इंडिया गठबंधन की बैठक: एकता का मंच या अंतर्विरोधों का आईना? अब तक उदासीन रहीं ममता बनर्जी सक्रिय हुईं तो डीएमके और आप दूर हो गई

इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक ने विपक्षी एकता की बजाय उसके भीतर मौजूद मतभेदों और नेतृत्व संकट को अधिक उजागर किया। ममता बनर्जी की सक्रियता के बावजूद द्रमुक और आम आदमी पार्टी की दूरी ने गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपने सहयोगी दलों के बीच विश्वास और समन्वय कायम करना है।

Jun 9, 2026 - 13:01
 0
इंडिया गठबंधन की बैठक: एकता का मंच या अंतर्विरोधों का आईना? अब तक उदासीन रहीं ममता बनर्जी सक्रिय हुईं तो डीएमके और आप दूर हो गई

नई दिल्ली। करीब एक वर्ष के अंतराल के बाद हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से विपक्षी एकता की नई तस्वीर उभरने की उम्मीद थी, लेकिन बैठक ने जितने सवालों का जवाब देना था, उससे कहीं अधिक नए सवाल खड़े कर दिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या विपक्ष वास्तव में वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर एकजुट है या फिर यह गठबंधन केवल चुनावी मजबूरियों का परिणाम बनकर रह गया है?

इस बैठक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसे सक्रिय कराने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहल की। विडंबना यह है कि वही ममता बनर्जी, जो लंबे समय तक इंडिया गठबंधन को लेकर उदासीन रहीं और नेतृत्व के मुद्दे पर कांग्रेस से दूरी बनाए रखी, अब इसकी सबसे मुखर समर्थक नजर आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बदलाव उनके हालिया राजनीतिक झटकों और बदलते राष्ट्रीय समीकरणों का परिणाम माना जा सकता है।

हालांकि ममता बनर्जी की सक्रियता भी गठबंधन को मजबूती देने में पर्याप्त नहीं दिखी। आम आदमी पार्टी और द्रमुक जैसी महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टियों की अनुपस्थिति ने साफ संकेत दिया कि विपक्षी खेमे के भीतर असंतोष और अविश्वास की खाई अभी भी गहरी है। यदि गठबंधन के प्रमुख घटक दल ही एक मंच पर आने से हिचक रहे हैं, तो भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह बड़ा सवाल है।

द्रमुक की दूरी ने कांग्रेस की क्षेत्रीय राजनीति को लेकर भी प्रश्न खड़े किए हैं। क्षेत्रीय दलों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की बात करती है, लेकिन राज्यों में अपने राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देती है। यही विरोधाभास कई बार विपक्षी एकता के प्रयासों को कमजोर करता रहा है।

बैठक में वामपंथी दलों की नाराजगी भी सामने आई। इससे स्पष्ट है कि गठबंधन के भीतर केवल भाजपा विरोध ही एकमात्र साझा सूत्र नहीं हो सकता। जब तक सहयोगी दलों के बीच विश्वास, सम्मान और स्पष्ट राजनीतिक समझ विकसित नहीं होगी, तब तक किसी भी साझा मोर्चे की मजबूती संदिग्ध बनी रहेगी।

निस्संदेह, गठबंधन ने मतदाता सूची संशोधन, जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग, गैर-भाजपा शासित राज्यों के साथ भेदभाव, पेपर लीक, महंगाई, बेरोजगारी और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। ये ऐसे विषय हैं जो आम जनता से सीधे जुड़े हैं और विपक्ष को राजनीतिक अवसर प्रदान कर सकते हैं। लेकिन केवल मुद्दे तय कर लेना पर्याप्त नहीं होता; उन्हें लेकर एकजुट और विश्वसनीय राजनीतिक अभियान चलाना भी उतना ही आवश्यक है।

इंडिया गठबंधन का गठन वर्ष 2023 में भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के बड़े दावे के साथ हुआ था। हालांकि इसकी सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा 2024 के लोकसभा चुनाव में हुई, जहां गठबंधन केंद्र की सत्ता हासिल करने में असफल रहा। गठबंधन की आंशिक सफलता यह जरूर रही कि उसने भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत के आंकड़े से दूर रखने में भूमिका निभाई, लेकिन सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। इसके बाद से गठबंधन के कई प्रमुख घटक दल लगातार चुनावी झटके झेलते रहे हैं।

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी-एसपी), बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, दिल्ली में आम आदमी पार्टी, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की द्रमुक (डीएमके) तथा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को चुनावी पराजयों का सामना करना पड़ा। वहीं कांग्रेस भी मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव हार चुकी है। ऐसे में विपक्षी गठबंधन के सामने केवल भाजपा से मुकाबले की ही नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार और जनविश्वास को बनाए रखने की भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

असल चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि विपक्ष की आंतरिक असंगतियां हैं। भारतीय राजनीति में गठबंधन तभी सफल होते हैं जब उनमें नेतृत्व को लेकर स्पष्टता, साझा एजेंडा और परस्पर विश्वास हो। फिलहाल इंडिया गठबंधन इन तीनों मोर्चों पर संघर्ष करता दिखाई दे रहा है।

कुल मिलाकर, यह बैठक विपक्षी एकता का शक्ति प्रदर्शन कम और उसके अंतर्विरोधों का सार्वजनिक प्रदर्शन अधिक साबित हुई। ममता बनर्जी की सक्रियता ने गठबंधन को नई ऊर्जा देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन द्रमुक और आम आदमी पार्टी की दूरी ने यह संकेत भी दे दिया है कि विपक्षी एकता का रास्ता अभी लंबा और कठिन है। आने वाले समय में यह गठबंधन अपने मतभेदों को कितना दूर कर पाता है, यही उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता और भविष्य तय करेगा।

SP_Singh AURGURU Editor