'प्रेमचंद दरिद्र नहीं, संपन्न थे; गरीबों का दर्द महसूस कर रच दिया कालजयी साहित्य', जयंती समारोह में वक्ताओं ने कहा- उन्होंने हिंदी कथा साहित्य की दिशा ही बदल दी
आगरा। हिंदी के महान कथाकार एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा के सभा भवन में आयोजित समारोह में वक्ताओं ने उनके साहित्य, व्यक्तित्व और सामाजिक दृष्टि पर विस्तार से प्रकाश डाला। समारोह में मुख्य वक्ता प्रो. उमापति दीक्षित ने कहा कि प्रेमचंद स्वयं दरिद्र नहीं, बल्कि संपन्न थे, लेकिन उन्होंने गरीबों और वंचितों के दर्द को इतनी गहराई से महसूस किया कि उनका पूरा साहित्य शोषित और बेसहारा वर्ग की आवाज बन गया। वहीं मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य उस दौर का जीवंत इतिहास है, जब देश स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक दौर से गुजर रहा था।
नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा द्वारा शुक्रवार को आयोजित "प्रेमचंद जयंती समारोह" में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए उन्हें आधुनिक हिंदी कथा साहित्य का सबसे बड़ा यथार्थवादी लेखक बताया।
मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा, सीएमडी, सेंट एंड्रयूज़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद भारत के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। उनका साहित्यिक काल वर्ष 1880 से 1936 तक फैला है, जो भारतीय इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इसी कालखंड में भारत का स्वतंत्रता आंदोलन भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचा और प्रेमचंद के साहित्य में उस दौर का सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संघर्ष सशक्त रूप से अभिव्यक्त हुआ।
मुख्य वक्ता प्रो. उमापति दीक्षित, विभागाध्यक्ष, सायंकालीन पाठ्यक्रम विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) ने कहा कि प्रेमचंद की रचना-दृष्टि अनेक साहित्यिक विधाओं में अभिव्यक्त हुई। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद आर्थिक रूप से दरिद्र नहीं थे, बल्कि संपन्न थे, किंतु उन्होंने गरीब, शोषित और उपेक्षित वर्ग के दुख-दर्द को गहराई से महसूस किया। इसी संवेदना ने उनके साहित्य को जनमानस की आवाज बना दिया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। विश्व साहित्य के क्षितिज पर हिंदी साहित्य को सम्मानजनक स्थान दिलाने वाले प्रेमचंद को भारत का 'टॉलस्टॉय' भी कहा गया और उनकी रचनाओं का अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे नागरी प्रचारिणी सभा के सभापति डॉ. खुगीराम शर्मा ने कहा कि जिस समय प्रेमचंद ने लेखन प्रारंभ किया, उस समय उनके सामने कोई स्थापित प्रगतिशील साहित्यिक परंपरा नहीं थी। न कोई मजबूत वैचारिक विरासत थी और न ही कोई तैयार मॉडल। केवल बांग्ला साहित्य से कुछ प्रेरणा मिलती थी, लेकिन प्रेमचंद ने अपने दम पर हिंदी कथा साहित्य की नई दिशा तैयार की।
वरिष्ठ कवि रामेंद्र मोहन त्रिपाठी ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका साहित्य आज भी सामाजिक चेतना का आधार बना हुआ है।
सभा की उपसभापति प्रो. कमलेश नागर ने सफल संचालन करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने अपने जीवन में अनेक अद्भुत कृतियों की रचना की। हिंदी साहित्य में उनके जैसा साहित्यकार न पहले हुआ और न आगे होने की संभावना दिखाई देती है।
सभा के मंत्री प्रो. चंद्रशेखर शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि प्रेमचंद से पहले हिंदी कथा साहित्य में राजाओं, रानियों, तिलिस्म और कल्पनालोक की प्रधानता थी। प्रेमचंद ने कहानी लेखन की दिशा ही बदल दी और उसे समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ दिया। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक हिंदी कथा साहित्य का सबसे बड़ा यथार्थवादी लेखक माना जाता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. शशि तिवारी द्वारा सरस्वती वंदना से हुआ। डॉ. ब्रज बिहारी बाल वर्मा 'बिरजू' ने अतिथियों का स्वागत किया। मुख्य वक्ता प्रो. उमापति दीक्षित का परिचय डॉ. मधु भारद्वाज ने तथा मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा का परिचय डॉ. विनोद माहेश्वरी ने कराया।
समारोह में प्रो. आभा चतुर्वेदी, डॉ. नीलम भटनागर, डॉ. मधुरिमा शर्मा, डॉ. हरबंस पाण्डेय, रमेश पंडित, डॉ. महेश धाकड़, नन्द नंदन गर्ग, ओम स्वरूप गर्ग, लखमीचंद, शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ, शरद गुप्त, रामेंद्र शर्मा 'रवि', शैल अग्रवाल, नूतन अग्रवाल, सपना सिंह, मनीष सिंह, हेमंत कुमार द्विवेदी, प्रकाश गुप्ता, शीलेंद्र वर्मा, डॉ. यशोयश, प्रकाश चंद्र अग्रवाल, खुशी सिंह तथा उमा शंकर पाराशर सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।