झुकी मीनार से पुनर्जागरण की शान तक: इटली, जहाँ नदियाँ भी कमाई का रास्ता जानती हैं!

पीसा की झुकी मीनार से लेकर पुनर्जागरण की नगरी फ्लोरेंस तक की यात्रा में इटली की कला, वास्तुकला, पर्यटन और जीवनशैली के विविध रंग सामने आए। फ्लोरेंस की नदी को साफ-सुथरे ढंग से पर्यटन और अर्थव्यवस्था से जोड़ते देखकर आगरा की यमुना की उपेक्षा का सवाल उभरा। यात्रा के बीच भारतीय भोजन, भजन, बातचीत और अपनापन लगातार साथ रहा और यह एहसास गहरा हुआ कि विदेश में घूमते हुए भी भारतीय अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहते हैं।

Sep 26, 2026 - 20:17
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झुकी मीनार से पुनर्जागरण की शान तक: इटली, जहाँ नदियाँ भी कमाई का रास्ता जानती हैं!
पीसी की मीनार।

-पीसा–फ्लोरेंस, इटली से बृज खंडेलवाल-

पीसा की मीनार हमारे सामने खड़ी थी। सफेद संगमरमर की लंबी इमारत, एक तरफ झुकी हुई, मगर पूरे आत्मविश्वास के साथ। ऐसा लग रहा था, जैसे इटली की इस मशहूर इमारत ने वाइन के दो-चार गिलास ज्यादा पी लिए हों और अब सीधे खड़े होने की जहमत उठाना छोड़ दिया हो।

पर्यटक तस्वीरें खिंचवा रहे थे। गाइड वही पुराने ऐतिहासिक किस्से दोहरा रहे थे। और पद्मिनी अय्यर  का सवाल अपनी जगह अडिग था, ‘‘आखिर यह गिरती क्यों नहीं?’’

सदियों से मीनार नहीं गिरी, लेकिन हमारी जिज्ञासा भी हार मानने को तैयार नहीं थी। आखिर पीसा की मीनार है या गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देने वाली कोई इटालियन जिद?

चमचमाते सफेद संगमरमर से बनी पीसा की झुकी मीनार बेशक शानदार है। उसकी वास्तुकला और इतिहास में कोई कमी नहीं। लेकिन आगरा से आए हम लोगों की नजर थोड़ी अलग थी।

हमने ताजमहल देखा है। वह संगमरमर में लिखी हुई मोहब्बत की शायरी है। उसे देखकर दिल कुछ पल के लिए खामोश हो जाता है। पीसा की मीनार ने हमें प्रभावित तो किया, लेकिन उतना नहीं जितनी उसकी विश्व प्रसिद्धि से उम्मीद थी।

हमें लगा कि मीनार की शोहरत (प्रसिद्धि) में पर्यटन के प्रचार का भी बड़ा हाथ है। पीसा को दुनिया ने खूब बेचा है। ताजमहल को देखने के लिए किसी विज्ञापन की जरूरत नहीं पड़ती; वह खुद अपनी कहानी सुनाता है।

हालाँकि, यह हमारी व्यक्तिगत यात्रा का अनुभव था। हर यात्री की पसंद और सौंदर्य-बोध अलग हो सकता है।

मीनार के आसपास की हरियाली भी कुछ थकी-थकी नजर आई। घास का रंग बुझा हुआ था, जैसे वह भी हजारों पर्यटकों को देखकर कह रही हो, ‘‘भाई, मुझे भी कभी छुट्टी दे दो!’’ ऐसा लगता था कि बगीचों को भी अब आराम और थोड़े पानी की दरकार है।

दोपहर का भोजन हमें अचानक भारत के करीब ले आया। एक भारतीय रेस्तराँ में राजस्थानी सजावट थी। दीवारों और माहौल में राजस्थान की झलक दिखाई दी, और खाने के साथ अपने देश की आत्मीयता भी परोसी गई।

रेस्तराँ के मालिक उदयपुर के रहने वाले थे। उनका व्यवहार विनम्र और मेहमाननवाज था। विदेश की धरती पर जब कोई अपने देश के रंग, भाषा और स्वाद से स्वागत करता है, तो मन को अजीब-सी राहत मिलती है।

