ममता बनर्जी के राहुल गांधी को लेकर बदल रहे सुर: क्या बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी की नई राजनीतिक केमिस्ट्री आकार ले रही है?
बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और टीएमसी के बीच लंबे समय से चली आ रही दूरी चुनावी परिस्थितियों और राष्ट्रीय राजनीति की जरूरतों के कारण कम होती दिखाई दे रही है। भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की आवश्यकता ने दोनों दलों को संवाद और सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। हालांकि पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन बदलते हालात नए समीकरणों की ओर संकेत कर रहे हैं।
-एसपी सिंह-
पश्चिम बंगाल की राजनीति में शायद सबसे बड़ा बदलाव चुनावी नतीजों से नहीं, बल्कि नेताओं की भाषा और व्यवहार से समझा जा सकता है। राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच उभरती नई नजदीकियां इसी सिद्धांत को फिर से प्रमाणित करती दिखाई दे रही हैं।
एक समय था जब टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच राजनीतिक दूरी किसी से छिपी नहीं थी। विपक्षी एकता की कोशिशों के दौरान भी ममता बनर्जी राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सहज नहीं दिखती थीं। लोकसभा चुनाव हो या बंगाल विधानसभा चुनाव, दोनों दलों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा का माहौल बना रहा। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व, विशेषकर अधीर रंजन चौधरी, लगातार टीएमसी पर हमलावर रहे, जबकि टीएमसी कांग्रेस को बंगाल में अप्रासंगिक साबित करने में जुटी रही।
लेकिन राजनीति में परिस्थितियां बदलते देर नहीं लगतीं। चुनावी झटकों के बाद ममता बनर्जी के राजनीतिक तेवरों में बदलाव दिखाई देने लगा है। दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने और विपक्षी एकता को मजबूत करने की उनकी इच्छा इस बात का संकेत है कि अब भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी मंच की आवश्यकता पहले ममता बनर्जी द्वारा अधिक महसूस की जा रही है। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस और टीएमसी के हित एक-दूसरे से टकराने के बजाय मिलने लगते हैं।
राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व का हाल के घटनाक्रमों में ममता बनर्जी के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैया भी इसी बदलती राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है। अतीत की तल्खियों के बावजूद संवाद के दरवाजे खुले रखना कांग्रेस की राजनीतिक आवश्यकता भी है। भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी चुनौती खड़ी करने के लिए कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की जरूरत है और बंगाल में फिलहाल टीएमसी ही भाजपा के बाद दूसरे नंबर की क्षेत्रीय शक्ति बनी हुई है।
दूसरी ओर, टीएमसी भी यह समझने लगी है कि राष्ट्रीय राजनीति में अकेले दम पर भाजपा का मुकाबला करना आसान नहीं है। ममता बनर्जी की ओर से विपक्षी एकजुटता को मजबूत करने की पहल ऐसे समय में हो रही है जब भाजपा के सामने विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती बिखराव रही है। ऐसे में कांग्रेस और टीएमसी के बीच बढ़ती संवाद प्रक्रिया को केवल राजनीतिक शिष्टाचार मानना शायद जल्दबाजी होगी।
हालांकि दोनों दलों के रिश्तों में अभी भी कई बाधाएं मौजूद हैं। बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी का जनाधार कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से टकराता है। वाम दलों के साथ कांग्रेस के संबंध भी समीकरणों को जटिल बनाते हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजनीति की मजबूरियां दोनों दलों को एक साझा मंच पर लाने की दिशा में धकेल रही हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस और टीएमसी करीब आ रहे हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या यह नजदीकी केवल राजनीतिक आवश्यकता है या भविष्य के लिए किसी बड़े विपक्षी गठबंधन की बुनियाद?
इतिहास बताता है कि भारतीय राजनीति में विरोध से सहयोग और सहयोग से विरोध की यात्रा बहुत तेज होती है। बंगाल में भी शायद एक नया अध्याय लिखे जाने की मजबूरी है, जहां कल तक एक-दूसरे पर तीखे हमले करने वाले दल आज साझा राजनीतिक हितों के कारण संवाद और सहयोग की पहल करते नजर आ रहे हैं।
फिलहाल इतना तय है कि राजनीति के इस बदलते मौसम में कांग्रेस और टीएमसी दोनों एक-दूसरे की जरूरत बनते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले महीनों में यह जरूरत कितनी मजबूत साझेदारी में बदलती है, यही बंगाल ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।