भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त, कहा- दूसरों के लिए भी रिश्वत मांगना गलत, दंड का होगा भागी

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिसके तहत अधीनस्थों के लिए रिश्वत मांगने वाला अफसर भी दोषी माना जाएगा और दंड का भागी होगा।

Jun 4, 2026 - 20:08
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भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त, कहा- दूसरों के लिए भी रिश्वत मांगना गलत, दंड का होगा भागी

 
 
नई दिल्ली। यह जरूरी नहीं कि रिश्वत का अपराध तभी माना जाएगा, जब रिश्वत अपने लिए मांगी गई हो और फिर ली गई हो। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिसके तहत अधीनस्थों के लिए रिश्वत मांगने वाला अफसर भी दोषी माना जाएगा और दंड का भागी होगा।

मामला बहुत ही रोचक है, जो कि कर्नाटक राज्य से जुड़ा है। यहां सिरुगुप्पा पुलिस स्टेशन में तैनात एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर रंगय्या पर आरोप था कि पुलिस अधिकारियों ने एक व्यक्ति को अवैध तरीके से राशन का चावल बेचने के आरोप में धमकाया और उसकी कार जब्त कर ली। शिकायतकर्ता ने यह दावा किया था कि सब-इंस्पेक्टर ने 50,000 रुपये की रिश्वत के लिए उसे यह भी कहा कि उसे उसके अधीन पुलिस अधिकारियों के लिए कुछ करना चाहिए।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक मामले में कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(ए) के तहत एफआईआर दर्ज की। जिसे बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एफआईआर रद्द कर दी कि संबंधित अधिकारी ने न तो सीधे रिश्वत मांगी और न ही स्वयं कोई रकम प्राप्त की थी।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम ऐसी किसी भी संकीर्ण परिभाषा को स्वीकार नहीं करता, जो केवल अधिकारी द्वारा खुद रिश्वत की मांग और स्वीकृति के कार्यों तक सीमित हो। जैसा कि इसकी धारा 7 में जोड़ा गया स्पष्टीकरण 2 ऐसी स्थिति को कवर करने के लिए है जो कि किसी अन्य व्यक्ति के लिए' अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिए भी हो सकता है।

कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आए इस मामले को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुना। अदालत ने तथ्यों और कानून के मद्देनजर साफ किया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत किसी सरकारी कर्मचारी को दोषी ठहराए जाने के लिए यह जरूरी नहीं है कि उसने रिश्वत की मांग सीधे अपने लिए की हो या खुद रिश्वत प्राप्त की हो।

यदि कोई अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों या किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए भी घूस यानि कि रिश्वत मांगता है, तब भी उसके खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े अपराध का मामला बन सकता है और वह दंड का भागी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 का दायरा बड़ा है और इसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अनुचित लाभ प्राप्त करने के प्रयास भी शामिल हैं। इसे एक सिद्धांत के जरिए कोर्ट ने और साफ किया और कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध स्थापित करने के लिए रिश्वत का वास्तविक लेन-देन होना अनिवार्य नहीं है। 

फिर इन सारे तथ्यों और साक्ष्यों के मद्देनजर शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट कर दिया, जिसमें एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार की एफआईआर को खारिज कर दिया गया था।

देखा जाए तो शीर्ष अदालत का यह फैसला देश में इस तरह के हजारों भ्रष्टाचार मामलों की जांच और अभियोजन के लिए खास है। क्योंकि जिनका सरकारी दफ्तरों, बाबुओं से पाला पड़ता है, वो जानते हैं...कि कई बार सरकारी अधिकारी, रिश्वत की मांग सीधे करने के बजाय अधीनस्थ कर्मचारियों, निजी व्यक्तियों या बिचौलियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसी व्यवस्थाओं के पीछे छिपकर कोई भी सरकारी कर्मचारी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।