एक पल को लगा कि पीसा में राजस्थान का छोटा-सा दूतावास खुल गया है। फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ पासपोर्ट की जगह प्लेट और चम्मच काम कर रहे थे।

पीसा से हम लगभग दो घंटे की ड्राइव के बाद फ्लोरेंस पहुँचे। यह वही शहर है, जिसे पुनर्जागरण (Renaissance) की जन्मस्थली और यूरोपीय कला-संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है।

हमारे बुजुर्ग गाइड मार्टिन, जिन्हें प्यार से विजय भी कहा जाता है, ने साबित कर दिया कि उम्र उत्साह के रास्ते में दीवार नहीं बनती। उनका इतिहास-वर्णन हिंदी के मुहावरों और जोशीले नारों से सजा हुआ था।

कभी ‘‘भारत माता की जय’’ की गूँज उठती, तो कभी ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ का संदेश सुनाई देता।

फ्लोरेंस के पुनर्जागरण को भारतीय माइक्रोफोन मिल गया था!

यूरोप के इतिहास में कला और विचारों ने नई करवट ली थी। हमारे गाइड ने उसमें भारतीय भावनाओं का तड़का लगा दिया। इतिहास अपनी जगह था, लेकिन प्रस्तुति में पूरा देसी रंग चढ़ा हुआ था।

हमारी हमेशा सतर्क रहने वाली सूचना-सहयोगी लेडी मार्था भी अपनी भूमिका में सक्रिय थीं। जब भी जानकारी का कोई सिरा छूटने लगता, वह तथ्य, किस्से और जरूरी निर्देशों के साथ उसे जोड़ देतीं। हमारे सफर में उनका योगदान एक ऐसे धागे जैसा था, जो अलग-अलग अनुभवों को एक साथ पिरोता रहा।

फ्लोरेंस में कदम रखते ही लगा कि पूरा शहर एक जीवित संग्रहालय है। यहाँ इतिहास सिर्फ इमारतों में बंद नहीं, बल्कि सड़कों पर चलता-फिरता दिखाई देता है।

एक तरफ सदियों पुरानी पुनर्जागरण शैली की इमारतें थीं। दूसरी ओर आधुनिक फैशन की दुकानें, महंगे ब्रांड और खूबसूरत बुटीक अपनी चमक बिखेर रहे थे।

फैशन की दुनिया आज ब्रांडिंग और प्रचार पर करोड़ों खर्च करती है। लेकिन फ्लोरेंस ने सदियों पहले ही दुनिया को बता दिया था कि कला, डिजाइन और खूबसूरती का असली जलवा क्या होता है।

यह शहर हमें याद दिलाता है कि फैशन के नए खिलाड़ी आने से बहुत पहले इतिहास अपने डिजाइन तैयार कर चुका था।

फ्लोरेंस में नदी के किनारे टहलना हमारे सफर का खास अनुभव रहा। पानी का स्तर बहुत अधिक नहीं था, लेकिन नदी साफ-सुथरी और व्यवस्थित नजर आई। मजबूत पत्थर की दीवारें, पुराने पुल और ऐतिहासिक इमारतें नदी के किनारे एक सुंदर दृश्य रच रहे थे।

यहाँ नदी केवल पानी का स्रोत नहीं थी। वह शहर की पहचान, उसकी संस्कृति और उसकी अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा थी।

शांत पानी पर पर्यटकों से भरी नावें चल रही थीं। हर नाव में बैठे लोग इतिहास, वास्तुकला और रोमांस की झलक खरीदने निकले थे। पानी पर सवार पर्यटन यहाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधि भी था।

भारत की बड़ी नदियों की तुलना में यूरोप की कई नदियाँ आकार में छोटी हो सकती हैं। लेकिन उनकी साफ-सफाई, रखरखाव और पर्यटन की व्यवस्था यह दिखाती है कि नदी को शहर की समस्या नहीं, शहर की पूँजी भी बनाया जा सकता है।

नदी किनारे की सुंदरता केवल प्रकृति की देन नहीं होती। उसमें योजना, प्रबंधन, मेहनत और नागरिक अनुशासन का भी योगदान होता है।

