खाकी की करतूत पर कोर्ट सख्त, महिला उत्पीड़न मामले में चार पुलिसकर्मियों पर मुकदमा
आगरा में सीमा सिकरवार नामक महिला के साथ पुलिस हिरासत में कथित मारपीट और उत्पीड़न के मामले में विशेष सीजेएम ने चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। मेडिकल और पुनः मेडिकल रिपोर्ट में चोटों के संकेत मिलने के बाद अदालत ने निष्पक्ष जांच की आवश्यकता जताई। साथ ही विभागीय जांच कर एक माह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पिछले एक वर्ष में आगरा में हिरासत में प्रताड़ना और थर्ड डिग्री के कई आरोप अदालतों और मानवाधिकार संस्थाओं तक पहुंच चुके हैं।
मेडिकल रिपोर्ट में चोटों के संकेत मिलने पर कोर्ट का बड़ा फैसला, विभागीय जांच भी एक माह में पूरी करने के निर्देश
आगरा। आगरा में पुलिस अभिरक्षा के दौरान एक महिला के साथ कथित मारपीट और उत्पीड़न के मामले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच कराने के आदेश दिए हैं। विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) ने उपलब्ध चिकित्सीय रिपोर्टों, पुनः चिकित्सीय परीक्षण और अन्य अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद माना कि प्रथम दृष्टया महिला के साथ हिरासत में दुर्व्यवहार और मारपीट किए जाने के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
मामला सीमा सिकरवार नामक महिला से जुड़ा है। महिला का आरोप है कि गिरफ्तारी के दौरान तथा बाद में पुलिसकर्मियों ने उसके साथ मारपीट की, अभद्र व्यवहार किया और उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। अदालत के निर्देश पर कराए गए मेडिकल परीक्षण और बाद में हुए पुनः परीक्षण में महिला के शरीर पर चोटों का उल्लेख किया गया, जिसे न्यायालय ने गंभीरता से लिया।
सुनवाई के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों और चिकित्सीय साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने तत्कालीन उपनिरीक्षक सुरजीत सिंह, उपनिरीक्षक नीलेश शर्मा, महिला उपनिरीक्षक नेहा तथा महिला हेड कांस्टेबल सीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई करने के आदेश दिए। इसके साथ ही पुलिस प्रशासन को विभागीय जांच कर एक माह के भीतर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया है।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट टिप्पणी की कि किसी भी व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाना कानून के शासन और मानवाधिकारों के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि अभिरक्षा में हिंसा के आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं होती है तो इससे न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो सकते हैं।
पिछले वर्षों में भी उठते रहे हैं ऐसे सवाल
आगरा में बीते एक वर्ष के दौरान पुलिस हिरासत में कथित प्रताड़ना और थर्ड डिग्री के कई मामले चर्चा में रहे हैं। इनमें से कुछ मामलों में अदालतों और विभागीय जांच एजेंसियों को हस्तक्षेप करना पड़ा।
जीवनी मंडी चौकी मामला
जनवरी 2026 में छत्ता थाना क्षेत्र की जीवनी मंडी चौकी में दूध विक्रेता नरेंद्र कुशवाह ने पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत में कहा गया था कि पूछताछ के दौरान उसे थर्ड डिग्री दी गई, तलवों पर डंडे मारे गए और नाखून तक उखाड़े गए। मामला सामने आने के बाद तत्कालीन चौकी प्रभारी रविंद्र कुमार, उपनिरीक्षक सनीपाल, एआर राज बिहारी और संजय के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। विभागीय कार्रवाई के तहत कुछ पुलिसकर्मी निलंबित और लाइन हाजिर भी किए गए, हालांकि पुलिस ने चोटों को साधारण प्रकृति का बताया था।
इमरान उर्फ बाबुआ प्रकरण
जून 2025 में रकाबगंज क्षेत्र में पुलिस मुठभेड़ के बाद गौकशी के आरोपी इमरान उर्फ बाबुआ ने अदालत में आरोप लगाया था कि पुलिस ने पहले उसके साथ मारपीट की और बाद में गोली मारी। मामले में स्पेशल सीजेएम ने मानवाधिकार उल्लंघन के पहलू को गंभीर मानते हुए मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए थे। बाद में कराए गए दूसरे मेडिकल परीक्षण में अतिरिक्त चोटों का उल्लेख मिलने के बाद जांच दूसरे थाने को सौंप दी गई थी।
किसान राजू शर्मा मामला
किरावली क्षेत्र के किसान राजू शर्मा ने भी पुलिस पर थर्ड डिग्री देने और पैर तोड़ने का आरोप लगाया था। विभागीय जांच में तत्कालीन थाना प्रभारी नीरज सिंह, उपनिरीक्षक धर्मवीर सिंह और कांस्टेबल रवि मलिक को दोषी मानते हुए निलंबित किया गया था। यह मामला अभी भी न्यायिक निगरानी में है और राज्य मानवाधिकार आयोग भी इसका संज्ञान ले चुका है।
बढ़ती शिकायतों के बीच फिर उठे जवाबदेही के सवाल
ताजा मामले में अदालत के आदेश ने एक बार फिर पुलिस अभिरक्षा में मानवाधिकारों की सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हिरासत में किसी भी प्रकार की हिंसा या उत्पीड़न के आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच न केवल पीड़ित के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है, बल्कि पुलिस व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है।