन कर संगठन में फिर से नवप्राण का संचार किया। रंगमंच ऐसा माध्यम है, जो सीधे जनता से संवाद करता है और सामाजिक सरोकारों को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है।
कहानीकार सत्यनारायण का हुआ सम्मान
नाटक की प्रस्तुति के अवसर पर कहानीकार श्री सत्यनारायण स्वयं जोधपुर से आगरा पहुंचे। संयोजक नीरज मिश्रा ने माल्यार्पण कर उनका स्वागत किया, जबकि आगरा इप्टा के अध्यक्ष सुबोध गोयल ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। छत्तीसगढ़ से पधारे साहित्यकार जय प्रकाश का शकील चौहान ने माल्यार्पण कर स्वागत किया।
कलाकारों ने पात्रों में भर दी जीवंतता
रामी की भूमिका में निवेदिता और सत्या की भूमिका में रविंदर ने प्रभावशाली अभिनय किया। सूत्रधार की भूमिका में असलम खान, लेखक की भूमिका में जय कुमार, ग्रामीण की भूमिका में पार्थो घोष और सत्या की मां की भूमिका में पूजा पाराशर ने अपने-अपने पात्रों को जीवंतता प्रदान की। पार्श्व स्वर कुमकुम रघुवंशी का रहा।
संगीत, नृत्य और प्रकाश व्यवस्था ने प्रस्तुति को बनाया प्रभावी
नाटक का संगीत संयोजन सिद्धार्थ रघुवंशी और संगीत संचालन परमानंद शर्मा ने किया। नृत्य संयोजन पूजा शर्मा का रहा, जबकि लाइटिंग व्यवस्था बब्बू ने संभाली। शकील चौहान और शैलेन्द्र शर्मा ने प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली। मुख्य सहयोग कुमकुम रघुवंशी और मुक्ति किंकर का रहा। रिकॉर्डिंग का भार इमामुद्दीन ने संभाला और रूपसज्जा आनंद बंसल की रही।
कलाकारों को दिए गए पुरस्कार
कार्यक्रम के अंत में क्रांतिकारी रोशन लाल सुतेल स्मृति समिति की ओर से सभी प्रतिभागी कलाकारों को पुरस्कार प्रदान किए गए। धन्यवाद ज्ञापन आगरा इप्टा के अध्यक्ष सुबोध गोयल ने किया।
कार्यक्रम में डॉ. शशि तिवारी, अनिल शुक्ला, प्रियंका मिश्रा, अनिल जैन, धर्मजीत सिंह सहित शहर के अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
सार: आगरा इप्टा की ‘रामी’ ने बंजारन बच्ची की कहानी के जरिए प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते और उसके विनाश की त्रासदी को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। औद्योगीकरण और शहरीकरण के बीच पर्यावरण संरक्षण का संदेश नाटक का केंद्रीय स्वर रहा। रामी का प्रकृति बचाने के लिए बलिदान दर्शकों को गहरे तक संवेदित कर गया।