यही वह बात है, जिसने मुझे रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक के रूप में भीतर तक सोचने पर मजबूर किया।

फ्लोरेंस की नदी को देखकर आगरा की यमुना याद आना स्वाभाविक था।

हमारे शहर में यमुना को देवी का दर्जा दिया जाता है। पूजा होती है, आरती होती है, श्रद्धा के गीत गाए जाते हैं। लेकिन व्यवहार में वही नदी कई जगह उपेक्षा और गंदगी का शिकार है।

जिस नदी को हम माँ कहते हैं, उसके साथ हमारा व्यवहार कई बार किसी उपेक्षित नाले जैसा हो जाता है। यह विरोधाभास जितना दुखद है, उतना ही शर्मनाक भी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन के माध्यम से मैंने वर्षों तक नदियों की स्थिति, लोगों की चिंताओं और प्रशासनिक उपेक्षा को करीब से देखा है। यमुना की दुर्दशा केवल पानी की कमी की कहानी नहीं है। यह हमारी प्राथमिकताओं, हमारी योजनाओं और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का सवाल भी है।

बेशक, यूरोप को प्राकृतिक परिस्थितियों और भौगोलिक संरचना का लाभ मिला है। यहाँ जनसंख्या का दबाव भी भारत के बड़े शहरों से अलग है। लेकिन केवल प्रकृति के भरोसे कोई नदी साफ नहीं रहती।

तकनीक, संगठित श्रम, प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक भागीदारी की अपनी अहमियत है।

नदी तब संपत्ति बनती है, जब शहर उसका सम्मान करता है, उसकी देखभाल करता है और उसकी आर्थिक संभावनाओं को समझता है।

साफ नदी से पर्यटन बढ़ सकता है। रोजगार के अवसर बन सकते हैं। शहर की सुंदरता निखर सकती है। और सबसे बड़ी बात, लोगों का नदी से रिश्ता फिर जीवित हो सकता है।

फ्लोरेंस की नदी ने हमें सिर्फ एक सुंदर दृश्य नहीं दिया। उसने आगरा के लिए एक सवाल भी छोड़ दिया: क्या हमारी यमुना को भी कभी शहर की धड़कन बनाया जा सकेगा?

लंबी पैदल यात्रा के बाद शाम को हम एक कुछ दूर स्थित भारतीय रेस्तराँ में पहुँचे। थके हुए पैर आराम माँग रहे थे और पेट अपने पुराने दोस्त को पुकार रहा था।

और वह दोस्त था—भारतीय खाना!

यूरोप के कई देशों की यात्रा कर चुके हैं, लेकिन भारत से हमारा रिश्ता कहीं नहीं छूटा। बस में भजन गूँजते रहे। बातचीत में हिंदी के मुहावरे चलते रहे। और खाने की मेज पर दाल, रोटी और अपने देश के स्वाद ने बार-बार घर की याद दिलाई।

हमारी बस कभी-कभी ऐसी लगती है, जैसे यूरोप घूमने निकली भारतीय बारात हो। कोई भजन छेड़ देता है, कोई अंताक्षरी शुरू कर देता है, कोई बुजुर्ग साथी का हाथ पकड़ लेता है। विदेश में घूमने के बावजूद हमारी सामूहिक गर्मजोशी और देसी अपनापन लगातार साथ चल रहा है।

बाहर से हम यूरोपीय शहरों में घूम रहे हैं। अंदर से हमारा भारतीय मन अपनी पहचान को मजबूती से पकड़े हुए है।

फ्लोरेंस ने पुनर्जागरण के दौर में प्राचीन दुनिया की कला और विचारों को फिर से खोजा था। हमने इस यात्रा में एक और सच्चाई खोज ली है।

महाद्वीप पार किए जा सकते हैं, लेकिन दाल, रोटी और थोड़े-से देसी अपनापे की भूख को पार करना आसान नहीं।

पीसा की मीनार झुकी रही। फ्लोरेंस की नदी बहती रही। इतिहास अपनी कहानी सुनाता रहा। और हम भारतीय, अपनी भूख, हँसी और अपनापन लेकर इटली की गलियों में चलते रहे।

SP_Singh AURGURU Editor