पोरस के हाथी, सिकन्दर के घोड़े और बदलती दुनिया का युद्धशास्त्र: क्या हम अब भी पुरानी गलतियों से चिपके हैं?

बदलते वैश्विक परिदृश्य में युद्ध की रणनीतियों, नेतृत्व क्षमता, आर्थिक नीतियों, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्थागत विश्वसनीयता और जवाबदेही पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आधुनिक चुनौतियों के बीच पुरानी सोच और परंपरागत व्यवस्थाओं की सीमाएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं, जिससे समयानुकूल निर्णय, दूरदर्शी नेतृत्व और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

Jun 6, 2026 - 12:03
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पोरस के हाथी, सिकन्दर के घोड़े और बदलती दुनिया का युद्धशास्त्र: क्या हम अब भी पुरानी गलतियों से चिपके हैं?

 -डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

आज पारस की खाड़ी के मुहाने पर पोरस की सेना की तरह महाकाय सफेद हाथी खड़े हैं, जिन्हें थोड़ा सा भी इधर-उधर होने में डर लग रहा है। हाथियों से दुश्मन परेशान रहते थे, लेकिन सिकन्दर के घोड़ों ने अपनी चुस्ती और फुर्ती से युद्ध अपने पक्ष में कर लिया था। कुछ वैसा ही दृश्य आज दिखाई देता है, जब फारस ने अमेरिका को लोहे के चने चबवा दिए हैं।

नए सिलसिले शुरू हो चुके हैं। ऐसे प्रयोग और तरीके सामने आ रहे हैं जो परंपरागत युद्ध पद्धतियों से अलग हैं, बेहद किफायती हैं और साथ ही अनावश्यक रूप से जान जोखिम में डालने से भी बचाते हैं। राफेल जैसे लड़ाकू विमान में एक-दो अत्यंत प्रशिक्षित, दिलेर और जांबाज पायलट उड़कर वहां पहुंचेंगे, जहां उसी लागत में हजारों ड्रोन और बड़ी संख्या में मिसाइलें देश की सुरक्षा के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं। देशहित में क्या अधिक उपयोगी है, इस पर अब नए सिरे से विचार होना चाहिए।

अमेरिकी पोत, जिनसे कभी दुनिया कांपती थी और जिनका नाम सुनकर ही कई देश शांत हो जाते थे, आज स्वयं बचते-बचाते फिरते दिखाई देते हैं। उसके बाद भी उनमें आग लगने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। एक ओर वह सेनाएं हैं जो अनिवार्य भर्ती व्यवस्था के सहारे खड़ी की गई हैं, तो दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्हें अपने देश की आन-बान-शान पर प्राण न्योछावर करने में न संकोच होता है और न दोबारा सोचने की आवश्यकता।

एक कहावत है, जिसे एक भारतीय जनरल ने दुनिया के सामने रखा था- यदि भेड़ों की सेना का नेतृत्व कोई शेर कर रहा हो और दूसरी ओर शेरों की सेना का नेतृत्व कोई भेड़ कर रही हो, तो परिणाम पहले से ही लिखा हुआ माना जा सकता है। ऐसा नहीं कि हमारे देश में अन्य उदाहरण नहीं हैं। अनेक हैं। लेकिन हम उनसे सीखने में अक्सर देर कर देते हैं। ‘120 बहादुर’ और ‘केसरी’ जैसी फिल्मों में भी यही दिखाया गया कि निर्णायक क्षणों में साहस रोता नहीं, डरता नहीं और बीमारी का बहाना नहीं खोजता।

समय आ गया है कि देशहित में सही फैसले लेने शुरू किए जाएं। बीस फैसलों में यदि केवल छह ही सही निकलें, तो क्या इसे संतोषजनक कहा जा सकता है? सोचिए, यदि आपकी पूरी उम्मीद एक ऐसे डॉक्टर पर टिकी हो जो आज तक आपकी बीमारी ही न समझ पाया हो, तो केवल कोशिशें करवाते रहने से क्या होगा? दूसरे डॉक्टर की सलाह कब ली जाएगी?

रुपये का अवमूल्यन लगातार बढ़ा है और कई मोर्चों पर अपेक्षित सकारात्मक परिणाम नहीं दिखाई देते। क्या निर्मला के अलावा कोई और विकल्प नहीं है? यह भी सुनने में आ रहा है कि गुजरात के एक कारोबारी राजेश मेहता खबरों में छाए हुए हैं, जिन पर सेबी की निगाहों के सामने ही लाखों करोड़ रुपये के बाजार मूल्य को प्रभावित करने के आरोप चर्चा में हैं। संस्थागत भरोसा कमजोर पड़ता दिखाई देता है।

देश ने कई बार देर की है। यदि ममता बनर्जी देशहित के विपरीत कदम उठाती रहीं, तो क्या किसी ने यह कहा था कि मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों में घुसपैठ रोकने के प्रयास तब तक न किए जाएं जब तक पानी सिर से ऊपर न निकल जाए?

ऐसा भी नहीं कि देश में कुछ अच्छा नहीं हुआ। बहुत कुछ अच्छा हुआ है और उसकी सूची भी लंबी है। लेकिन प्रश्न यह है कि अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? पेपर लीक अब अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था जैसा प्रतीत होने लगा है। क्या देश में पूरी ईमानदारी और दूरदृष्टि वाले लोग बचे नहीं हैं? भरोसे के योग्य न होने वालों पर भी इतना अधिक भरोसा क्यों किया जाता है?

वाल्मीकि जैसे उदाहरण इतिहास में विरले होते हैं, जिन्होंने लूटपाट से महर्षि बनने तक की यात्रा तय की और रामायण की रचना की। लेकिन हमारी राजनीति और हमारे संवाद मानो हर लुटेरे में वाल्मीकि खोजने की जुगत में लगे रहते हैं। यदि वास्तविक हृदय परिवर्तन न हो पाए, तो कागजों पर ही सही, यही सोच अक्सर हावी दिखाई देती है।

एपस्टिन का प्रकरण अभी धूमिल नहीं हुआ है। चाहे कितनी भी स्याही पोत दी जाए या तस्वीरें हटा दी जाएं, क्या वह कथा लोगों के मानस-पटल से इतनी आसानी से मिट जाएगी? अमेरिका अपने भीतर जो भी करे, वह उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन प्रश्न यह है कि वह हमारे देश को नकेल डालने की स्थिति में क्यों रहे? वह दूर बैठकर डुगडुगी बजाए और हम हर बार अपना नाच दिखाने को मजबूर हो जाएं, ऐसा क्यों?

जब तक प्रत्येक व्यक्ति को बराबरी का अवसर और हिस्सा नहीं मिलेगा तथा जवाबदेही और जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक 'कॉकरोच संस्कृति' बढ़ती ही जाएगी। कहा भी जाता है कि खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदलता है। देश को क्या पसंद है, इसका निर्णय देश को ही करना होगा। जब करोड़ों रुपये किसी महानुभाव के घर में जलते चले जाएं और उसके बाद 'कॉकरोची कथाएं' सुनाई जाने लगें, तब यह समझना कठिन नहीं रहता कि समस्या कहां है।

SP_Singh AURGURU Editor