उत्तर प्रदेश कब जागेगा? फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

उत्तर प्रदेश में बिल्डरों की लापरवाही, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) की मनमानी, पारदर्शिता की कमी और कमजोर कानूनी व्यवस्था के कारण फ्लैट मालिक लगातार परेशान हैं। कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 जैसा कानून उत्तर प्रदेश में कानून बनाने की आवश्यकता है। समयबद्ध आरडब्ल्यूए चुनाव, स्वतंत्र ऑडिट, बिल्डरों की जवाबदेही, साझा संपत्तियों का हस्तांतरण, शिकायतों का त्वरित निस्तारण और फ्लैट खरीदारों के अधिकारों की मजबूत कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है। घर विवाद का नहीं, बल्कि सुकून का स्थान होना चाहिए और इसके लिए उत्तर प्रदेश को शीघ्र ठोस कदम उठाने होंगे।

Jul 21, 2026 - 14:49
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उत्तर प्रदेश कब जागेगा? फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

-बृज खंडेलवाल-

घर हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग पूरी उम्र की कमाई, भविष्य निधि, बैंक कर्ज और अपनी तमाम बचत लगाकर एक फ्लैट खरीदते हैं। उम्मीद रहती है कि अब परिवार को सुरक्षित और सुकून भरी ज़िंदगी मिलेगी।

मगर उत्तर प्रदेश के हजारों अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट मिलने के बाद भी लोग राहत नहीं, बल्कि रोज़ नई परेशानियों, झगड़ों और कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट मुख्य रूप से शहरी इलाकों की पहचान हैं और अभी भी देश के कुल आवासों में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में रहते हैं, जबकि छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर केवल 10–15 प्रतिशत परिवार ही अपार्टमेंट में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, स्वतंत्र मकानों में रहते हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन की कमी, छोटे परिवार और आधुनिक सुविधाओं की बढ़ती मांग फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैट बनते हैं, लेकिन देशभर में फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस बीच कर्नाटक सरकार ने एक ऐसी पहल की है, जिससे दूसरे राज्यों को भी सबक लेना चाहिए। कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 का मसौदा तैयार किया गया है। इस कानून को बनाने से पहले राज्य की 500 से अधिक अपार्टमेंट एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों से विस्तार से राय ली गई। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने फ्लैट मालिकों ने साफ कहा कि उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा, पूरी पारदर्शिता और बिल्डरों की जवाबदेही चाहिए।

अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश ऐसा कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, वृंदावन, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते दूसरे शहरों में लाखों लोग बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले परिवार अक्सर तीन तरफ़ा दबाव झेलते हैं।

एक ओर बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचने के बाद अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी आरडब्ल्यूए हैं, जिनमें लोकतंत्र की जगह कुछ लोगों का कब्ज़ा बना रहता है। तीसरी ओर सरकारी एजेंसियां हैं, जो अक्सर तब तक सक्रिय नहीं होतीं, जब तक मामला अदालत या बड़े विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुंच जाता।

कई सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। वही लोग लगातार पदों पर बने रहते हैं। रखरखाव शुल्क हर साल बढ़ता जाता है, लेकिन खर्च का पूरा हिसाब निवासियों के सामने नहीं रखा जाता। ऑडिट या तो होता नहीं या फिर उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। आम निवासी यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मेहनत की कमाई आखिर खर्च कहां हो रही है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। कई बिल्डर आरडब्ल्यूए बनने के बाद भी साझा सुविधाओं, कॉमन एरिया, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपते। इसका नुकसान सीधे फ्लैट मालिकों को उठाना पड़ता है। वे सालों तक अनिश्चितता में जीते रहते हैं।

दूसरी तरफ निर्माण की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है। कहीं छत टपकती है, कहीं दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं। खराब पाइपलाइन, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग और दूसरी तकनीकी खामियां लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं। शिकायत करने पर बिल्डर अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

रोजमर्रा की सुविधाओं का हाल भी कम खराब नहीं है। पानी की अनियमित आपूर्ति, बार-बार खराब होने वाली लिफ्ट, बंद पड़े सीसीटीवी कैमरे, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, कूड़े के ढेर और अग्निशमन के अधूरे इंतजाम कई सोसाइटियों की पहचान बन चुके हैं। पूजा स्थल,  क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल, पार्क और बच्चों के खेल मैदान का सपना दिखाकर फ्लैट बेचे जाते हैं, वे कई बार सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाते हैं।

पार्किंग को लेकर भी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई जगह विज़िटर पार्किंग तक बेच दी जाती है। साझा जगहों पर कब्ज़ा हो जाता है और आए दिन झगड़े होते रहते हैं। शिकायत करने वाले लोगों को भी कई बार मानसिक दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अलग-अलग कानूनों और नियमों के कारण अधिकार और जिम्मेदारियां साफ नहीं हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। आम परिवार समय और पैसा दोनों गंवाता है, जबकि बड़े बिल्डर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते रहते हैं।

ऐसे में उत्तर प्रदेश को भी कर्नाटक की तर्ज पर एक व्यापक और प्रभावी अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन कानून बनाने की जरूरत है। हर सोसाइटी में समयबद्ध और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हों। आरडब्ल्यूए बनते ही बिल्डर सभी साझा संपत्तियां, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज तुरंत सौंपे। हर साल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सभी निवासियों के लिए सार्वजनिक हो। बैठकों में ऑनलाइन भागीदारी की सुविधा भी हो, ताकि अधिक से अधिक लोग निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा मिले। शिकायतों का निपटारा महीनों में हो, वर्षों में नहीं। साथ ही नियामक संस्थाओं को ऐसे अधिकार दिए जाएं कि वे नियम तोड़ने वाले बिल्डरों और मनमानी करने वाले आरडब्ल्यूए पर भारी जुर्माना लगा सकें और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकें।

भारत के शहर तेजी से अपार्टमेंट संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रहेंगे। ऐसे में पुराने और बिखरे हुए कानून अब पर्याप्त नहीं हैं। समय की मांग है कि फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिले।

कर्नाटक ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब उत्तर प्रदेश सरकार, रेरा, नगर निकायों, आवास विकास संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों को भी मिलकर ठोस फैसला लेना होगा।

फ्लैट मालिक कोई एहसान नहीं मांग रहे। उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से घर खरीदा है। उन्हें सिर्फ वही हक चाहिए, जिसकी कीमत वे पहले ही चुका चुके हैं। आखिर घर सुकून की जगह होना चाहिए, अदालतों और विवादों का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश जितनी जल्दी यह सच समझेगा, उतनी ही जल्दी लाखों परिवारों की जिंदगी आसान हो सकेगी।

SP_Singh AURGURU Editor