मुखर्जी फैमिली का फिल्मिस्तान स्टूडियो भी बिका
मुंबई। मुंबई के शुरुआती स्टूडियो में से एक फिल्मिस्तान स्टूडियो को रियल एस्टेट के अर्केड डेवलपर्स ने 183 करोड़ रुपये की भारी रकम में खरीद लिया है। 1940 के दशक में इस स्टूडियो में फिल्मों की शूटिंग हुआ करती थी। इस कारण ये भारतीय सिनेमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन गया था। लेकिन अब इसे बेच दिया गया, जिससे उन लोगों को थोड़ा धक्का जरूर लगा, जो इससे करीबी रूप से जुड़े हुए थे।
फिल्मिस्तान स्टूडियो को काजोल और रानी मुखर्जी के दादा ससाधर मुखर्जी ने अपने बहनोई यानी बहन के पति और एक्टर अशोक कुमार के साथ मिलकर 1943 में स्थापित किया था। ज्ञान मुखर्जी और बहादुर चुन्नीलाल भी स्टूडियो के फाउंडर थे। इसे तब बनाया गया, जब अशोक कुमार ने शहर के सबसे नामी स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज को छोड़ दिया था।
शुरुआती समय में फिल्म स्टूडियो को सिर्फ इस तौर पर नहीं देखा जाता था कि यहां फिल्में बनाई जाती हैं बल्कि इसे प्रोडक्शन कंपनी के रूप में देखा जाता था, जो फिल्में बनाती थीं। अपने साउंड स्टेज, आउटडोर सेट और फिल्ममेकर के कारण फेमस फिल्मिस्तान ने कई दशक तक कई बॉलीवुड फिल्मों, टीवी सीरीयल्स और कमर्शियल्स शूट्स के लिए शूटिंग लोकेशन के रूप में काम किया है। हालांकि हाल के समय में इसमें गिरावट देखी गई क्योंकि एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस स्टूडियो ने शहर में अपना पैर पसारना शुरू कर दिया था।
फिल्मिस्तान स्टूडियो का रजिस्ट्रेशन 3 जुलाई को किया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अर्केड डेवलपर्स लिमिटेड 3000 करोड़ रुपये की कीमत के लग्जरी अपार्टमेंट्स के प्रोजेक्ट को लॉन्च करने की प्लानिंग कर रहा हैं। बताया जा रहा है कि इसे 2026 में शुरू किया जा सकता है। जिसमें 50 फ्लोर होंगे और दो ऊंचे टावर में 3,4 और 5 बीएचके फ्लैट और पेंटहाउस शामिल होगा। ये तीसरा स्टूडियो है, जिसे मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में तब्दील किया जाएगा। इसके पहले चेंबूर में आरके स्टूडियो और जोगेश्वरी में कमाल अमरोही के कमालिस्तान स्टूडियो को बहुमंजिला इमारतों में बदल दिया गया थ।
इस स्टूडियो में 'तुमसा नहीं देखा' और 'जागृति' फिल्म की शूटिंग हुई थी, जिसे बेस्ट फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था। ये वही जगह है, जहां पर न जाने कितनी शादियों और अंतिम संस्कार के सीन शूट हुए थे। यहीं वह हर फिल्मों में नजर आने वाला वो मंदिर आज भी मौजूद है जो धूल से सन चुका है। पांच एकड़ में फैसे इस स्टूडियो में सात शूटिंग फ्लोर हैं। और आउटडोर लोकेशन के लिए एक गार्डन भी है। बताया जाता है कि इसकी स्थापना में स्मान अली खान 'हैदराबाद के निज़ाम' ने फंडिंग की थी। यहां 'शहीद' (1948), 'शबनम' (1949), 'सरगम' (1950), 'अनारकली' (1953) और 'नागिन' (1954), 'मुनीमजी' (1955), और 'पेइंग गेस्ट' (1957) जैसी हिट फिल्में बनी हैं।
तोलाराम जालान ने 1950 के दशक के अंत में शशधर मुखर्जी और अशोक कुमार से स्टूडियो खरीद लिया था। और 1964 में बनी और नितिन बोस की डायरेक्टेड 'दूज का चांद', फिल्मिस्तान स्टूडियो से निकली आखिरी फिल्मों में से एक थी। हालांकि इसके परिसर में शूटिंग होती रहती थी। शाहरुख खान की 'रा.वन' (2011) और सलमान खान की 'बॉडीगार्ड' (2011) यहीं शूट हुई थी। इतना ही नही, यशराज फिल्म्स के टीवी शो 'खोटे सिक्के' और डांस रियलिटी शो 'झलक दिखला जा' की शूटिंग यहीं हुई है।