अब बिना ट्रैकिंग नहीं चलेगी गाड़ी: वीएलटीडी अनिवार्य, फिटनेस-पीयूसीसी पर रोक, राज्यों की लापरवाही पर 12 मई को सुप्रीम कोर्ट करेगा हिसाब

सरकार ने वीएलटीडी को अनिवार्य बनाते हुए बिना सक्रिय ट्रैकिंग डिवाइस के पीयूसीसी और फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगा दी है। 12 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्यों की जवाबदेही तय हो सकती है।

May 1, 2026 - 19:37
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अब बिना ट्रैकिंग नहीं चलेगी गाड़ी: वीएलटीडी अनिवार्य, फिटनेस-पीयूसीसी पर रोक, राज्यों की लापरवाही पर 12 मई को सुप्रीम कोर्ट करेगा हिसाब

आगरा/नई दिल्ली। देश में सड़क सुरक्षा को लेकर बड़ी जानकारी सामने आई है। अब बिना व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) सक्रिय हुए किसी भी वाहन को न तो प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र (पीयूसीसी) मिलेगा और न ही फिटनेस सर्टिफिकेट जारी होगा। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के 19 दिसंबर 2025 के परिपत्र में इस व्यवस्था को स्पष्ट रूप से लागू किया गया है, जिससे अब वाहन संचालन की पूरी प्रक्रिया तकनीकी निगरानी से जुड़ जाएगी।

कागजों से निकलकर अब जमीन पर सख्ती

केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली के नियम 125एच और नियम 90(5) के तहत पहले से ही सार्वजनिक सेवा और राष्ट्रीय परमिट वाले वाहनों में वीएलटीडी और पैनिक बटन अनिवार्य हैं, लेकिन वर्षों तक इनका पालन बेहद कमजोर रहा। मंत्रालय ने खुद स्वीकार किया है कि अधिकांश राज्यों में यह व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रही और जमीनी स्तर पर अनुपालन नगण्य रहा।

अब हर चरण पर वीएलटीडी की जांच अनिवार्य

सरकार ने अब सख्ती बढ़ाते हुए वाहन के पूरे जीवनचक्र को वीएलटीडी से जोड़ दिया है। इसके तहत 01 जनवरी 2026 से नए पंजीकरण, नवीनीकरण और स्वामित्व हस्तांतरण में वीएलटीडी जांच अनिवार्य होगी। 01 अप्रैल 2026 से फिटनेस सर्टिफिकेट और पीयूसीसी जारी करने से पहले डिवाइस की सक्रियता अनिवार्य की जा चुकी है। राष्ट्रीय परमिट जारी करने से पहले भी जांच जरूरी होगी। स्पष्ट है कि बिना सक्रिय वीएलटीडी के अब कोई वाहन कानूनी रूप से सड़क पर नहीं चल सकेगा।

सुरक्षा की जीवनरेखा: ट्रैकिंग और पैनिक बटन

वीएलटीडी केवल तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा का मजबूत आधार है। इससे वाहन की रियल-टाइम लोकेशन ट्रैक होती है और आपात स्थिति में तुरंत मदद संभव होती है। विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए पैनिक बटन बेहद अहम है। एक क्लिक पर पुलिस तक सूचना पहुंच सकती है।

राज्यों की लापरवाही पर सवाल

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मिली जानकारी ने यह उजागर किया है कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस नियम को लागू करने में गंभीर लापरवाही बरती। यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आम नागरिकों की सुरक्षा से समझौता है।

12 मई को सुप्रीम कोर्ट में जवाबदेही तय होगी

अब यह मामला न्यायिक स्तर पर पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में 12 मई 2026 को इस विषय पर सुनवाई तय है, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन द्वारा दायर आवेदन (आईए संख्या 119831/2025) पर विचार किया जाएगा। अदालत के समक्ष यह बड़ा सवाल होगा कि जब नियम पहले से लागू हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा और राज्यों की जिम्मेदारी कैसे तय की जाए।

सुरक्षा अधिकार है, विकल्प नहीं

केसी जैन एडवोकेट ने स्पष्ट कहा कि यह मुद्दा केवल नियमों का नहीं, बल्कि हर नागरिक की सुरक्षा का है। सरकार द्वारा स्वयं कम अनुपालन स्वीकार करना यह दर्शाता है कि वर्षों से इस महत्वपूर्ण प्रावधान की अनदेखी होती रही। अब जरूरत सख्त अमल और जवाबदेही तय करने की है।

SP_Singh AURGURU Editor